सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

काला धन सफेद नहीं बन सकता

शुक्रवार को स्वेच्छा से  काले धन को स्वेच्छा से घोषित करने की योजाना खत्म होते  की मोदी सरकार के समक्ष विदेशों में छिपाए गए अथाह धन को स्वदेश  लाने की  चुनौती फिर खडी हो जाएगी। मोदी सरकार ने काली कमाई करने वालों को चार महीने से  स्वेच्छा से काले धन पर आयकर चुकाकर  इसे सफेद बनाने का  सुनहरा अवसर दे रखा था। 30 सितंबर को इस योजना की मियाद खत्म गई । काले धन का खात्मा करना और विदेशों में छिपाए गए अथाह धन को स्वदेश  लाना, भारतीय जनता पार्टी का प्रमुख चुनावी मुद्दा रहा है। यहां तक कि लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत भाजपा का हर छोटा-बडा नेता विदेशों  में छिपाए गए धन को सौ दिन के भीतर स्वदेश  लाकर हर नागरिक में समान रुप से बांटने का वायदा किया करता था। भारत का विदेशों  में कितना धन छिपा है, इस पर अलग-अलग अनुमान है। ताजा अनुमान है कि विदेशों  में भारत का कम-से-कम 30 खरब (30 ट्रिलियन) रु से भी ज्यादा का काला धन विभिन्न बैंकों में जमा है। और इस विशाल राशि से कई विदेशी  बैंक फल-फूल रहे हैं। कई विदेशी  बैंक बाकायदा उनके यहां काला धन छिपाने का न्योता देते हैं। विदेशी  बैंको में खाता धारकों की सूचना अति गोपनीय रखी जाती है और कर अधिकारियों को भी इसकी जानकारी नहीं दी जाती। बारमूडा, बहमास, यूएई एवं मोनाको जैसे कई ऐसे देश  है, जहां आयकर नहीं लगता और कई तरह की वित्तीय सुविधाएं दी जाती हैं। काली कमाई करने वाले अपना धन छिपाने के लिए उन देशों  का चयन करते हैं, जहां काले धन को गोपनीय रखा जाता है । इसी वजह स्विटजरलैंड के बैंक काले धन छिपाने के लिए लोकप्रिय डेस्टीनेशन बने हुए हैं। बहरहाल, स्वेच्छा से काला धन घोषित करने की  मोदी सरकार की योजना से बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती। 2015 में भी सरकार ने इस योजना  को लागू किया था और इसमें मात्र 2500 करोड रु के काले धन का खुलासा हुआ था। इस बार भी इससे राशि  से बहुत ज्यादा काला धन घोषित किए जाने की आशा  नहीं  थी मगर सरकार का दावा है की  योजना के तहत  62 ,500  करोड रु  की काली कमाई घोषित हुई  है और सरकार को 16, 000 करोड रु कर के रूप नें मिलेगा । योजना के तहत काले धन की स्वेच्छा से घोषणा पर सरकार को 45 फीसदी आयकर देना पडेगा जबकि आयकर की मौजूदा अधिकतर सीमा 30 फीसदी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह दर बहुत ज्यादा है। इसे 30 फीसदी ही रखा जाना चाहिए था। सरकार ने हालांकि काला धन घोषित करने वालों को माफी देने का  आश्वासन  दे रखा है मगर अधिकतर को इस बात का भय है कि काली कमाई की घोषणा किए जाने पर वे आयकर अधिकारियों की नजर में आ जाएंगे। सवा करोड की आबादी वाले देश  में आज भी 5 फीसदी से कम आयकर रिटर्न  भरते हैं और इनमें अधिकतर सर्विस सेक्टर से जुडे लोग होते हैं। काले धन को लेकर सबसे बडी समस्या यह  है कि भारत में चुनाव काले धन के बलबूते ही लडे जाते हैं। निर्वाचन आयोग द्वारा तय चुनाव खर्च  की अधिततम सीमा से कहीं ज्यादा चुनाव में खर्च  किया जाता है और अधिकांश  खर्चा काले धन से आता है। 2014 का लोकसभा चुनाव अब तक का सबसे महंगा चुनाव था। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने सात अरब रु खर्च  किए थे और कांग्रेस ने पांच अरब रु। सच यह है कि देश  में काले धन की जड महंगे चुनाव  हैं। जिस चुनाव की बुनियाद ही झूठ-फरेब ( चुनाव खर्च सीमा) पर खडी की जाए, उससे बहुत ज्यादा सामाजिक न्याय और पारदर्शिता की उम्मीद नहीं की जा सकती। समकालीन  पूंजीवाद ग्लोबल  अर्थव्यवस्था में काले धन की फसल खूब फलती-फूलती है। भारत में उदारीकरण के बाद पूंजीपतियों की संख्या उतरोत्तर बढती जा रही है। गरीब और ज्यादा गरीब हो रहा है और अमीर और ज्यादा अमीर। इस तरह की व्यवस्था में काले धन की त्वरित फसल लहलहाना स्वभाविक है। सरकार इसे नहीं रोक सकती।