बुधवार, 7 सितंबर 2016

जी 20ः एक-दूसरे को घूरने का मंच

       जी 20:  एक-दूसरे को घूरने का मंच
पुरानी कहावत है, “जाको पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई“। भारत के पडोसी और दुनिया की दूसरी सबसे  विशाल  अर्थव्यवस्था चीन को अब पता चला कि आतंक से कोई भी अछूता नहीं है। इस सप्ताह चीन के हांग्जो में जी-2  शिखर सम्मेलन से ठीक पहले 30 अगस्त को किर्गिजस्तान की राजधानी बिशकेक में चीनी दूतावास में आत्मघाती विस्फोट ने चीन को सकते में डाल दिया था। चीन ने इस घटना की कडी भर्त्सना करते हुए आतंक फैलाने वाली की भी कडी निंदा की। पिछले करीब डेढ दशक से  अमेरिका सरीखे ताकतवर देश  समेत पूरी दुनिया आतंक से परेशान है। अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी समेत छोटे-बडे सभी मिलकर  आतंक से  निपटने की वकालत करते रहे हैं मगर चीन इस मुद्दे को अब तक टालता रहा है। इसकी प्रमुख वजह यही थी कि इस सदी के आरंभ तक चीन अपेक्षाकृत आतंक से अछूता रहा। अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट जैसे खूंखार आतंकी संगठनों की चीन में घुसपैठ नहीं हो सकी हालांकि  झिंजियांग प्रांत में उईघुर मुस्लिम अलगाववादियों का क्रूर चीनी दमन बदस्तूर जारी रहा । चीन की आत्म-केन्द्रित राजनीतिक व्यवस्था आसानी से किसी बाहरी संगठन को अपने यहां घुसने की अनुमति नहीं देती थी। पिछले एक दशक में चीन में काफी बदलाव आया है और चीन अब खासी उदार अर्थयवस्था बन कर उभरी है। जिस तरह पहले अमेरिका को छींक आने पर पूरी दुनिया को जुकाम हो जाता था, उसी तरह अब चीन में पता हिलने पर दुनिया में भूंकप आ जाता है। समकालीन वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन की खासी उपस्थिति है। 2013 के त्यानआनमेन चौक और 2014 के कुनमिंग  हमले के बाद चीन ने आंतरिक चौकसी बढा दी थी। दोनों आतंकी हमले  उईघुर मुस्लिम अलगाववादियों द्वारा किए गए थे। इसके बाद से चीन में  आतंकी हमले नहीं हुए मगर किर्गिज गंणतंत्र के हमले ने चीन को भी आतंक का मिलकर मुकाबला करने के लिए विवश  किया है। उज्बेकिस्तान के  राष्ट्रपति इस्लाम करीमोव के निधन से भी क्षेत्रीय अस्थिरता का खतरा उत्पन्न हो गया है और चीन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकता है। हांग्जो जी 20 शिखर सम्मेलन में पहली बार चीन ने भी माना कि आतंक दुनिया के लिए मंदी अथवा स्लोडाउन से भी बडी चुनौती है। चीन आतंक से भले ही उतना पीडित नही है मगर पर्यावरण असंतुलन और ग्लोबल वार्मिंग के फलस्वरुप उपजी घनी धुंध ने चीन को खासा परेशान कर रखा है। बढती  आबादी के बाद घनी धुंध चीन की दूसरी बडी समस्या है। बहरहाल हांग्जो जी 20  शिखर सम्मलेन की सबसे बडी उपलब्धि यही है कि दुनिया के बीस ताकतवर देशों ने आतंक और ग्लोबल वार्मिग को आर्थिक मोर्चे के लिए भी सबसे बडा खतरा माना है।  वैश्विक अर्थव्यवस्था को तेजी से आगे बढने के लिए जरुरी है कि दुनिया में पूरी तरह से अमन-चैन व्याप्त हो। भूखमरी, सूखे और महामारी से निपटने के लिए ग्लोबल वार्मिंग को रोकना अपरिहार्य है। हांग्जो में इन सब मुद्दों पर चर्चा  हुई और आर्थिक विषमताओं को कम करने और आतंक से लडने के लिए मिलकर काम करने का संकल्प लिया गया। जलवायु परिवर्तन पर भी चर्चा  हुई। चीन और अमेरिका ने पेरिस संधि पर हस्ताक्षर भी किए मगर  वैश्विक आर्थिक समस्याओं से निपटने के लिए कोई कारगर उपाए नहीं सुझाए गए। इसके विपरीत शिखर सम्मेलन में अविश्वास  और तनाव साफ -साफ नजर आया। अमेरिका के  राष्ट्रपति ओबामा ने अपने रुसी समकक्ष पुतिन को जिस तरह से घुर कर देखा, उससे लगता नहीं है जी-20 में किसी तरह की एकता है। भारत और चीन के बीच हाल ही में दूरियां बढी है। प्रधानमंत्री मोदी ने  शिखर सम्मलेन में आतंक के पनाहगार पाकिस्तान पर हमला बोला तो चीन बगले झांकने लगा। ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने माइग्रेंट  मुद्दे पर कडा रूख अपनाया। ऐसे माहौल में लफ्फाजी के सिवा किसी ठोस नतीजे की उम्मीद नहीं की जा सकती।