गुरुवार, 20 अक्टूबर 2016

स्वदेशी जीवनशैली का प्रतीक है खादी


 आम आदमी की रोजी-रोटी का सहारा खादी को संजीदगी से प्रोत्साहित करना और स्वस्थ रहने की संजीवनी बूटी स्वच्छता के मूल-मंत्र को गांव-गांव  लोकप्रिय बनाना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बडी उपलधियां मानी जा सकती हैं। खादी और स्वच्छता दोनों ही समाज के पिछडे एवं शोषित  तबकों से जुडी हैं। खादी ग्रामोधोग में 80 फीसदी से भी अधिक ग्रामीण महिला कारीगरों की रोजी-रोटी जुडी हुई है। इसी तरह 90 फीसदी ग्रामीण महिलाएं  शौचालय बनाए जाने से लाभान्वित हुई हैं। इन आंकडों से पता चलता है कि खादी और स्वच्छता देश के लिए कितना महत्व रखती है। प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी इस बात के लिए प्रशंसा के पात्र हैं कि उन्होंने सबसे पहले महिलाओं से जुडी ज्वलंत समस्याओं पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है। प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद मोदी ने सबसे पहले स्वच्छ भारत कार्यक्रम की नींव रखी और फिर “मन की बात“ में लोगों से खादी से जुडने का आहवान किया। खादी और स्वच्छता दोनों ही  राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की  जीवनशैली का  अभिन्न हिस्सा थे। वे खुद अपना  शौचालय साफ करते और अपने लिए चरखे पर वस्त्र तैयार करते। महात्मा का कहना था “ चरखे के हर धागे में मुझे गरीब का चेहरा  दिखता है और आशा  की किरण नजर आती है “। महात्मा गांधी के लिए चरखा मात्र सूत कातने का जरिया नहीं था। चरखा जनमानस की आकांक्षाओं और आर्थिक स्वालंबन का प्रतीक है। जब तक देश  आर्थिक रुप से आत्म-निर्भर नहीं हो जाता, तब तक आम आदमी उपनिवेशवादी व्यवस्था और सोच का गुलाम बना रहेगा।  यह बात आजादी से पहले जितनी प्रासंगिक थी, उतनी ही प्रांसगिक आज भी है। भारत में फिरगिंयों ने व्यापार की आड में अपने पांव पसार थेे। ईस्ट इंडिया कंपनी के मार्फत व्यापार करते-करते फिरगिंयों ने पूरे भारत पर कब्जा कर लिया। सैन्य ताकतें फिरंगियों को भारत से खदेड  नहीं पाई मगर लंगोटी पहने महात्मा गांधी ने स्वदेशी  और स्वराज के मूल-मंत्र से उन्हें भारत छोडने को मजबूर कर दिया। खादी का मतलब खद्दर पहनने से ही नहीं है। खादी हमारी जौवनशैली है। इसका सीधा संबंध देश  प्रेम  और भारतीयता से है।  विशुद्ध स्वदेशी सोच ( सिंपल लीविंग, हाई थींकिंग), आर्थिक नीतियां और राम राज्य वाला कार्यवन्यन। आजादी के सात दशक बाद  देश  में खादी एवं ग्रामोधोग  1300 रु करोड़  का कारोबार कर रहा है और लगभग 19.5 लाख लोगों को रोजगार मुहैया करा रहा है। मगर यह अपेक्षा से कहीं कम है। इसकी तुलना में योग गुरु बाबा रामदेव का पंतजलि  कहीं ज्यादा कारोबार कर रहा है और मल्टी-नेshनल कंपनियों को कडी चुनौती दे रहा है। