गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

सियासी “एलओसी“ का उल्लंघन


देश  की समकालीन सियासत का स्तर किस कद्र गिर गया है, काग्रेस नेताओं की सर्जिकल स्ट्रृाइक पर “बदजुबानी“ इसका जीता-जागता प्रमाण है। कांग्रेस नेता संजय निरुपम का यह कथन कि “सर्जिकल स्ट्राइक“ फर्जी था, न केवल भारतीय सेना की काबिलियत को चुनौती देना है, बल्कि संगीन देश द्रोह भी है। और कांग्रेस के बडबोले नेता दिग्विजय सिंह तो अक्सर ऊल-जलूल बातें करने के लिए जाने जाते हैं। उनकी बातों को कोई भी गंभीरता से नहीं लेता है। मगर पूर्व  गृह मंत्री पीसी चिदबरम का निरुपम ओर दिग्विजय  की जमात में शामिल होना समझ से पर है । यही तो पाकिस्तान चाहता है और अब दुश्मन को यह कहने का मौका मिल गया है कि “ दुनिया वालों सुन लो, भारतीय सेना के सर्जिकल स्ट्राइक पर जो हम कह रहे हैं, वही हिन्दुस्तान के कुछ नेता भी कह रहे है“। साफ-साफ कहा जाए तो भारतीय नेताओं की “देशद्रोही“ बदजुबानी ने  पाकिस्तान के सफेद झूठ को कुछ विश्वसनीयता दे डाली है। इस तरह की बातें देश  को तोडने जैसी है।  माना कि भारत में कहने-सुनने की खुली छूट है मगर “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता“ का बेजा इस्तेमाल किया जाए, इसकी कतई छूट नही है। इंटरनेट और प्रोन्नत इनफोर्मेषन टकनॉलॉजी के इस जमाने में किसी भी देश  की सेना क्या और कहां आक्रमण करती है, पूरी दुनिया के मीडिया को इसकी पल-पल की जानकारी रहती है।  देश  के एक अग्रणी समाचार पत्र ने सबूतों के साथ सचित्र  सर्जिकल स्ट्राइक की खबर प्रकाशित की है और इस समाचार पत्र की  विश्वसनीयता पर समूचे मीडिया जगत को नाज है। सरकार झूठ बोल सकती है मगर सबूत नहीं। वैसे किसी भी  सैन्य “कार्रवाई“ को फर्जी बताना उतना ही सफेद झूठ है, जितना काले कौवे का काटना। कांग्रेस के बडबोले नेताओं की  देशद्रोही बातों से  पार्टी के शीर्ष   नेताओं का कन्नी काटना स्वभाविक है। पिछले सप्ताह ही सर्जिकल स्ट्राइक के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने खुद सर्जिकल स्ट्राइक के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और सेना को बधाई दी थी। तो क्या संजय निरुपम और उन जैसे बडबोले कांग्रेसी नेता पार्टी के  शीर्ष   नेताओं से भी बडे हैं? देश  की सबसे पुरानी पार्टी की समस्या यही है कि उसके छुटभैया नेताओं की जुबान पर पार्टी का कोई नियंत्रण नहीं है। और इसी बदजुबानी (अक्सर चापलुसी) ने कांग्रेस की छवि पर कीलें ठोंक-  ठोंक उसे मरणासन्न  बना डाला है। देश  की अखंडता और सुरक्षा को लेकर सभी राजनीतिक दल एक मंच पर आ जाते हैं। सर्जिक्ल स्ट्राइक मामले में भी देश  के तमाम राजनीतिक दल एक सुर में सेना और प्रधानमंत्री की तारीफ कर रहे थे। मगर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस “एकता“ को तोड डाला। केजरीवाल ने प्रधानंमत्री से मांग की थी कि मोदी सरकार को पाकिस्तान के झूठ का माकूल जबाव देना चाहिए। दिल्ली के मुख्यमंत्री ने इस संदर्भ में सयुंक्त राष्ट्र  का जो हवाला दिया है, उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है।  केजरीवाल यह बात भूल गए कि  झूठ  का कोई जबाव  नहीं होता और अगर उतर दिया भी जाए तो भी झूठ बोलने वाला इसे नहीं मानेगा। पाकिस्तान को भारत मुंबई आतंकी हमले से लेकर पठानकोट हमले तक के पुख्ता सबूत दे चुका है मगर इस्लामाबाद है कि इन्हें मानता ही नहीं। और यह मानना सरासर बचकानी बात है कि सर्जिकल स्ट्राइक पर भारत द्वारा दिए गए सबूत पाकिस्तान मान लेगा।  इस सच्चाई के मद्देनजर विपक्षी नेताओं का सर्जिकल स्ट्राइक पर अगुंली उठाना बेहद दुखद है और वस्तु स्थिति से आंखें मूंद कर देश  की अखंडता और सुरक्षा से जुडे मुददे का राजनीतिकरण और भी दुखद है। भारतीय सेना ने पहले भी सर्जिकल ऑपरेशन कर चुकी है। इसी साल  सेना ने नगा अतंकियों के शिविरों को म्यांमार के भीतर ध्वस्त किया था। इस तरह की कार्रवाई अक्सर गोपनीय रखी जाती है। ताजा सर्जिकल स्ट्राइक मामले में सियासी नेताओं ने “राजनीतिक नियंत्रण रेखा“ लांघी है। जनमानस ही ऐसे नेताओं को  सजा देगा।