गुरुवार, 1 सितंबर 2016

निरपेक्ष से गुट-सापेक्ष की ओर

भारत और अमेरिका के बीच दस साल की जद्दोजेहद के बाद अंततः सैन्य करार हो ही गया। मंगलवार को अमेरिका के रक्षा मंत्री एश्टन  कार्टन और भारत के विदेश  मंत्री मनोहर पर्रिकर ने लॉजिस्टिक एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (लेमोआ) पर हस्ताक्षर कर सैन्य क्षेत्र में एक नई ऐतिहासिक  शुरुआत की है। ताजा समझौते के तहत दोनों देश  एक-दूसरे के थल, वायु और नौसैनिक अड्डों, ईंधन सुविधाएं और अन्य सैन्य उपकरणों का इस्तेमाल कर पाएंगे। इससे दोनों देशों की सामरिक सैन्य ताकत बढेगी। मगर दोनों देश  एक-दूसरे के क्षेत्र में सैन्य अड्डे नहीं बना पाएंगे। मगर कालांतर में दोनों देश  इस बात पर भी विचार कर सकते हैं। सैन्य सुबिधाओं का इस्तेमाल दोनों देशों  के कायदे-कानून अनुसार ही किया जाएगा। वैसे आधुनिक सामरिक रणनीति सैन्य अड्डो को बनाने की जरुरत नहीं समझती। मित्र और सहयोगी देशों  में सैन्य अड्डे बनाने की अमेरिकी रणनीति ज्यादा कारगर साबित नहीं हो पाई है। इससे क्षेत्रीय तनाव ही बढा है। बहरहाल, भारत और अमेरिका के बीच सैन्य सहयोग से पाकिस्तान और चीन का तिलमिलाना स्वभाविक है। चीन शिद्द्त से पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत की सामरिक घेराबंदी में लगा हुआ है। यही वजह है कि वह भारत के हर सामरिक मूव पर बौखला जाता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा बलूचिस्तान के पक्ष में बोलने पर भी चीन को मिर्ची लग गई । और अब भारत-अमेरिका सैन्य सहयोग से चीन की चिंता बढ गई है। इसकी प्रमुख वजह है कि ताजा सैन्य सहयोग सेे दुनिया को स्पष्ट  संदेश  गया है कि भारत अब गुट-निरपेक्ष की नीति से बाहर आ गया है। अब तक भारत देश  के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु की गुट-निरपेक्ष नीति पर चल रहा था। मोदी सरकार ने  नेहरु की विदेश  नीति में आखिर कील ठोंक कर इसे दफना दिया है। मोदी सरकार ने अमेरिका के साथ सैन्य सहयोग करके  भारत के भरोसेमंद मित्र रुस को भी दुत्कारा  है। भाजपा मूलतः दक्षिणमार्गी राजनीतिक पार्टी है और वह समाजवादी रुस की अपेक्षा पूंजीवादी अमेरिका के ज्यादा करीब है। गुट-निरपेक्षता ने भारत को दुनिया में एक अलग पहचान दी थी हालांकि न्यूक्लियर पॉवर बनने की होड और  वारसा संधि एव साम्यवादी व्यवस्था के टूटने एवं बाई-पोलर विश्व  के खत्म होते ही गुट-निरपेक्ष मूवमेंट की प्रासंगिकता ही जाती रही। चीन की विस्तारवादी नीति का माकूल जवाब देने के लिए अमेरिका अथवा रुस के साथ मिलकर सैन्य सहयोग करना  भारत की सामरिक जरुरत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा रुस की बजाए अमेरिका को ज्यादा विश्वसनीय मानते हैं। अमेरिका के अलावा जापान, विएतनाम और दक्षिण कोरिया भी चीन की विस्तारवादी नीति के मुखर विरोधी हैं।  चीन की विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं को रोकने के लिए अमेरिका ज्यादा प्रभावी है। दक्षिण चीन सागर पर अंतरराश्ट्रीय पंचाट के फैसले का जिस तरह से चीन अनादर कर रहा है, उसके दृष्टिगत चीन के विस्तारवादी मुखौटे का अनुमान लग जाता है। अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए चीन किसी भी हद तक जा सकता है। ताजा समाचारों के अनुसार चीन ने पाकिस्तान को पांच अरब डॉलर में 6 अत्याधुनिक पन्नडुब्बियां देने का करार किया है। भारत-अ्मेरिका रक्षा समझौता दोनों देशों  की सामरिक रिश्तों को और मजबूत करता है। भारत, अमेरिका के जितना ज्यादा करीब जाएगा, विस्तारवादी चीन उतना ही ज्यादा बौखलाएगा। अमेरिका के साथ बढ्ते  ऱिश्तों  का सीधा असर पाकिस्तान पर भी पडता है। पाकिस्तान को उतरोतर अमेरिका मदद काफी कम हो गई है। तथापि अमेरिका रक्षा समझौते के साथ कुछ खतरे भी हैं। अमेरिका आर्थिक और सैन्य दोनों ही  दृष्टि  से दुनिया की सबसे बडी ताकत है और वह सामरिक तौर पर दुनिया की सबसे बडी ताकत बनना चाहता है। भारत को इस तरह के खतरों से सचेत रहना होगा।