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी की व्यक्तिगत पहल  और सदी के अभिनेता अमिताभ बच्चन के खादी का ब्रांड एंबेसडर बनने से खादी ग्रामोधोग को प्रोत्साहन तो मिला है मगर मल्टीनेशनल कंपनियों का मुकाबला करने के लिए अभी भी इसे कई पाएदान पार करने है। तडक-भडक के इस जमाने में किसी भी उत्पाद को जन-जन तक पहुंचाने के लिए टीवी, मीडिया और अन्य संचार साधनों पर प्रचार-प्रसार की जरुरत पडती है। मल्टी नेशनल और बडी कंपनियां विज्ञापन और जन संचार के माध्यम से अपने उत्पादों का खूब ढिंढोरा पीटती हैं  और इससे उनके उत्पाद खासे महंगे भी हो जाते हैं मगर फिर भी बिकते है। खादी ग्रामोधोग  मल्टीनेशनल कंपनियों की तरह बिक्रय लागत (सेंलिग कॉस्ट) बेतहाशा  बढाकर  ऐसा नहीं कर सकता। पूरे देश  में खादी ग्रामोधोग के 75,000 के करीब सेल्स सेंटर है। इनके माध्यम से खादी ग्रामोधोग जन-जन तक पहुंच सकता है। बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दीपावली पर खादी ग्रामोधोग के उत्पाद खरीदने की अपील से स्वदेशी  उत्पात लाभान्वित हो सकते हैं। भाजपा का दावा है कि वह 8.8 करोड सदस्यों के साथ दुनिया की सबसे बडी राजनीतिक पार्टी है। और अगर सभी भाजपाई प्रधानमंत्री के आहवान पर अमल करे, खादी भी देश के सबसे लोकप्रिय उत्पाद बन सकते हैं और मल्टी नेशनल कंपनियो के उत्पादों को पीछे छोड  सकते हैं।  
सदी से भी अधिक ग्रामीण महिला कारीगरों की रोजी-रोटी जुडी हुई है। इसी तरह 90 फीसदी ग्रामीण महिलाएं षौचालय बनाए जाने से लाभान्वित हुई हैं। इन आंकडों से पता चलता है कि खादी और स्वच्छता देष के लिए कितना महत्व रखती है। प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी की इस बात के लिए प्रषंसा के पात्र हैं कि उन्होंने सबसे पहले महिलाओं से जुडी ज्वलंत समस्याओं पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है। प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद मोदी ने सबसे पहले स्वच्छ भारत कार्यक्रम की नींव रखी और फिर “मन की बात“ में लोगों से खादी से जुडने का आहवान किया। खादी और स्वच्छता दोनों ही राश्ट्रपिता महात्मा गांधी की  जीवनषैली के अभिन्न हिस्सा थे। वे खुद अपना षौचालय साफ करते और अपने लिए चरखे पर वस्त्र तैयार करते। महात्मा का कहना था “ चरखे के हर धागे में मुझे गरीब का चेहरा  दिखता है और आषा की किरण नजर आती है “। महात्मा गांधी के लिए चरखा मात्र सूत कातने का जरिया नहीं था। चरखा जनमानस की आकांक्षाओं और आर्थिक स्वालंबन का प्रतीक है। जब तक देष आर्थिक रुप से आत्म-निर्भर नहीं हो जाता, तब तक आम आदमी उपनिवेषवादी व्यवस्था और सोच का गुलाम बना रहेगा।  यह बात आजादी से पहले जितनी प्रासंगिक थी, उतनी ही प्रांसगिक आज भी है। भारत में फिरगिंयों ने व्यापार की आड में अपने पांव पसार थेे। ईस्ट इंडिया कंपनी के मार्फत व्यापार करते-करते फिरगिंयों ने पूरे भारत पर कब्जा कर लिया। सैन्य ताकतें फिरंगियों को भारत से खदेड  नहीं पाई मगर लंगोटी पहने महात्मा गांधी ने स्वदेषी और स्वराज के मूल-मंत्र से उन्हें भारत छोडने को मजबूर कर दिया। खादी का मतलब खद्दर पहनने से ही नहीं है। खादी हमारी जौवनषैली है। इसका सीधा संबंध देष प्रेम  और भारतीयता से है।  