मंगलवार, 27 सितंबर 2016

भारत के पास “पानी बम“ !

“जल और लहू एक साथ नहीं बह सकते“, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का सिंधु जल संधि पर यह कथन सामयिक और प्रासंगिक है। तथापि, जमीनी सच्चाई यही है कि भारत पाकिस्तान को सिंधु नदी का पानी प्रवाहित करता रहेगा और पाकिस्तान भारत की धरती को लहूलुहान करता रहेगा। इसे सामरिक विवशता कहा जाए या अंतरराष्ट्रीय  भाईचारे का पालन, भारत ने सिंधु संधि को निरस्त नहीं करने का फैसला लिया है हालांकि पूरा देश  चाहता है कि भारत में लहु की नदियां बहाने वाले पकिस्तान को उसकी भाषा  में ही जबाव दिया जाना चाहिए। सिंधु बेसिन नदी करार अंतरराष्ट्रीय  संधि है और इसे निरस्त करने से भारत की छवि कलंकित हो सकती है। भारत ने आज तक कभी किसी भी अंतरराष्ट्रीय  संधि को नहीं तोडा। इस स्थिति के दृष्टिगत सोमवार की बैठक में फैसला लिया गया कि भारत को पाकिस्तान के नियंत्रण वाली तीन नदियों- सिंधु झेलम और चिनाब- के जल का अधिकाधिक दोहण करना चाहिए। सिंधु नदी संधि के तहत तीन नदियों - सतलुज, ब्यास और रावी- पर भारत का नियंत्रण है और बाकी तीन पर पाकिस्तान का। भारत से पाकिस्तान को बहने वाली सतलुज, ब्यास, रावी, चिनाब और झेलम नदियां पाकिस्तान की सीमा पर सिंधु नदी में समा जाती हैं। 1960 में लगभग दस साल की जद्दोजेहद के बाद विश्व  बैंक के दखल से भारत और पाकिस्तान के बीच नदियों के पानी को लेकर संधि हुई थी। पााकिस्तान को शुरु से ही इस बात का भय था कि युद्ध अथवा इस तरह की  आपातकालीन स्थिति के समय भारत पाकिस्तान को नदियों का पानी रोक सकता है। संधि में इस बात का प्रावधान रखा गया है कि भारत, पाकिस्तान के नियंत्रण वाली नदियों पर डैम और जल-विद्युत परियोजनाएं स्थापित तो कर सकता है मगर नदियों के प्रवाह को नहीं रोक सकता। इस संधि के मुताबिक भारत सिंधु नदी समागम का केवल 20 फीसदी जल का ही उपयोग कर सकता है। संधि में इस बात का भी प्रावधान है कि जल बंटवारे पर किसी भी तरह के मनमुटाव अथवा मतभेद की स्थिति में इसका कानून सम्मत निपटान किया जाएगा। भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी समागम के जल बंटवारे को लेकर आज तक कोई बडा मनमुटाव नहीं हुआ है और पूरी दुनिया में सिंधु बेसिन को बेहद सफल संधि माना जाता है। मगर उडी आतंकी हमले के बाद से भारत में पहली बार इस संधि को निरस्त करने की आवाज उठी है हालांकि ऐसा करना आसान नहीं है। भारत चीन की तरह हठ्ठी और काइंया नहीं बन सकता। चीन ने हाल ही में दक्षिण चीन सागर पर कब्जे को लेकर अंतरराश्ट्रीय पंचाट के फैसले को मानने से इंकार कर दिया है। चीन के इस फैसले से दक्षिण चीन सागर में तनाव बढ गया है। भारत सिंधु नदी संधि को तोड सकता है मगर इससे वह अलग-थलग पड जाएगा। जम्मू-कश्मीर  कई बार इस संधि को निरस्त करने की मांग कर चुका है। संधि के निरस्त किए जाने से पाकिस्तान में पानी की भीषण  किल्लत हो सकती है और अवाम भुखमरी का शिकार हो सकती है। दुनिया का कोई भी देश  इस स्थिति में भारत का साथ नहीं देगा। वैसे, इस तरह की स्थिति पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों के मन की मुराद पूरी कर सकती है। पाकिस्तान में भारत विरोधी आतंकी संगठन भारत के खिलाफ अवाम को भडकाने के लिए इस तरह के ,मौके की फिराक में रहते है। भारत अपने नियंत्रण वाली नदियों के पानी का पहले ही भरपूर दोहण कर चुका है। अब पाकिस्तान के नियंत्रण वाली नदियों की बारी है।  मोदी सरकार का पाकिस्तान के नियंत्रण वाली नदियों के पानी से जम्मू-कश्मीर में लगभग 6 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचित करने का फैसला समय की मांग है।  पाकिस्तान को पता चलना चाहिए कि भारत के पास “पानी बम“ भी है और पानी कैसे भीषण तबाही मचा सकता है।