मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016

मुलायम “समाजवाद“

                
“अपने पांव पर कुल्हाडी कैसे मारी जाए,“ समाजवादी पार्टी से सीखें। उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ  पार्टी  के  पारिवारिक क्लेश  ने विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मुलायम सिंह एंड सन्स  का जनाजा निकाल दिया है। कहां तो चुनाव से पहले पार्टी में मुखर आलोचकों को समझा-बुझा कर मना लिया जाता है , और कहां लखनऊ के “शतरंज खिलाडी“ पारिवारिक कलह से पार्टी को हो रहे बेतहाशा नुकसान से बेपरवाह “ शह और मात“ की चालें चल रहे हैं। देश  के युवातम मुख्यमंत्री अखिलेश  यादव की हालत बिल्कुल मुगलिया सल्तनत के शहजादे सलीम जैसी है। अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए अखिलेश  यादव को  सम्राट अकबर  के शहजादे सलीम की तरह अपने ही पिता से बगावत करनी पड रही है। और पिता मुलायम 'दी  ग्रेट ' हैं कि अपने मुख्यमंत्री बेटे का साथ देने की बजाए उन्हें सार्वजनिक फटकार लगा रहे हैं। यह सिला तब से जारी है जबसे मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे को मुख्यमंत्री बनाया और खुद रिमोट कंट्रोल से सरकार चलाते रहे। कौन मंत्री बनेगा, किसको कौनसा विभाग दिया जाएगा, किस अफसर की कहां तैनाती की जाएगी, यह सब मुलायम सिंह तय करते हैं। अखिलेश  तो बस नाम मुख्ममंत्री हैं। उन्हें राज्य के मुख्य सचिव तक को नियुक्त करने की पॉवर तक नहीं थी। पहली बार पिछले सितंबर माह में अखिलेश ने चाचा  शिवपाल यादव के करीबी दीपक सिंघल को मुख्य सचिव पद से हटाकर अपनी पसंद के राहुल भटनागर को राज्य का नया मुख्य सचिव बनाया था। इससे पहले अखिलेश  ने  शिवपाल यादव के करीबी दो ताकतवर मंत्रियों को बर्खास्त कर दिया था और चाचा से महत्वपूर्ण  विभाग छीन लिए थे। बाद में मुलायम सिंह के हस्तक्षेप पर  शिवपाल को पुराने विभाग लौटाए जाने और बर्खास्त मत्रियों को  वापस मंत्रिमंडल में  शामिल किए जाने से लग रहा था कलह थम गई है। मगर दो दिन पहले अखिलेश  ने  शिवपाल यादव और अमर सिंह के तीन करीबी मंत्रियों को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर कलह और बढा दी है। अब चाचा-भतीजे की कलह चरम पर पहुंच गई है।  शुक्रवार को लखनऊ की बैठक में इसकी झलक भी मिली। चाचा  शिवपाल ने मुख्यमंत्री से माइक तक छीन लिया और धक्का-मुक्की तक हुई। मुलायम ने बेटे और  शिवपाल को गले मिलने को कहा मगर दोनों ने इसे नहीं माना।  मुलायम सिंह भाई  शिवपाल यादव और “भाई समान “ अमर सिंह का साथ दे रहे हैं। अखिलेश को  अपनी औकात मे रहने को कहा गया। पार्टी की बैठक में चाचा  शिवपाल यादव और भतीजे अखिलेश  के बीच हुई गरमागर्मी और माइक छीनने की घटना से साफ है कि समाजवादी पार्टी में “सब कुछ अच्छा नहीं है”। अखिलेश  के ”बगावती“ तेवरों से यह भी  स्पष्ट  है कि वे स्वतंत्र राजनीतिक मार्ग  की तलाश  में। इसी बात को सामने रखकर वे विवादास्पद मुख्तार अंसारी और अमर सिंह का पार्टी में मुखर विरोध कर रहे है। अखिलेश  और उनके समर्थकों को लगता है कि मुख्तार अंसारी का विरोध करने से राज्य के लोगों, खासकर  युवाओं  में उनकी छवि निखर सकती  है। समाजवादी पार्टी को अब तक “मव्वालियों और असामाजिक तत्वों“ की पार्टी कहा जाता है। अखिलेश  के कडे विरोध के बावजूद मुलायम सिंह और  शिवपाल यादव ने मुख्तार अंसारी को पार्टी में  शामिल  करवाकर यह साबित भी कर दिया है। अब अखिलेश  के पास बगावत करने के सिवा कोई चारा भी नहीं है। पार्टी में रहते हुए भी अखिलेश अपने लिए अलग रास्ता प्रशस्त कर सकते है़। उनकी लडाई केवल चाचा से ही नहीं है, अलबत्ता अपनी सौतली मॉ से भी है जो अपने बेटे को मुलायम सिंह का उतराधिकारी बनाना चाहती है।  शिवपाल यादव इस मामले में अखिलेश  की सौतली मां का साथ दे रहे हैं। पूरी पारिवारिक कलह भी इसी बात को लेकर है कि मुलायम सिंह का उतराधिकारी कौन बनेगा। इस पूरे घटनाक्रम से समाजवादी पार्टी की छवि को खासा धक्का लगा है। अगर विधानसभा चुनाव तक कलह थमती नहीं है, तो पार्टी का सफाया तय है। ताजा चुनावी सर्वेक्षण समाजवादी पार्टी के पक्ष में नहीं है।