शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

जीएसटी में विलंब

लंबी जद्दोजेहद और सियासी खींचतान के बाद  अंतोगत्वा संसद और राज्य विधानसभाओं द्धारा   पारित किए जाने के बावजूद अब गुडस  और सर्विस टैक्स, जीएसटी परिषद में अटक गया है। बुधवार को दिल्ली में सपन्न हुई जीएसटी परिषद की बैठक में भी कर दरों को लेकर कोई सहमति नहीं बन पाई। पिछले माह भी परिषद की बैठक में जीएसटी रेट को लेकर कोई फैसला नहीं लिया जा सका था और कहा गया था अक्टूबर की बैठक में हर हाल में रेट तय कर लिए जाएंगें। और अब फैसला नवंबर में होने वाली बैठक पर छोड दिया गया है। अगर नवंबर में जीएसटी रेटस तय नहीं हो पाए तो अप्रैल, 2017 से जीएसटी का लागू किया जाना मुमकिन नहीं हो पाएगा। जीएसटी परिषद की अब तक तीन बैठक हो चुकी है मगर  रेटस पर कोई सहमति नहीं हो पाई है। जीएसटी का मूल रेट क्या हो, इस पर केन्द्र और राज्यों में अभी भी मतभेद बने हुए हैं। बुधवार को सहमित की उम्मीद थी मगर फैसला फिर टाल दिया गया। वित्त मंत्री अरुण जेटली के अनुसार अक्टूबर की बैठक में राज्यों को जीएसटी  लागू किए जाने पर राजस्व के नुकसाई की भरपाई पर सहमति हो गई है। इस स्थिति के दृष्टिगत जेटली  आशान्वित है नवंबर की बैठ्क में जीएसटी के तहत रेट्स निर्धारित कर लिए जाएंगे। केन्द्र सरकार ने इस बार परिषद के समक्ष करों की पांच श्रेणियों का प्रस्ताव रखा है। मूल टैक्स दर 12 से 18 फीसदी के बीच रखी गई है। स्टैंडर्ड रेट 12 से 18 फीसदी  और थरेशहोल्ड रेट 7 फीसदी सुझाया गया है। यानी जीएसटी 18 फीसदी से कम ही रहेगा। अधिकांश  विशेषज्ञों का सुझाव है कि जीएसटी 16 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए।  एशियाई प्रशांत के  अधिकतर देशों  में जीएसटी 10 फीसदी से नीचे ही है। सिंगापुर ने 1994 में जब जीएसटी (सेल्स टैकस) लागू किया था, यह 4 फीसदी था और अब 12 साल बाद 7 फीसदी के आसपास है। इसी वजह सिंगापुर ने तेजी से तरक्की की है। जीएसटी जितना भारी होगा, उतनी ही ज्यादा इसकी चोरी होगी। केन्द्र ने मैट्ल्स पर 4 फीसदी और अन्य आवश्ययक वस्तुओं पर 6 फीसदी जीएसटी का प्रस्ताव रखा है। विलासिता (कन्ज्युमर गुडस)  वस्तुओं पर 26 फीसदी जीएसटी प्रस्तावित है। मगर कुछ कन्ज्युमर डयुरेबल उत्पादों को 18 फीसदी जीएसटी के दायरे में लाने का प्रस्ताव है। अभी इन पर 33 फीसदी कर लगाया जा रहा है। सर्विस पर 18 फीसदी जीएसटी का प्रस्ताव है मगर छोटी सर्विस पर 12 फीसदी जीएसटी लगाया जाएगा। उपाभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) में  शामिल 50 वस्तुओं को जीएसटी के दायरे से बाहर रखने का प्रस्ताव है। अधिकतर राज्य केन्द्र के इन प्रस्तावों से सहमत हैं मगर कांग्रेस  शासित राज्य जीएसटी को 16 फीसदी रखने के पक्ष में है। अधिकतर राज्य 17-18 फीसदी के पक्ष में है। इसमें कोई ज्यादा अंतर नहीं है। अरविंद सुब्रहृमण्यम पैनल ने जीएसटी की जो तीन श्रेणियां सुझाईं थी, उसमें पहली और दूसरी श्रेणी में कोई ज्यादा अंतर नहीं था। मगर  सुब्रहृमण्यम पैनल विलासिता वाली वस्तुओं पर 40 फीसदी जीएसटी के पक्ष में था।  बहरहाल, ज्यादा मतभेद राज्यों को मुआवजा तय करने पर था। अधिक औद्योगिकृत महाराष्ट्र  और तमिल नाडु जैसे राज्यों को जीएसटी के लागू होने पर खासा नुकसान हो रहा है। नई कर व्यवस्था के तहत जीएसटी उत्पादक से रिटेलर तक एक बार ही लगेगा। इससे उन राज्यों को ज्यादा नुकसान होगा जहां अधिकतर उत्पादक स्थित है। इसी कारण महाराष्ट्र  और तमिल नाडु जीएसटी का विरोध कर रहे थे। जीएसटी को जल्द से जल्द लागू करना देश  हित में है। भारत तीव्रगामी प्रगति के मुहाने पर खडा है और जीएसटी देश  को तेजी से आगे ले जा सकता है। जीएसटी को संसद से पारित करवाना मोदी सरकार की  शानदार उपलब्धि है। अब 1 अप्रैल, 2017 से जीएसटी लागू करवाना सरकार के समक्ष बडी चुनौती है।