गुरुवार, 8 सितंबर 2016

Populist Measures During Election Year Is Sort Of Corruption.



चुनाव आते ही राजनीतिक दलों को आम आदमी की चिंता सताने लगती है और उसे लुभाने के लिए “आसमान से तारे तक तोड कर“ लाने का वायदा कर डालते हैं। और कई वायदे तो ऐसे होते हैं जिन्हें पूरा करने के लिए “ भामा  शाह का खजाना“ भी खाली पड जाए। लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा ने विदेशों  में छिपाए गए काले धन को स्वदेश  लाकर हर नागरिक के खाते में 15 लाख रु जमा कराने का वायदा (झांसा) किया था जबकि यह कतई मुमकिन नहीं था। बेचारा आम आदमी इसे सच मान बैठा और आज भी इस विषाल राशि को पाने की उम्मीद लगाए बेठा है। इसी तरह तब प्रधानमंत्री का “ अच्छे दिन आएंगे“ का नारा बच्चे-बच्चे की जुबान पर था। यह वायदा भी “झांसा“ ही निकला। फिर बिहार के विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री ने राज्य के लिए केन्द्रीय मदद का पिटारा खोल दिया था और कई हजार करोड रु की आर्थिक मदद की घोषणा की थी। देश  के संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिससे प्रधानमंत्री सरकारी खजाने को दोनों हाथों से लुटाए। राज्यों को किस मद्द से कैसे आर्थिक मदद दी जाती है, इसका भी पूरा हिसाब-किताब होता है। केन्द्र और राज्यों में संसाधनों के बंटवारे के लिए बाकायदा संवैधानिक बॉडी वित्त आयोग है और वही राज्यों को आर्थिक मदद के बंटवारे का फार्मूला तय करता है। राज्यों को  विशेष  दर्जा और पैकेज देने का काम भी वित्त आयोग ही करता है। वार्षिक  और पंचवर्षीय  योजनाओं का आकार और प्रकार नीति आयोग (पहले योजना आयोग) तय करता है। राज्यों को परियोजनाओं के लिए  हर साल पेश  होने वाले आम बजट में  धन का प्रावधान कर लिया जाता है। प्रधानमंत्री के पास सिवा “ आपातकालीन  राहत“ के अलावा ऐसा कोई फंड नहीं है, जिससे किसी राज्य विशेष  को अलग से आर्थिक मदद दी जा सके। तथापि विधानसभा चुनाव के दौरान विशेष मदद दिए जाने की रिवायत बदस्तूर जारी है। लगभग चार माह बाद (जनवरी-फरवरी, 2017) उत्तर प्रदेश , पंजाब और उत्तराखंड समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, इस बात के दृश्टिगत हर सियासी  दल दिल खोलकर मतदाताओं को लुभा रहा है और अनाप-शाप वायदे किए जा रहे हैं । कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश  में किसानों की “खाट सभा“ में पार्टी की सरकार आने पर कर्ज माफी की घोषणा  की जबकि इस योजना से पहले ही सरकारी बैंकों का  दिवाला निकल चुका है। बैंकों से किसानों को कर्ज तय मानदंडों के हिसाब से मिलता है और कर्ज की अदायगी न करना दंडनीय अपराध है। लेकिन राजनीतिक दलों की कर्ज माफी वायदे के कारण किसानों के कर्ज अदायगी न करने के मामले बढे हैं। आरबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक 2004 से 2015 के बीच राष्ट्रीयकृत बैकों ने 2.11 लाख करोड रु के कर्ज माफ किए है और पिछले तीन साल में 1.14 लाख करोड रु के कर्ज माफ किए गए हैं। इससे देश  के 28 सरकारी बैंक दिवाला होने की कगार पर हैं। दुनिया के किसी भी देश  में ऐसा नहीं हो रहा है। अगर कर्ज  माफ ही किए जाने है तो क्यों न किसानों को सीधी आर्थिक मदद दी जाए ?   बैंकों ने किन लोगों के कर्ज  माफ किए गए, आरबीआई और बैंक यह जानकारी देने को तैयार नहीं है मगर माना जाता है कि अधिकतर किसान कर्ज माफी श्रेणी के हैं। कर्ज माफी ही नहीं, पंजाब में किसानों को मुफ्त में बिजली और अन्य कई रियायतें दी जा रही है। बहरहाल, सरकारी खजाना जुटाकर अथवा लोक-लुभावने वायदे करके चुनाव लडना लोकतंत्र का सबसे बडा मजाक है। लेवल-प्लेइंग फील्ड, निष्पक्ष , स्वतंत्र और लोभ-लालच से ऊपर मतदान ही स्वस्थ लोकतंत्र की बुनियाद है। लोक-लुभावने वायदों से जीता गया चुनाव सिर्फ पूरी व्यवस्था को ही  भ्रष्ट   कर रहा है। देश  के निर्वाचन आयोग को इस पर गंभीरता से सोचना होगा। चुनावी साल  में लोक-लुभावने वायदों पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।