शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

92 साल की परंपरा का अंत

 संसद में 92 साल से चली आ रही अलग रेल बजट प्रस्तुत करने की परंपरा का अंत देश  के लिए सुखद साबित हो सकता  है। मोदी सरकार ने अगले वित्तीय साल के लिए रेल बजट को आम बजट में समाहित करने का निर्णय लिया है। रेल बजट आमा बजट से दो दिन पहले पेश किया जाता  है। मोदी सरकार ने फरवरी माह के आखिरी दिन आम बजट को पेश  करने की परंपरा भी खत्म कर दी है। अब बजट फरवरी माह की पहली तारीख को पेश  किया जाएगा। रेल बजट को आम बजट में समाहित करने से रेलवे को 10,000 करोड रु की बचत होगी। रेलवे को सरकार से हर साल लगभग 40,000 करोड रु की बजटीय सपोर्ट लेने के लिए 10,000 करोड चुकाने पडते थे। अब रेल बजट आम बजट का हिस्सा होने से रेलवे को यह रकम (डिविडेंट) नहीं देनी पडेगी। रेलवे का अलग से बजट पेश  करने की परंपरा ब्रिटिश  काल में सबसे पहले 1924 में  शुरु की गई थी। तब रेलवे रोजगार देने वाली भारत की सबसे बडी संस्था थी और इसका बजट अन्य सभी सरकारी संस्थाओं से कहीं ज्यादा था। इसी बिला पर तब रेलवे के बजटीय प्रावधानों को आम विभागों के बजटीय प्रावधानों से अलग किया गया था। देश  आजाद होने के बाद स्वदेशी  सरकार फिरंगियों की इस परंपरा को ढोती रही। इसकी प्रमुख वजह यह थी कि रेलवे अभी भी देश  में सबसे बडी नियोक्ता थी और इसका बजट भी अन्य उपक्रमों से कहीं ज्यादा विशाल था। मगर नब्बे के दशक में उदारीकरण के बाद स्थिति में काफी बदलाव आया। अब रेलवे देश  का सबसे बडा नियोक्ता नहीं रही और सरकार के और कई उपक्रम इससे बडे नियोक्ता हो गए थे। सर्विस सेक्टर के उभरने से यह सेक्टर सबसे बडा नियोक्ता बन गया था। इस स्थिति में अलग से रेल बजट की प्रासंगिकता नहीं रह गई थी। इस समय रेलवे की अपनी वित्तीय स्थिति काफी डांवाडोल है। सातवें वेतन आयोग के मुताबिक कर्मचारियों को संशोधित वेतनमान देने के लिए 40,000 करोड रु की जरुरत है और यात्री किराए में सब्सिडी देने के लिए 30,000 करोड की दरकार है। आम श्रेणी का यात्री किराया बढा नहीं सकते और अगर जैसे-तैसे बढाया भी तो भी एक-आध फीसदी से ज्यादा बढाया नहीं जा सकता जबकि रेलवे यात्री किराए पर 50 फीसदी सब्सिडी देता है। माल भाडे को बढाया जा सकता है मगर इतना भी नहीं कि इस बढोतरी से 70,000 करोड रु जुटाए जा सकें। इसके अलावा रेलवे को अपने नए और पुराने 458 प्रोजेक्टस पूरे करने के लिए 4.83 लाख करोड रु जुटाने है। रेलवे के पास यात्री किराया और माल भाडा बढाए के अलावा और कोई आय स्त्रोत नहीं है। ज्यादा से ज्यादा रेलवे अपनी खाली पडी संपति बेच सकता है। मगर संपति बेचकर भी कब तक गुजारा किया जा सकता है। इन सब बातों के  दृष्टिगत  बेहतर यही था कि रेल बजट को आम बजट में समाहित करके इसके लिए आम बजट से वित्तीय संसाधन जुटाए जाएं। अब रेलवे का राजस्व और पूंजीगत घाटा आम बजट में परिलक्षित होने से इसे खासी राहत मिलेगी। रेलवे के पुनर्गठन के लिए  बिबेक देबरॉय की अध्यक्षता में गठित नीति आयोग की समिति की सिफारिश  पर सरकार ने रेल बजट को अलग से पेश  करने  की परंपरा को खत्म किया  है। समिति का मानना था कि ब्रिटिश  सरकार के समय से चली आ रही इस परंपरा की अब कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई है। बहरहाल, आम बजट में रेल बजट के लिए अलग से प्रावधान होगा और संसद में इस पर अलग से चर्चा भी होगी। वित्त मंत्री अरुण जेटली के अनुसार इस कवायद से रेलवे की “कार्यात्मक स्वायत्तता“ (फंकशनल अटॉनॉमी) पर कोई असर नहीं पडेगा। भारतीय रेलवे दुनिया की सबसे बडी रेल सेवाओं में  शुमार है। देश  में नेटवर्क के प्रसार के लिए रेलवे को अविलंब अतिरिक्त संसाधन की दरकार है। रेलवे अपने बूते यह सब नहीं कर सकता। यह काम आम बजट में  बेहतर ढंग से किया जा सकता है।