दिल्ली में प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई आम आदमी पार्टी के “अच्छे दिन“ नहीं चल रहे हैं। सच कहा जाए तो अरविंद केजरीवाल सरकार के “अच्छे दिन“ आए ही नहीं। कभी मंत्री का स्केंडल, तो कभी विधायकों की एक-के-बाद दूसरी गिरफ्तारी अथवा पार्टी में बगावत। सता में आते ही पार्टी का एक मंत्री फर्जी डिग्री में धर लिया जाता है। फिर खाद्य मंत्री असीम अहमद खान को भ्रष्टाचार के आरोपों में बर्खास्त कर दिया जाता है। अभी इसकी आग ठंडी भी नहीं पडी थी कि एक दूसरा मंत्री सेक्स स्केडल में गिरफ्तार कर लिया जाता है। सात मंत्री है, तीन बर्खास्त हो चुके हैं। पार्टी को सत्ता में आए अभी जुम्मा-जुम्मा डेढ साल भी नहीं हुआ है कि “आप“ के 11 विधायक जेल की हवा खा चुके हैं। दिल्ली उव्च न्यायालय के फैसले के बाद 21 विधायकों पर अयोग्यता की तलवार लटक रही है। पिछले वीरवार को दिल्ली उच्च न्यायालय ने 21 विधायकों की संसदीय पद की नियुक्ति इस बिला पर निरस्त कर दी कि मुख्यमंत्री ने उप-राज्यपाल की अनुमति नहीं ली थी। अरविंद केजरीवाल ने पार्टी के 21 विधायकों को संसदीय पद से नवाजा था। मंत्रिमंडल का आकार सीमित (कुल विधायकों का 10 फीसदी, केन्द्र में 15 फीसदी) रखना कानूनन अनिवार्य है। 70 सदस्यीय विधानसभा वाली दिल्ली सरकार के मंत्रिमंडल में मुख्यमंत्री सहित सात से ज्यादा मंत्री नही बनाए जा सकते। इस बंदिश के चलते अरविंद केजरीवाल ने भी औरों की तरह कानून को ठेंगा दिखाने वाला रास्ता अख्तियार किया और 21 विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त कर दिया। नियमानुसार ऐसा करने के लिए मुख्यमंत्री को उप-राज्यपाल की अनुमति लेना कानून सम्मत था। उप-राज्यपाल से उनकी बनती नहीं है, इसलिए वे जानते थे कि इन्हें संसदीव सचिव नियुक्त करने की अनुमति नहीं मिलेगी। इस तरह अरविंद केजरीवाल ने दो-दो गैर-कानूनी काम किए। एक ओर 21 विधायकों को संसदीय सचिव बनाकर संवैधानिक व्यवस्था का मखौल उडाया, तो दूसरी ओर उप-राज्यपाल को दरकिनार अपनी पावर्स का बेजा इस्तेमाल किया। इसे दिल्ली अभी भी केन्द्रीय शासित प्रांत है और उप-राज्यपाल ही यहां सर्वोसर्वा है। दिल्ली पुलिस केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है। यह बात अरविंद केजरीवाल और इनके साथी अच्छी तरह जानते थे। पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पूरे 15 साल इस बात के लिए लडती रही। और केजरीवाल अगर नही जानते थे, कानूनी विषेज्ञयों की राय ली जा सकती थी। मगर केजरीवाल ने ऐसा नहीं किया और खुद वही काम किया जिसके लिए वे विरोधियों की मुखर आलोचना करते रहे हैं। अरविंद केजरीवाल पंजाब में बादल सरकार को सता की भूखी और भ्रष्ट करार देते-देते अघाते नहीं है। मगर केजरीवाल ने दिल्ली में वही किया, जो पंजाब में मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने किया। बादल ने अगर 117 सदस्यीय विधान सभा वाले पंजाब में 24 मुख्य संसदीय सचिव बनाए, तो केजरीवाल ने 70 सदस्यीय विधानसभा वाली दिल्ली में 21 संसदीय सचिव नियुक्त कर पंजाब को भी पीछे छोड दिया। फिर अरविंद केजरीवाल और प्रकाश सिंह बादल में क्या फर्क रह जाता है? और अगर खुदा-ना-खास्ता पंजाब में आप सत्ता में आ जाती है, तो केजरीवाल दिल्ली की तरह राज्य में मुख्य संसदीय सचिव की फौज खडी नहीं करेंगे, इस बात की क्या गारंटी है ? अरविंद केजरीवाल की कार्यशैली से साफ पता चलता है कि उनकी कथनी और करनी में भारी अंतर है। अब तक उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया जो मुख्यधारा की सियासत से अलग नजर आए। इसके विपरीत केजरीवाल भी समकालीन स्वार्थी और सता-लोलुप सियासी नेताओं की रंगत में रंग चुके है। केजरीवाल में न तो सब को साथ लेकर चलने का मादा हैं और न ही उनमें संवैधानिक परिधि में काम करने की इच्छा शक्ति है। एक के बाद एक सहयोगी का पार्टी छोडना अथवा निकाला जाना यही साबित करता है। पंजाब में पार्टी की मौजूदा बगावत से आप का ग्राफ काफी नीचे गिरा है। पार्टी की खींचतान, भ्रष्ट मानसिकता और नेताओं के विवादास्पद आचरण ने पंजाब के लोगो को समय रहते आगाह कर दिया है।
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