सोमवार, 19 सितंबर 2016

आक्रामक पंजाब कांग्रेस



विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खडे पंजाब में सत्ता की प्रमुख दावेदार कांग्रेस इन दिनों खासी आक्रामक मुद्रा में नजर आ रही है। कैप्टन अमरिंदर सिंह के प्रदेश  अध्यक्ष और चरणजीत सिंह चन्नी के कांग्रेस विधायक दल नेता बनने के बाद यह बदलाव आया है।  कैप्टन अमरिंदर सिंह पंजाब में कांग्रेस के एकमात्र ऐसा नेता है जो विधनसभा चुनाव में पार्टी की नैया पार लगा सकते हैं। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव से पहले कैप्टन को प्रदेश  कांग्रेस अध्यक्ष बनाने के साथ-साथ चरणजीत सिंह चन्नी को विधायक दल का नेता बनाकर जातीय समीकरण बैठाने की भरपूर कोशिश  की है। राज्य की कुल आबादी में लगभग 32 फीसदी अनुसूचित जाति हैं और 25 फीसदी जाट सिख। चरणजीत सिंह चन्नी अनुसूचित जाति से हैं और कैप्टन अमरिंदर सिह जाट सिख। राज्य की 57 फीसदी आबादी से संबंधित नेताओं को संगठन के शीर्ष  पदों पर स्थापित करके कांग्रेस ने खासा संतुलन बैठाया है। कैप्टन अमरिंदर सिंह को राज्य कांग्रेस की कमान सौंपने से पहले कांग्रेस मरणासन्न स्थिति में थी। 2012 के विधानसभा चुनाव के बाद राज्य में जितने भी उप-चुनाव हुए, कांग्रेस एक भी जीत नहीं पाई और हर उप-चुनाव में हार का अंतर भी खासा भारी रहा। लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस का कोई अच्छा प्रदर्शन  नहीं रहा मगर कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मोदी लहर में अमृतसर लोकसभाई सीट से भाजपा के दिग्गज नेता अरुण जेटली को एक लाख से भी ज्यादा अंतर से हराकर पार्टी की लाज बचा ली। बहरहाल, मौजूदा विधानसभा सत्र के दौरान कांग्रेस का आक्रमक रुख और संघर्ष  का मादा  स्पष्ट संकेत  दे रहा है कि पार्टी अब सदन से सडक तक हर मुकाम पर लोगों के लिए किसी भी तरह की कुर्बानी देने को तैयार है। अमूमन, कांग्रेस नेताओं के बारे यह माना जाता रहा है कि लंबे समय तक सत्ता का सुख  भोगते-भोगते वे आरामप्रस्त हो गए हैं और उनमें लडाई लडने का मादा नहीं रहा। मगर कांग्रेस के विधायक पिछले तीन दिन से जिस तरह विधानसभा के भीतर धरने पर बैठे रहे, उससे यह धारणा ध्वस्त हो गई है। कांग्रसियों ने साबित कर दिया है कि जरुरत पडने पर पार्टी सडक से सदन तक लंबा  संघर्ष  कर सकती है और अभी भी उनमें  संघर्ष   का जबरदस्त मादा है। समकालीन सियासत की भी यही मांग है। जनमानस अब सियासी पार्टियों के चुनाव की बेला पर लोक-लुभावने वायदों से आजिज आ चुका है। मतदाता  अब थोथे और  कोरे वायदे नहीं, राजनीतिक दलों से ठोस नतीजे चाहता है और वह राजनीतिक दलों को इन्ही मानदंडो  पर जांच-परख भी रहा है। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने बिजली और पानी की लडाई लडी थी और इसी के नतीजतन जनता ने पार्टी को प्रचंड जनादेश  दिया था। पंजाब में कांग्रेस के पास जनता के लिए संघर्षरत  रहने के सिवा और कोई चारा नहीं है। एक जमाने में देश  का खुशाहलतम प्रांत आज मादक पदार्थों की लत से बुरी तरह से पीडित है। देहातों में 70 फीसदी से भी ज्यादा युवा को नशे  की लत पड चुकी है। गुरु नानक देव वूनिवर्सिटी के एक अध्ययन अनुसार  राज्य के 70 फीसदी युवाओ कों नशे की लत है क्योंकि पंजाब में मादक पदार्थ  आसानी से उपलब्ध है। राज्य के दस मेंसे हर चौथा व्यक्ति नशे  की चपेट में है।  65 फीसदी परिवार नशे  की समस्या से बुरी तरह से पीडित हैं और टूटने की कगार पर है। दुखद  स्थिति  यह  है कि राज्य सरकार सभी सियासी दलों को साथ लेकर  नशे  के खिलाफ अभियान चलाने की बजाए राज्य को नशामुक्त साबित करने में जुटी है। कांग्रेस को अगर पंजाब की जनता का विष्वास जीतना है, तो राज्य को नशा मुक्त बनाना पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र की उच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। और अब विधानसभा सत्र खत्म होते ही कांग्रेस को जनमानस की समस्याओं के लिए सडकों पर  उतरना पडेगा।