विषुद्ध स्वदेषी सोच ( सिंपल लीविंग, हाई थींकिंग), आर्थिक नीतियां और राम राज्य वाला कार्यवन्यन। आजादी के सात दषक बाद  देष में खादी एवं ग्रामोधोग  1300 रु का कारोबार कर रहा है और लगभग 19.5 लाख लोगों को रोजगार मुहैया करा रहा है। मगर यह अपेक्षा से कहीं कम है। इसकी तुलना में योग गुरु बाबा रामदेव का पंतजलि गु्रप कहीं ज्यादा कारोबार कर रहा है और मल्टी-नेषनल कंपनियों को कडी चुनौती दे रहा है। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी की व्यक्तिगत पहल  और सदी के अभिनेता अमिताभ बच्चन के खादी का ब्रांड एंबेसडर बनने से खादी ग्रामोधोग को प्रोत्साहन तो मिला है मगर मल्टीनेषनल कंपनियों का मुकाबला करने के लिए अभी भी इसे कई पाएदान पार करने है। तडक-भडक के इस जमाने में किसी भी उत्पाद को जन-जन तक पहुंचाने के लिए टीवी, मीडिया और अन्य संचार साधनों पर प्रचार-प्रसार की जरुरत पडती है। मल्टी नेषनल और बडी कंपनियां विज्ञापन और जन संचार के माध्यम से अपने उत्पादों का खूब ढिंढोरा पीटती और इससे उनके उत्पाद खासे महंगे भी हो जाते हैं मगर फिर भी बिकते है। खादी ग्रामोधोग बिक्रय लागत (सेंलिग कॉस्ट) बेतहाषा बढाकर  ऐसा नहीं कर सकता। पूरे देष में खादी ग्रामोधोग के 75,000 के करीब सेल्स सेंटर है। इनके माध्यम से खादी ग्रामोधोग जन-जन तक पहुंच सकता है। बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दीपावली पर खादी ग्रामोधोग के उत्पाद खरीदने की अपील से स्वदेषी उत्पात लाभान्वित हो सकते हैं। भाजपा का दावा है कि वह 8.8 करोड सदस्यों के साथ दुनिया की सबसे बडी राजनीतिक पार्टी है। और अगर सभी भाजपाई प्रधानमंत्री के आहवान पर अमल करे, खादी भी देष के सबसे लोकप्रिय उत्पाद बन सकते हैं और मल्टी नेषनल कंपनियो के उत्पादों को पीछे छोड  सकते हैं।  
 से कहीं कम है। इसकी तुलना में योग गुरु बाबा रामदेव का पंतजलि गु्रप कहीं ज्यादा कारोबार कर रहा है और मल्टी-नेषनल कंपनियों को कडी चुनौती दे रहा है। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी की व्यक्तिगत पहल  और सदी के अभिनेता अमिताभ बच्चन के खादी का ब्रांड एंबेसडर बनने से खादी ग्रामोधोग को प्रोत्साहन तो मिला है मगर मल्टीनेषनल कंपनियों का मुकाबला करने के लिए अभी भी इसे कई पाएदान पार करने है। तडक-भडक के इस जमाने में किसी भी उत्पाद को जन-जन तक पहुंचाने के लिए टीवी, मीडिया और अन्य संचार साधनों पर प्रचार-प्रसार की जरुरत पडती है। मल्टी नेषनल और बडी कंपनियां विज्ञापन और जन संचार के माध्यम से अपने उत्पादों का खूब ढिंढोरा पीटती और इससे उनके उत्पाद खासे महंगे भी हो जाते हैं मगर फिर भी बिकते है। खादी ग्रामोधोग बिक्रय लागत (सेंलिग कॉस्ट) बेतहाषा बढाकर  ऐसा नहीं कर सकता। पूरे देष में खादी ग्रामोधोग के 75,000 के करीब सेल्स सेंटर है। इनके माध्यम से खादी ग्रामोधोग जन-जन तक पहुंच सकता है। बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दीपावली पर खादी ग्रामोधोग के उत्पाद खरीदने की अपील से स्वदेषी उत्पात लाभान्वित हो सकते हैं। भाजपा का दावा है कि वह 8.8 करोड सदस्यों के साथ दुनिया की सबसे बडी राजनीतिक पार्टी है। और अगर सभी भाजपाई प्रधानमंत्री के आहवान पर अमल करे, खादी भी देष के सबसे लोकप्रिय उत्पाद बन सकते हैं और मल्टी नेषनल कंपनियो के उत्पादों को पीछे छोड  सकते हैं।