केन्द्र सरकार द्धारा जजों की नियुक्तियों में अनावश्यक विलंब किए जाने पर देश के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जस्टिस टीएस ठाकुर बेहद खफा हैं । पिछले शुक्रवार को मुख्य न्यायाधीष जस्टिस ठाकुर को कहना पडा कि सरकार न्यायपालिका को बर्बाद करने पर आमादा है। सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने फरवरी में उच्च न्यायालयों में नियुक्तियों के लिए 75 जजों के नाम सरकार की स्वीकृति के लिए भेजे थे मगर इस पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। सरकार अभी भी जजों की नियुक्तियों को प्रोसिजरल झमेले में उलझा रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि आज स्थिति यह हो गई है कि जजों के न होने के कारण न्यायाधीशों के कमरों पर ताले पडे हैं। मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी न्यायपालिका की हताशा दर्शाती है कि सरकार को अगर न्याय व्यवस्था को ही रोकना है तो समूची न्यायपालिका को ही “लॉक आउट“ क्यों नहीं कर देती़? यह पहली बार नही है कि जजों की नियुक्तियों में अनावश्यक विलंब पर मुख्य न्यायाधीश ने चिंता जताई है। इससे पहले इस साल अप्रैल माह में जजों पर अत्याधिक काम का बोझ और उनकी नियुक्तियों में विलंब को लेकर प्रधानंमंत्री नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश ठाकुर की आंखें भर आई थीं। देश के मुख्य न्यायाधीश का जजों की नियुक्तियों में अत्याधिक देरी पर चिंतित होना स्वभाविक है। न्याय व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त रखना देश के न्यायाधीश की जिम्मेदारी है और न्यायपालिका अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाती हैं। यही कारण है कि जनमानस को आज भी न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। सियासतदान अपने लिए स्पेस बनाने और अपने लोगों की नियुक्तियां करने में जरा भी विलंब नहीं करते हैं मगर जब औरों की बारी आती है, तब सरकार को सांप सूंघ जाता है। जजों की नियुक्तियों के मामले को लेकर सरकार और न्यायपालिका में खासा टकराव है। मोदी सरकार ने जजों की नियुक्तियों के वास्ते मौजूदा सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम व्यवस्था को बदल कर पिछले साल नेशनल ज्युडिशियल अपाइंटमेंटस कमीशन गठित किया था। इस कमीशन में केन्द्रीय विधि मंत्री और प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और विपक्ष के नेता द्वारा चयनित दो न्यायविदों को शामिल किया जाना था। मगर सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार के इस कमीशन को इस बिला पर निरस्त कर दिया गया था कि इससे जजों की नियुक्तियों में सरकार का खासा दखल रहेगा और इससे न्यायपालिक की विश्वसनीयता ही जाती रहेगी। मौजूदा कॉलिजियम चयन पद्धति में सर्वोच्च न्यायालय के सेनियरमोस्ट जजों को शामिल किया जाता है और उनकी सिफारिशों पर ही जजों की नियुक्ति की जाती है। सुप्रीम कोर्ट अपनी सिफारिशों को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए केन्द्र सरकार के पास भेजती है। राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद सरकार नियुक्ति की अधिसूचना जारी करती है। अब तक इसी व्यवस्था का पालन किया जाता रहा है। और मोदी सरकार से पहले इस व्यवस्था में कोई खोट नहीं पाया गई था। जाहिर है सरकार जजों की नियुक्तियों में भी अपना दखल चाहती है। अब यह बात तो आम आदमी भी जानता है कि देश के सियासी नेताओं की परख कैसी है? जजों की नियुक्तियों का काम सर्वोच्च न्यायालय के जजों से बेहतर और कोई नहीं कर सकता। ताजा स्थिति यह है कि सरकार अपनी बात पर अडी हुई है और न्यायपालिका अपने स्टैंड पर। इसी स्थिति के दृष्टिगत , सर्वोच्च न्यायालय को शुक्रवार को कहना पडा कि जजों की नियुक्तियों का मामला अहं संतुष्टि का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। अगर न्यायविदों से पूछा जाए तो वे यही कहंगें कि जजों की नियुक्तियों में खामख्वाह का विलंब नहीं किया जाना चाहिए। यह स्थिति बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। देश की न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए यह जरुरी है कि जजों की नियुक्तियां पूरी तरह से निष्पक्ष हों। देश की विधायिका और कार्यपालिका पहले ही अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है।
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