मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016

Why To Question Surgical Strike?

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर  में भारतीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइक पर इस समय देश  में जमकर राजनीति हो रही है। विपक्ष दल  सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर ऊल-जलूल मुद्दे उठा रहे हैं, तो सत्ता पक्ष ढोल पीट-पीट कर इसे भुनाने में लगा हुआ है। सेना की इस अदम्य साहसिक कार्रवाई पर राजनीति इस कद्र हावी हो गई है कि सैनिकों की शौर्य  गाथा को ही भुला दिया गया है।  कांग्रेस और संप्रग में उसके सहयोगी दल भाजपा को स्मरण करा रहे हैं“ हमारे समय में भी सर्जिकल ऑपरेशन हुए थे मगर हमने तो इसे भुनाया नहीं“। साफ है उन्हें मौका नहीं मिला वरना वे भी इसे भुनाने के कोई कसर नहीं छोडते । यह सब देख सुन कर पाकिस्तान खूब मजे ले रहा है। सोमवार को पाकिस्तान के मीडिया ने बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) प्रमुख मायावती का बयान सुखियों में छापा जबकि अमूमन वहां के समाचार पत्र भारतीय नेताओं के वक्तव्यों को छापते तक नहीं है। रविवार को लखनऊ में आयोजित रैली में सुश्री मायावती ने मोदी सरकार पर हमला बोलते हुए सर्जिकल स्ट्राइक की विष्वसनीयता पर ही सवाल उठाया हालांकि  इससे पहले बसपा प्रमुख सेना को सर्जिकल स्ट्राइक पर बधाई दे चुकी हैं। जाहिर है मायावती ने  मुद्दे का सियासीकरण करके इसे मोदी सरकार के खिलाफ भुनाने की कोशिश  की है । उत्तर  प्रदेश  में सतारूढ समाजवादी दल इस बात से आशंकित है कि अगले साल के शुरू  में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा सर्जिकल स्ट्राइक को भुना सकती है। इसलिए सपा नेता कह रहे हैं कि मुलायम सिंह जब रक्षा मंत्री थे, उन्होंने ही सर्जिकल स्ट्राइक  शुरु करवाई थी। पिछले सप्ताह कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की जुबान इस कद्र फिसल गई कि उन्होंने मोदी सरकार के लिए “खून की दलाली“ जैसे कटु  शब्दों का प्रयोग कर डाला। राहुल गांधी के इस बयान पर भाजपा और उसके सहयोगी दल खासे उबले हुए हैं।  सियासी नेताओं की  गैर-जिमेदारानां बदजुबानी का आलम यह है कि भाजपा को एक पाकिस्तानी आतंकी संगठन का खैर-ख्वाह बताया जा रहा है। इससे पहले कांग्रेस के  वरिष्ठ  नेता पी चिदंबरम और संजय निरुपम भी सर्जिकल स्ट्राइक पर देशद्रोही वक्तव्य दे चुके हैं। देश  के विपक्षी नेताओं के  ऊल-जलूल वक्तव्यों से सिर्फ  दुश्मनों के आरोपों को बल मिल रहा है। भाजपा और उसके सहयोगी दल भी सर्जिकल स्ट्राइक की कामयाबी का श्रेय लेने और इसे सियासी फायदे के लिए भुनाने में कोई कसर नहीं छोड रहे है। गली-गली दीवारों पर पोस्टर चिपका कर भाजपाई सर्जिकल स्ट्राइक का पूरा श्रेय ले रहे हैं। इस बात पर भी  हैेरानी व्यक्त की जा रही है कि सेना के म्यांमार के भीतर जाकर  नगा आतंकियों को मार गिराने की सर्जिकल स्ट्राइक पर तो गोपनीयता बरती गई थी, मगर पाकिस्तान अधिकृत कष्मीर का जोर-शोर  से प्रचार किया जा रहा है। निसंदेह, उडी आतंकी हमले के बाद जनमानस भी यही चाहता था कि पाकिस्तान को सबक सिखाया जाए। और पूरा देश   सर्जिकल स्ट्राइक से सेना और सरकार का कायल हो गया है। भाजपा जनमानस की इसी मनोस्थिति का सियासी फायदा उठाना चाहती है और  विपक्ष इस बात पर जला-भुना हुआ है। बहरहाल, सेना के शौर्य  पर देश  के राजनीतिक दलों का बंटना और इसे राजनीति  का मुद्दा बनाना बेहद दुखद है। इससे सेना का मनोबल गिर सकता है। सेना लंबे समय से  कश्मीर  और पूर्वोतर भारत में सरहद पार प्रायोजित आतंक के खिलाफ लड रही है। सेना की सामरिक रणनीति और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे ऑपरेशन को किसी भी सूरत में सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए। इससे दुश्मनों को ही मदद मिलती है। सरकार और विपक्ष दोनों यह बात भली भांति जानते हैं कि सैन्य कार्रवाई को लेकर बहुत ज्यादा पारदर्शिता नहीं बरती जाती और इस मामले में अनुकूल-प्रतिकूल दोनों ही परिस्थितियों में पूरे देश को सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने की जरुरत है। राष्ट्रीयता  और देश  की अखंडता को सियासी फायदे के लिए तोडना-मरोडना भी देशद्रोह समान है।