उतर प्रदेश में “नेता जी“ मुलायम सिंह यादव की पारिवारिक कलह सत्तारूढ समाजवादी पार्टी को आने वाले विधानसभा में भारी पड सकती है। अगर घर के झगडे गल्ली-मोहल्ले में आ जाएं, तो सिर्फ जंग हंसाई ही होती है। यदुवंशी परिवार की यह कलह पार्टी को कहां ले जाएगी, इसका जबाव तो समय के गर्भ में छिपा है पर राज्य के युवातम मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने चाचा शिवपाल यादव के साथ “करो या मरो“ की लडाई जरुर लड रहे हैं। सपा ने अखिलेश यादव को देश के सबसे बडे राज्य का मुख्यमंत्री तो बना दिया गया मगर परिवार ने उनके हाथ भी बांध दिए। पिछले साढे चार साल से कभी पिता, तो कभी ताऊ तो कभी चाचा, सब के सब अपने-अपने सियासी हित साध रहे थे। ऐसे पद का क्या फायदा अगर मुख्यमंत्री न तो अपनी पसंद का सचिव रख सकें और न ही मुख्य सचिव। पिता मुलायम सिंह यादव बार-बार अपमानित करते। कभी मंत्रियों के समक्ष तो कभी सार्वजनिक मंचों पर भी। खनन मंत्री गायत्री प्रजापति जैसे मुलायम सिंह के मुंह लगे मंत्री भ्रष्टाचार में संलिप्त होने के बावजूद प्रमोशन-दर-प्रमोशन पाते रहे। प्रजापति को ही लें। सबसे पहले राज्य मंत्री बने, फिर स्वतंत्र प्रभार हथिया लिया और अततः केबिनेट मंत्री बन गए। सब नेताजी की कृपा से। इस तरह के और भी कई उदाहरण है। इसी तरह करप्श्न के कई मामलों में जांच का सामना कर रहे दीपक सिंघल को अखिलेश राज्य का मुख्य सचिव नहीं बनाचा चाहते थे ,पर मुलायम सिंह और चाचा शिवपाल के दबाव में उन्हें ऐसा करना पडा। इस पर अखिलेश खून का घूंट पीकर रह गए। मगर हर चीज की एक हद होती है और “बहुत ज्यादा तंग करने पर“ गाय भी सींग मारने लगती है। इस 15 अगस्त को अखिलेश यादव का धैर्य भी जबाव दे गया। उस दिन पिता मुलायम सिंह यादव ने पार्टी कार्यकर्ताओं के समक्ष दागी मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता का समाजवादी पार्टी में विलय का मुखर विरोध करने के लिए अखिलेश यादव को बुरी तरह से फटकारा। बस इससे अखिलेश का सब्र का बांध टूट गया और बगावत की नींव रखी गई। अखाडे के पहलवान मुलायम सिंह यादव के बारे यह धारणा है कि उन्हें पल-पल की खबर रहती है मगर इस बार मुलायम भी गरचा खा गए। पुत्र अखिलेश ने मुलायम के खासमखास गायत्री प्रजापति और राज सिंह किशोर को मंत्रिमंडल से हटा दिया और दीपक सिंघला की जगह राहुल भटनागर को मुख्य सचिव बना दिया। मुलायम को इसकी कानोंकान भनक तक नहीं लगी और उन्होंने खुद माना कि मंत्रियों की बर्खास्तगी की खबर उन्हें मीडिया से मिली। इस कार्रवाई से तिलमिलाए मुलायम ने बेटे अखिलेश को पार्टी अध्यक्ष पद से ही हटाकर अपने भाई शिवपाल को पार्टी की कमान सौंप दी। अखिलेश शिवपाल को तो पार्टी अध्यक्ष पद से हटा नहीं सकते थे, क्योंकि यह अधिकार राष्ट्रीय पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह के पास है, मगर मुख्यमंत्री ने शिवपाल से सभी मलाईदार विभाग लेकर उन्हें समाज कल्याण जैसा अदना महकमा सौंप दिया। मुलायम ने सुलह-सफाई के लिए दिल्ली बैठक बुलाई मगर अखिलेश इस बैठक में नहीं आए। इस सारे खेल में अमर सिंह का हाथ भी बताया जा रहा है। अमर सिंह छह साल पार्टी से बाहर रहने का दर्द नहीं भूल पाए हैं। उन्हें बाहर का रास्ता दिखाने में अखिलेश की अहम भूमिका रही है। बहरहाल, “दी ग्रेट इंडियन समाजवादी ड्रामे में, कौन विभीषण है और कौन लक्ष्मण, इस सच्चाई से पार्टी कार्यकर्ता बखूबी वाकिफ है और वे यह भी जानते है कि इस पारिवारिक कलई में पार्टी की छवि खराब हुई है। यदुवंशी परिवार में एकता है तो समाजवादी पाटी का वजूद है। अगर परिवार में दरार आती है, तो पार्टी का टूटना तय है।
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