गुरुवार, 29 सितंबर 2016

भारत की कूटनीतिज्ञ जीत


इस्लामाबाद में नवंबर माह में होने वाली सार्क ( साउथ एशियन एसोसिएषन फॉर रीजनल कोऑपरेशन) 
शिखर सम्मेलन के बॉयकॉट  में भारत को तीन देशों  के समर्थन से  पाकिस्तान चारों खाने चित हो गया है। भारत ने उडी आतंकी हमले की प्रतिक्रियावश  सार्क  की  बैेठक का  बॉयकॉट   का निर्णय लिया है। भारत का अनुसरण करते हुए अफगानिस्तान, बांग्लादेश  और भूटान  ने भी  शिखर सम्मेलन के बॉयकॉट  का ऐलान किया है। अब इस बैठक की कोई अहमियत नहीं रह गई है और इसे रदद करने के सिवा कोई चारा नहीं है। बॉयकॉट  में अफगानिस्तान का साथ भारत की बहुत बडी कूटनीतिज्ञ जीत है। जम्मू-कश्मीर  में उडी आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान को यह खासा करारा जवाब है। सिंधु जल संधि को निरस्त करने की धमकी और पाकिस्तान को “मोस्ट फैवरड नेशन“ का दर्जा वापस लेने से इस्लामाबाद इतना नहीं तिलमिलाया है, जितना अफगानिस्तान, बांग्लादेश  और भूटान का सार्क का  बॉयकॉट  करने के लिए भारत का साथ देने पर। भारत द्वारा  “मोस्ट फैवरड नेशन का दर्जा  वापस लेने से पाकिस्तान को कोई फर्क  नहीं पडता है। पाकिस्तान ने आज तक भारत को  “मोस्ट फैवरड नेशन का दर्जा  नहीं दिया है।  मगर अफगनिस्तान का  बॉयकॉट  पाकिस्तान के लिए जबरदस्त धक्का है। भूटान  को भारत का अनुकरण करना ही था क्योंकि वह हमेशा  भारत के साथ चलता है। बांग्लादेश  की  शेख हसीना सरकार भी  भारत के साथ है। बांग्ला देश  की मौजूदा प्रधानमंत्री  शेख हसीना बंग बन्धु  शेख मुजबीर रहमान की पुत्री हैं और देश  को पाकिस्तान से आजादी दिलाने के लिए भारत की  कृतज्ञ हैं। उनका साथ भी मिलना ही था मगर अफगानिस्तान का सार्क  बॉयकॉट  में भारत का साथ देना भारत की वाकई ही बहुत बडी कूटनीतिज्ञ सफलता है। अफगानिस्तान पश्चिम  में पाकिस्तान का पडोसी है और उसके इस्लामाबाद से गहरे संबंध रहे हैं। पूरे सार्क में अफगानिस्तान ही पाकिस्तान का गहरा मित्र है। 1979 में तत्कालीन सोवियत संघ के हमले के बाद से पाकिस्तान पडोसी अफगानिस्तान के लगभग 60 लाख शरणार्थियों को अपने यहां पालता रहा है। अफगानिस्तान के कई शीर्ष  नेता पाकिस्तान में राजनीतिक श रण लिए हुए हैं। इन हालात में अफगानिस्तान का पाकिस्तान को नाराज करने के यही अर्थ  निकाले जा सकते हैं कि काबुल भी पाकिस्तान की “आतंकी छवि“ से आजिज आ चुका है। दरअसल, पाकिस्तान की आतंकी फितरत से अफगानिस्तान भी खासा पीडित है। अफगानिस्तान को अपना पांचवा प्रांत जैसा सलूक देते हुए पाकिस्तान तालिबान के माध्यम से वहां छदम युद्ध  छेडे हुए है। काबुल यह बात भी आज तक नहीं भुला है कि तालिबान  शासन के समय  यूएई और सऊदी अरबिया के बाद  पाकिस्तान तीसरा देश  था, जिसने तालिनान सरकार को मान्यता दी थी। पाकिस्तान की बदनाम खुफिया मिल्ट्री एजेंसी आईएसआई भारत की ही तरह अफगानिस्तान में विध्वंसक गतिविधियों में संलिप्त रहती है। इसी वजह अफगानिस्तान के पूर्व  राष्ट्रपति हमीद करजई पाकिस्तान से खासे नाराज थे। करजई के उतराधिकारी अशरफ गनी ने पद संभालते ही सबसे पहले पाकिस्तान और अफगानिस्तान की इंटेलीजेस ऐजेसियों के बीच एक-दूसरे के क्षेत्र में विध्वंसक गतिविधियों नहीं फैलाने का करार करवाया मगर इसका भी पालन नहीं हुआ। गनी ने खुद माना है कि पाकिस्तान आज भी अफगानिस्तान को हर तरह से कमजोर करने की  बराबर कोशिश कर रहा है। इसी माह (सितंबर) में अपनी नई दिल्ली यात्रा के दौरान अफगान राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात के दौरान पाकिस्तान की आतंकी फितरती  पर गहरी चिंता जताई थी। पाकिस्तान की तुलना में भारत अफगानिस्तान से मजबूती से दोस्ताना रिश्ते निभा रहा है।  इसी वजह अफगानिस्तान भारत को ज्यादा करीबी मानता है। बहरहाल, भारत, पाकिस्तान को अलग-थलग करने में सफल रहा है। मगर कश्मीर  के हालात अभी भी चिंताजनक है। दुश्मनों से लडना आसान है मगर अपनों से लडना बेहद मुश्किल । कश्मीर  घाटी में दिन-ब-दिन अवाम  राष्ट्रीय  मुख्यधारा से दूर होती जा रही है।  मोदी सरकार को इस मोर्चे को भी अविलंब संभालना होगा।