सोमवार, 5 सितंबर 2016

सिंगूर में “झींगुर“

                
पायल की छनक जैसी मधुर आवाज निकालने वाले प्रकृति के सिपाही झींगुर रात के गहन सन्नाटे को संगीतमय बनाते हैं मगर अधिकतर लोग इनकी आवाज से परेशान हो जाते हैं। कहते हैं प्रकृति से लय स्थापित करने के लिए झींगुर की आवाज को समझना जरुरी है। दस साल तक पश्चिम  बंगाल में सिंगूर में किसानों की हालत भी झींगुर जैसी ही थी। किसान जबरी भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आवाज उठाते रहे मगर तत्कालीन वामपंथी सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।  सर्वहारा वर्ग के लिए लडने का दावा करने वाले कॉमरेड पूंजीपति के साथ हो लिए और टाटा की नैनो कार के लिए किसानों की जमीन का जबरी अधिग्रहण किया गया। कुल मिलाकर 997 एकड जमीन का अधिग्रहण किया गया। इस मेंसे 400 एकड जमीन उन 2200 किसानों की थी, जो अपनी “मां“ समान भूमि को बेचने अथवा अधिग्रहण के सख्त खिलाफ थे। तब किसानों के सघर्ष  में ममता “दीदी“ ने उनका भरपूर साथ दिया। और ममता बनर्जी को इसका फल भी मिला। पश्चिम  बंगाल में तीन दशक से भी ज्यादा समय से सत्ता पर कुंडली मार कर बैठे वाम मोर्चे को बेदखल करना कोई आसान काम नहीं था मगर सिंगूर की लडाई से ममता बनर्जी  पश्चिम बंगाल के राजनीतिक क्षितिज पर इस कद्र छा गई कि अकेली महिला ने पूर वाम मोर्चे की चूलें तक हिला दी। वाम पंथी आज तक अपने जख्मों को सहल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट  ने पिछले बुधवार को स्पष्ट  व्यवस्था दी   कि सिंगूर में किसानों की जमीन का अधिग्रहण कानून सम्मत नहीं था और वामपंथी सरकार ने भूमि अधिग्रहण एक्ट 1894 (2013 में संशोधित) का घोर उल्लंघन किया गया। देश  की  शीर्ष  अदालत की व्यवस्था से साफ है कि तत्कालीन बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार को सिंगूर में नैनो कार प्रोजेक्ट लगवाने की इतनी जल्दी थी कि आनन-फानन में कायदे-कानून का भी पालन नहीं किया गया।  पूंजीपति बनाम सर्वहारा के नजरिए से  समाज का आकलन करने वाले कम्युनिस्ट अगर पूंजीपतियों के मित्र बन जाएं तो रहा-सहा समाजवाद भी लडखडा जाता है। समाजवाद औद्योगिकरण की मुखालफत नहीं करता है, अगर इससे सर्वहारा वर्ग का शोषण  नहीं हो। समस्या यह है कि पूंजीपति व्यवस्था में पूरा जोर पूंजी उन्मुख  तौर-तरीकों पर होता है। इस व्यवस्था में रोजगार के अवसर का कम होना और श्रमिकों का शोषण  किया जाना आम बात है। तथापि, इक्कीसवीं सदी आते-आते वामपंथी भी “सेलेक्टिव“ पूंजीवादी व्यवस्था के पक्ष में हो गए थे। पश्चिम  बंगाल की वामपंथी सरकार को राज्य में औद्योगिकरण की जल्दी थी। तब टाटा समूह के नैनो प्रोजेक्ट को अपने-अपने क्षेत्र में स्थापित करवाने के लिए राज्यों में होड लगी हुई थी।  औद्योगिकरण के मामले में  पश्चिम बंगाल का पलडा आज भी अन्य राज्यों पर  तुलनात्मक भारी पडता है। सस्ती लेबर, नजदीकी बंदरगाह और अन्य सुविधाएं  माकूल तौर पर उपलब्ध है। उस पर वामपंथी खुद टाटा समूह को राज्य में नैनो प्रोजेक्ट लाने का न्योता दे रहे थे। वामपंथी से जुडे श्रमिक संगठनों की आए दिन की हडताल से आजिज अधिकतर उधोग  पश्चिम बंगाल  से पहले ही पलायन कर चुके थे। इस बात के दृष्टिगत  वामपंथी सरकार हर हाल में टाटा समूह को राज्य में लाने के लिए जोर लगा रही थी। औद्योगिकरण कोई गलत काम नहीं है मगर किसानों की उपजाऊ जमीन का उधोग लगाने के लिए जबरी अधिगृहीत करना वास्तव में किसान विरोधी कदम है। इस जमीन का 2006 में अधिग्रहण किया गया था। तब भूमि अधिग्रहण कानून में संषोधन नहीं हुआ था। संप्रग सरकार ने 2013 में फिरंगी सरकार के समय के किसान विरोधी 1894 के एक्ट में संशोधन करके नया कानून बनाया है। इसके तहत किसानों की सहमति के बगैर उसकी जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जा सकता। दस साल के  शासन में संप्रग सरकार  का यह क्रांतिकारी जनहित फैसला था। सिंगूर के किसान इस बात को अच्छी तरह समझ चुके हैं।
या जा सकता। दस साल के षासन में संप्रग सरकार  का यह क्रांतिकारी जनहित फैसला था। सिंगूर के किसान इस बात को अच्छी तरह समझ चुके हैं।