पिछले शुक्रवार को बैंक, बीमा, टेलीकॉम, ट्रांसपोर्ट और आम आदमी से जुडी सेवाओं के कर्मचारियों की हडताल से कई राज्यों में जनजीवन प्रभावित हुआ । हडताल का आहवान वामपंथी दलों और कांग्रेस से सम्बद्ध श्रमिक संगठनों ने किया था, इसलिए इसका असर केरल और कर्नाटक में काफी ज्यादा रहा। केरल में वाम मोर्चे की सरकार और कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने हडताल में खुलकर श्रमिक संगठनों का साथ दिया । वैसे आम आदमी को यह बात वास्तव में अटपटी लगेगी कि सरकार खुद जनजीवन को प्रभावित करने वाली हडताल का समर्थन करे। हडतालियों का साथ देने का सीधा-सीधा अर्थ है कि सरकार स्वंय हडताल पर है। मगर वस्तुस्थिति, यही है कि हर श्रमिक संगठन किसी-न-किसी राजनीतिक दल से जुडा होता है और उसका रिमोट कंट्रोल भी सियासी नेताओ के हाथ में रहता है। इसीलिए, केरल और कर्नाटक में जनजीवन बुरी तरह से अस्त-व्यस्त रहा और इसके लिए दोनों राज्यों की सरकारें प्रमुख रुप से जिम्मेदार हैं। कर्नाटक में स्कूल और कॉलेजिज बंद कर दिए गए। कई राज्यों में नर्सें और रेडियोजिस्ट्स भी हडताल पर रहे जिससे मरीजों को खासी परेशानी उठानी पडी हालांकि हडताली नर्सों ने आपातकालीन सेवाएं जारी रखी। हडताल में क्योंकि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से संबद्ध भारतीय मजदूर संघ ने हिस्सा नहीं लिया, लिहाजा भाजपा षासित राज्यों में इसका कोई ज्यादा असर नही पडा। और बीमा और टेलीकाम सेक्टर्स में हडताल का असर काफी ज्यादा रहा। इन क्षेत्रों में वामपंथियों से सम्बद्ध ट्रेड यूनियंस का खासा दबदबा है। शुक्रवार की हडताल में 18 करोड श्रमिकों ने हिस्सा लिया। श्रमिक संगठन देश के करोडों कामगारों के लिए रिटायरमेंट के बाद पेंशन जैसी पुख्ता सामाजिक सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। सरकार ने न्यूनतम वेतन बढाने और दो साल का बोनस देने का वायदा किया था मगर श्रमिक संगठनों ने इसे नहीं माना। कामगार संगठनों का आरोप है को मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से श्रमिक कानूनों में खासी ढील देकर इन्हें पूंजीपतियों के माफिक बनाया गया है। देश के कामगारों को इस बात का भी गिला है कि सांसद और विधायक अपने लिए पूरी सामाजिक सुरक्षा का प्रबंध कर चुके है। हर सांसद और विधायक एक बार निर्वाचित होने पर भी पेंशन का हकदार हो जाता है मगर दिन-रात ताउम्र पसीना बहाने के बावजूद कामगार के लिए कोई सामजिक सुरक्षा नही है। श्रमिकों की इस मांग में काफी वजन है। विकसित देशों में रिटायरमेंट के बाद कर नागरिक के लिए पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा है मगर भारत में सांसदों और विधायकों के अलावा अब सरकारी कर्मचारियों की पेंशन सुविधा भी बंद कर दी गई है। बहरहाल, लोकतंत्र में विरोध करने सभी को अधिकार है मगर काम छोडकर सडकों पर उतरकर जनजीवन अस्त-व्यस्त करना न तो श्रमिकों के हित में है और न ही देश के। 18 करोड श्रमिकों की हडताल से देष को न्यूनतम 108 करोड घंटों के काम का नुकसान उठाना पडा है। इसकी भरपाई करना आसान नहीं है। इस नुकसान की राशि से लाखों कामगारों का भला हो सकता था। विरोध करने के और भी कई तरीके हैं। इस मामले में जापान से सीख ली जा सकती है। जापान के श्रमिक संगठनों का भरसक प्रयास रहता है कि उनकी हडताल से जनता को कोई परेशानी न हो। जापान के एक अग्रणी अखबार ने 2015 में “ क्या जापान में हडताल (स्ट्राइक) लुप्तप्राय हो गई है“ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया था। लेख के शीर्षक से ही पता चलता है कि इस मुल्क में हडताल भारत की तरह आम नहीं है। विरोध करना मानव के खून में है और उसे जब भी मौका मिलता है, वह अपनी दबी आवाज को बुलंद करता है । तथापि, ऐसे विरोध का क्या फायदा जो अपना ही नुकसान करे। देश में जब-तब होने वाली हडतालें मूल मुद्दों पर कम, सियासी हितों को लेकर ज्यादा फोक्स रहती है। इससे सिर्फ देश का ही नुकसान हो रहा है।
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