आज की समस्या कल पर टाल देना अथवा यूं कहा जाए 'अपने सिर की बला, दूसरे पर मढ देना' हमारी पुरानी आदत है। नतीजतन, एक दिन ऐसा भी आता है कि छोटी सी समस्या विशालकाय बनकर हमने निगलने के लिए मुंह फाडे हमारे सामने खडी हो जाती है। और समस्या भी इतनी विकराल कि पानी आग बुझाने की बजाए आग लगाने का काम करता है। दक्षिंण भारत के दो पडोसी राज्य कर्नाटक और तमिल नाडु के बीच कावेरी नदी के पानी बंटवारे को लेकर जारी विवाद यही प्रमाणित करता है। लगभग सौ साल से भी ज्यादा समय से जारी कावेरी नदी जल बंटवारा विवाद लटकते-लटकते आज इस नाजुक स्थिति पर पहुंच गया है कि कर्नाटक के लोग देश की सर्वोच्च अदालत के फैसले को भी मानने को तैयार नहीं है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट द्वारा कर्नाटक को तमिल नाडु के लिए दस दिन अतिरिक्त पानी जारी करने के निर्देश दिए जाने के बाद राज्य में विरोध की आग भडक गई और पुलिस को उपद्रवियों पर फायरिंग तक करनी पडी। इसमें एक की मौत हो गई। मंगलवार को राजधानी बंगलुरु के कई हिस्सों में कफर्यू लगाना पडा। बंगलुरु को देश में इंफॉर्मेषन टकनॉलॉजी (आई टी) का डेस्टिनेशन माना जाता है और यहां हर छोटी-बडी आईटी कंपनी का दफ्तर है। ऐसोचैम का आकलन है कि कावेरी नदी विवाद के कारण बंगलुरु बंद से अब तक आईटी कंपनियों को 20 से 25,000 करोड रु का नुकसान हो चुका है। और अगर हालात जन्द सुधरे नहीं तो नुकसान और ज्यादा बढ सकता है। हालात सुधरने की उम्मीद नजर नहीं आ रही है। राज्य सरकार ने अपने हाथ खडे कर दिए हैं। हालात बिगडते देख मंगलवार को राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप करने की मांग की है। सिद्धारमैया चाहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी तमिल नाडु की मुख्यमंत्री जयललिता से बातचीत कर समस्या का सर्वमान्य हल निकाले। और इस समस्या का हल भी यही है कि केन्द्र को दोनों राज्यों को साथ-साथ बैठाकर कोई स्थायी हल निकालना चाहिए। मगर इसमें पेंच यह है कि कोई भी राज्य अपने हक की एक बूंद पानी छोडने को तैयार नही है। और अगर सियासी नेता मान भी जाएं, तो भी जनता कतई तैयार नहीं है और पानी की एक-एक बूंद के लिए मरने-मारने पर आमादा हो जाते हैं। पंजाब और हरियाणा में लंबे समय से जल विवाद है मगर पंजाब के लोग अपने हिस्से से एक भी बूंद हरियाणा को देने को तैयार नहीं है। इस मामले में आए दिन एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने वाले नेता एक मंच पर इक्ठ्ठे हो जाते हैं। कावेरी जल विवाद की जड भी यही है। 802 किलोमीटर लंबी कावेरी नदी लगभग 54 फीसदी तमिल नाडु के हिस्से में बहती है और 42 फीसदी कर्नाटक के। साढे तीन फीसदी केरल में और थोडी बहुत पुडुचेरी में भी। मगर कावेरी नदी प्रमुखता तमिल नाडु और कर्नाटक की जल धारा है। कावेरी नदी के जल के बलबूते तमिल नाडु तीन लाख हेकेटेयर क्षेत्र को सिंचाई की निश्चित सुविधा मुहैया करा चुका है। और अब पानी की एक बूंद भी छोडने को तैयार नही है। कर्नाटक का कहना है कि 1892 और 1924 के दोनों ही अनुबंध तत्कालीन मद्रास प्रेजीडेंसी के पक्ष में थे । इसलिए वह इन्हें नहीं मानता। लंबे समय तक दोनों राज्यों में विवाद चलता रहा और जब नहीं सुलझा, 1990 में केन्द्र ने कावेरी जल विवाद के लिए पंचाट गठित किया। 16 साल की सुनवाई के बाद पंचाट ने फरवरी 2007 में फैसला सुनाया मगर संबंधित राज्यों ने इसे भी नहीं माना। और अब कर्नाटक की जनता सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी मानने से इंकार कर रही है और सरकार द्वारा तमिल नाडु को अतिरिक्त पानी रिलीज करने का हिंसक विरोध कर रही है। बहरहाल, कानून-व्यवस्था स्थिति से निपटना राज्य सरकार का काम है मगर केन्द्र को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी और समस्या का सर्व मान्य हल निकालना होगा।
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