शनिवार, 15 अक्टूबर 2016

चुटकी में तलाक

           

विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म  सिविल कोड) पर लोगों की राय क्या मांगी, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड तिलमिला उठा और आनन-फानन में आयोग के  बहिष्कार  का ऐलान कर डाला। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड  समान नागरिक संहिता का मुखर विरोधी है और इसे मुस्लिम समाज के धार्मिक मामलों में सरकार का दखल मानता है। इस बात के  दृष्टिगत  बोर्ड  का विरोध अपेक्षित था।  विधि आयोग ने लोगों की राय जानने के लिए 16 बिदुंओं की  प्रश्नावली  जारी की है। इसमें पूरा फोक्स समान नागरिक संहिता को लागू करने पर रखा गया है।   तीन दशक से  भी अधिक समय से सुप्रीम कोर्ट देश  में यूनिफॉर्म  सिविल कोड लागू करने पर जोर दे रही है मगर समकालीन सरकारें इसे टालती रही है।  संविधान के अनुच्छेद 44 में स्पष्ट  व्यवस्था है कि देश  में सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू की जानी चाहिए। देश  में शादी-ब्याह, तलाक, संपति, इनहेरिटेंस , एडॉप्नश  जैसे निजी मामलों को लेकर अलग-अलग कायदे कानून है  और  कुछ तो ऐसे है, जो सांमती व्यवस्था को भी  शर्मसार कर देते हैं। मसलन, बहु पत्नी प्रथा के साथ-साथ कुछ समुदायों में बहू-पति प्रथा भी है। और सबसे बढकर “ चुटकी में तलाक” देने की रिवायत। विधि आयोग ने इन सब पर लोगों की राय मांगी है। इसके लिए लोगों को 45 दिन का समय दिया गया है। तथापि, यह प्रश्नावली  ऐसे समय में जारी की गई है जब सुप्रीम कोर्ट में “ तीन बार तलाक” के मामले पर सुनवाई जारी है। मुस्लिम महिलाओं ने  “चुटकी में (तीन बार) तलाक कहने की सामंती प्रथा को देश  के सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे रखी है। इस मामले में मोदी सरकार भी मुस्लिम महिलाओं के साथ है और “तीन बार तलाक“ की प्रथा को समाप्त करने के पक्ष में है।   देश  में यूनिफॉर्म  सिविल कोड लागू करवाना भारतीय जनता पार्टी का प्रमुख चुनावी मुद्दा रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए जारी चुनावी घोषणा पत्र में  यूनिफॉर्म  सिविल कोड को जल्द से जल्द लागू करने का वायदा किया गया है।  ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के  बहिष्कार  से इस  यूनिफॉर्म  सिविल कोड पर आम सहमति बनने की गुजाइंश  खत्म हो गई है। इससे यह भी स्पष्ट  हो गया  है कि  मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड  किसी भी सूरत में  यूनिफॉर्म  सिविल कोड को स्वीकार नहीं करेगा। इसी वजह, अब तक समकालीन सरकारें इस मामले को टालती रही है। दरअसल,  यूनिफॉर्म  सिविल कोड संविधान के निर्देशित सिद्धांतों (डायरेक्टिव प्रिन्सिपलस)  के तहत सूचीबद्ध होनेे से इस मामले में सभी संबंधित पक्षों की सहमति वांछित है।  निर्देशित सिद्धांतो के अनुसार देश  के किसी भी समुदाय पर  कोई कानून (यूनिफॉर्म  सिविल कोड) जबरी नहीं थोपा जा सकता। इस स्थिति में सभी संबंधित पक्षों की सहमति बनाने के लिए इस पर व्यापक चर्चा  जरुरी है। केद्र में सतारूढ भाजपा का पिछला इतिहास और भाजपाई नेताओं की असहिष्णुता  के दृष्टिगत   संभवतय मुस्लिम समुदाय मोदी सरकार की इस पहल को संदेह की नजर  से देख रहा है।  इसी कारण  मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड  विधि आयोग को स्वंतत्र और निष्पक्ष  संस्था की बजाए सरकारी विभाग बता रहा है। सरकार का कथन है कि आयोग सुप्रीम कोर्ट  की निगरानी में काम कर रहा है। बहरहाल, इस बात में दो राय नहीं कि देश में अविलंब समान नागरिक संहिता की दरकार है और तीन बार तलाक कहने से महिला कको  शादी के पवित्र बंधन से मुक्त किए जाने की सामंती प्रथा फौरन बंद होनी चाहिए। मुस्लिम महिलाओं का  मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के खिलाफ खडा होना इस बात को  दर्शाता  है कि मुस्लिम जनमानस भी अब रुढिवादी सामाजिक कायदे-कानून को नही मानता है ।   रुढिवादी और महजब के ठेकेदार  इस्लाम की आड में अपने निहित स्वार्थ  पूरे कर रहे हैं। इस्लाम या कोई भी धर्म  इंसान को गैर-इस्लामी हरकतें करने  की इजाजत नहीं देता। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड  के लिए भी  यही बेहतर होगा कि उसे दीवारों पर लिखी इबारत पढ लेने की आदत डाल लेनी चाहिए।