बुधवार, 26 अक्टूबर 2016

मिस्त्री को टा--टा

देश  के अग्रणी एवं प्रतिष्ठित  औद्योगिक घराने टाटा समूह में तख्ता पलट ने पूरी दुनिया के उधोग-व्यापार जगत को चौंका दिया है। बोर्डरुम में उठा-पटक आम बात है मगर 150 साल पुराने टाटा ग्रुप  में ऐसा बदलाव  पहली बार हुआ है। और ऐसा भी  पहली बार ही हुआ है कि चैयरमैन को हटाया जाना था मगर उन्हें इसकी कानोकान खबर तक नहीं लगी। सोमवार को टाटा ग्रुप  ने अप्रत्याषित घटनाक्रम में अपने चेयरमैन साइरस  मिस्त्री को हटाकर रतन टाटा को अंतरिम चेयरमैन नियुक्त किया। दिसंबर, 2012 को साइरस मिस्त्री ने रतन टाटा की जगह ली थी। रतन टाटा अभी चेयरमैन एमेरिटस हैं। नए चेयरमैन की नियुक्ति के लिए एक पैनल भी  गठित किया गया है। चार महीने में नया चेयरमैन नियुक्त कर लिया जाएगा। टाटा ग्रुप  को मर्यादित और कन्वेशनल माना जाता है और ग्रुप  के बोर्डरुम में क्या होने जा रहा है और क्या नहीं, इसकी  शेयरधारकों को ही नहीं, मीडिया को भी अग्रिम सूचना रहती है। सौ से ज्यादा देशों  में टाटा का कारोबार फैला हुआ है। सुई से लेकर भारी मशीनरी तक टाटा के उत्पाद हैं। इस्पात और वाहन उत्पादन में टाटा की पूरे विश्व में अलग पहचान है। ब्रिटेन में टाटा इस्पात का सबसे बडा उत्पादक है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि ग्रुप  को अपने चेयरमैन को गुपचुप तरीके से हटाना पडा और इसकी किसी को भनक तक नहीं लग पाई जबकि  ग्रुप  के  चेयरमैन को बोर्डरुम के हर कदम की पूरी जानकारी रहती है। टाटा   सरीखे प्रतिष्ठित ग्रुप  के बॉस को अपनी बर्खास्तगी की भनक न लगे, इसके साफ अर्थ  है कि मामला बेहद गंभीर था और  बोर्ड चैयरमैन को अपने बचाव का जरा भी अवसर नहीं देना चाहता था। निसंदेह, साइरस मिस्त्री की टाटा गु्रप के चैयरमैन पद से बर्खास्तगी कार्पोरेट जगत में अपमानजनक मानी जा सकती है मगर कोई भी  कार्पोरेट हाउस अपने चेयरमैन को बेहद गंभीर परिस्थितियों में ही हटाता है। टाटा बोर्ड  की इस कार्रवाई से इस बात का पता चलता है कि चैयरमैन पद पर रहते हुए साइरस मिस्त्री ने जरुर ऐसे कदम उठाए हैं, जिनसे रतन टाटा  को व्यक्तितौर पर नुकसान हो रहा था। वैसे साइरस मिस्त्री टाटा ग्रुप  में पहले बाहरी  (गैर-पारिवारिक) चैयरमैन हैं। इस नाते उनकी डगर और भी कठिन थी। साइरस मिस्त्री  के सहकर्मी उन्हें मृदभाषी और ”सब को साथ लेकर चलने वाला” बॉस बताते हैं और कहते हैं उनके मार्गदर्शन  में  ग्रुप  ने नई बुलदियां छुईं हैं। टाटा से पहले साइरस मिस्त्री शपूरजी पालोनजी एंड कंपनी में थे और उनके मार्गदर्शन  में कंपनी ने भारी मुनाफा कमाया था। कंपनी का टर्नओवर दो करोड पाउंड से डेढ अरब पाउंड पहुंच गया था। टाटा ग्रुप  में भी मिस्त्री ऐसा कुछ करना चाहते थे।  शुरु में साइरस  मिस्त्री रतन टाटा के मार्गदर्शन  में काम करते रहे  मगर धीरे-धीरे उन्होंने स्वतंत्र फैसले लेने  शुरु कर दिए थे और रतन टाटा के फैसलों को पलटना  शुरु करके अपने लिए अलग रास्ता बना लिया था। रतन टाटा के करीबी मिस्त्री पर ग्रुप  की रत्न इकाइयों को एक-एक करके बेचने का आरोप लगा रहे हैं। इस मामले में ब्रिटेन की प्रतिष्ठित  इस्पात कंपनी की मिसाल दी जा रही है। तथापि, जमीनी सच्चाई कुछ और ही है। रतन टाटा ने 2002 से 2008 के बीच तेजी के दौर में देश -विदेश  में टेटली और कोरस जैसी नामी ब्रांड  समेत कई कंपनियों का अधिग्रहण किया था। कई होटल भी खरीदे मगर इनमें अधिकांश  भारी घाटे में चल रही  थी। मिस्त्री को विरासत में घाटे वाली कंपनियां ज्यादा मिलीं। उन्होंने ग्रुप  को घाटे से उभारने के लिए ऐसी कंपनियों को बेचना  शुरु कर दिया। एक तरह से यह रतन टाटा के फैसलों को पलटना जैसा था। बहरहाल, साइरस मिस्त्री की बर्खास्तगी ने यह बात स्पष्ट  कर दी है कि पारिवारिक  औधोगिक घरानों में बाहरी व्यक्ति के लिए कोई जगह नहीं है। अब मामला अदालत में लडा जाएगा।