गोवा में रविवार को सपन्न हुए पांच देशों के संगठन ब्रिक्स (ब्राजील,रुस, भारत, चीन एव दक्षिण अफ्रीका) सम्मेलन महज औपचारिक भर साबित हुआ है। पूरी दुनिया इस समय राक्षसी आतंक से जूझ रही है मगर ब्रिक्स को जैसे इससे कोई खास सरोकार नहीं है। ब्रिक्स देश इस सच्चाई से आंखे मूंदे रहे कि दुनिया में अमन-चैन के बगैर तेज ग्रोथ मुमकिन नहीं है। चीन इस मुगालते में है कि अमेरिका, भारत और यूरोप की तरह आतंक बीजिंग को ज्यादा प्रभावित नहीं करता है। चीन के दूर पश्चिम के झिंजियांग स्वायत्त क्षेत्र में उडघुर मुस्लिम आबादी का जातीय तनाव और आतंकी घटनाओं को कुचल दिया गया है, इसलिए चीन आतंक से बेफ्रिक है। सम्मेलन के समापन पर जारी सयुंक्त घोष णा पत्र (डेक्लेरेशन) में आतंक पर मात्र लफ्फाजी की गई है। सात हजार शब्दों के इस घोषणा पत्र में वैश्विक अर्थव्यवस्था के ढीले कल-पुर्जों को कसने की कवायद के अलावा इंटरनेट और आउटर स्पेस तक की बात की गई है, मगर दुनिया के समक्ष सबसे बडी चुनौती आतंक से निपटने के प्रति गंभीरता नहीं दिखाई गई है। मेजबान देश भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आतंक के खिलाफ ब्रिक्स को एकजुट होने का आहवान किया मगर चीन है कि पाकिस्तान को हर मुकाम पर बचाने पर आमादा है। चीन के दबाव में ही ब्रिक्स सम्मेलन में भारत के खिलाफ आग उगलने वाले पाकिस्तान के खूंखार आतंकी हाफिज सईद और मसूद अजहर पर प्रतिबंध के मामले में सहमति नहीं बन पाई। सम्मेलन के समाप्त होते ही बीजिंग ने भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के “मदरशिप ऑफ टेर्रर“ पर पाकिस्तान का पक्ष लेते हुए कहा है कि इस्लामाबाद भी आतंक से उतना ही पीडित है जितना भारत। इतना ही नहीं चीन ने आतंक के खिलाफ पाकिस्तान द्धारा किए जा रहे “अनथक“ प्रयासों की सराहना तक की है। चीन के इस रुख से साफ है कि आतंक पर बीजिंग पाकिस्तान को पाक दामन मानने से पीछे नहीं हटेगा और वह जैश -ए-मोहम्मद और लश्कर जैसे खूंखार आतंकी संगठनों की पीठ थपथपाता रहेगा। ब्रिक्स पांच देश का शक्तिशाली संगठन है और अगर पांच देश आतंक जैसे सार्वभौमिक (यूनिवर्सल) विषय पर भी एकमत नहीं हो सकते हैं, तो ऐसे संगठन की प्रासंगिकता ही क्या रह जाती है। ब्रिक्स से कहीं ज्यादा बिम्सटेक (बांग्लादेश , म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड, भूटान, नेपाल और मालद्धीप) देश आतंक पर भारत का साथ दे रहे हैं क्योंकि इस संगठन में चीन का दखल नहीं है। बिम्सटेक की प्रासंगिकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सम्मेलन के दौरान नेपाल ने भारत और चीन के बीच सेतु बनने की पहल की है। गोवा में प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी की नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल “प्रचंड“ और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से बातचीत के दौरान नेपाल भारत के साथ खडा होता नजर आया। पूरे दक्षिण एशिया क्षेत्र में पाकिस्तान एकमात्र ऐसा देश है जो भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाने की बजाए नई दिल्ली को अस्थिर करने पर आमादा है। और इसी कारण पाकिस्तान न केवल दक्षेस (सार्क) में बल्कि दुनिया में भी अलग-थलग पड चुका है। भारत ने गोवा सम्मेलन में दक्षेस की बजाए बिम्सटेक के सदस्य देशों को बुलावा भेजा था। बिमस्टेक में पाकिस्तान शामिल नहीं है। शक्तिशाली भारत चीन और पाकिस्तान दोनों की आंख की किरकिरी है। ग्रोथ में भारत चीन से आगे निकल चुका है। सोमवार को जारी एक अंतरराष्ट्रीय एजेंसी के आकलन अनुसार 2017 में चीन का ग्रोथ रेट 6.5 फीसदी रहने का अनुमान है। इसकी तुलना में भारत का ग्रोथ रेट साढे सात फीसदी से भी अधिक रहने का अनुमान है। बहरहाल, गोवा सम्मेलन में ब्रिक्स बैंक अध्यक्ष की नियुक्ति के साथ-साथ बैंक का पहला एक अरब डॉलर का ऋण मंजूर कर इसकी शुरुआत की गई। रुस के साथ मिजाइल के अलावा और भी कई करार हुए। चीन के साथ कई मुद्दों पर मतभेद के बावजूद द्धिपक्षीय व्यापारिक संबंध मजबूत करने का संकल्प लिया जाना सम्मेलन की बडी उपलब्धि है।
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