गुरुवार, 7 अप्रैल 2016

“हे राजन, यह कैसा न्याय ?

भारतीय रिजर्व बैंक ने मंगलवार को ब्याज दर (रेपो रेट) घटाकर महंगे कर्ज की मार झेल रहे लोगों को थोडी राहत देने की कोशिश  की हैं बशर्ते मोटा मुनाफा कमा रहे बैंक सस्ता कर्ज देने के लिए आगे आएं। मंगलवार को आरबीआई ने रेपो रेट में 0.25 फीसदी की कटौती करके बैंकों को दिया जा रहा कर्जा  काफी सस्ता कर दिया। ताजा कट के बाद अब बैंकों को आरबीआई से साढे छह फीसदी (6.5) पर कर्ज मिला करेगा। इसकी तुलना में बैंक 9.75 फीसदी अथवा इससे भी ज्यादा ब्याज ग्राहकों से वसूल रहे हैं। पिछले करीब सवा साल में आरबीआई रेपो रेट डेढ फीसदी घटा चुका है मगर अधिकांश  बैंक अपने ग्राहकों के ब्याज में  बमुश्किल   आधा फीसदी कट का लाभ दे पाए हैं। सितंबर 2015 में आरबीआई ने रेपो रेट में आधा फीसदी की कमी की थी मगर देश  के अधिकतर बैंकों ने ग्राहकों को ज्यादा-से-ज्यादा 0.25 फीसदी का ही लाभ दिया। इसमें भी बैंक बडा खेल करते है और बडी चतुराई से ईएमआई कम करने की बजाय कर्ज की अवधि को घटाकर ग्राहकों को मूर्ख बना रहे हैं। मगर अब बैंक ऐसा नहीं कर पाएंगे। आरबीआई ने प्राइम लैंडिंग रेट तय करने के लिए नई व्यवस्था लागू की है। इसके अनुसार कर्ज की ब्याज दरें फडिंग की मार्जिनल कॉस्ट पर तय की जाएंगी। इसमें रिजर्व बैंक से लिए गए कर्ज  की ब्याज दर और डेपोजिट पर ब्याज दरों को ध्यान में रखा जाएगा। अब तक बैंक अपनी मनमर्जी से फडिंग कॉस्ट तय कर रहे हैं। इस माह की पहली तारीख से लागू नई व्यवस्था से रेपो रेट घटाए जाने पर बैंकों को ब्याज दरं भी घटानी ही पडेगी। बहरहाल, उदारीकरण के बाद बैंकिंग सेक्टर का निजीकरण होने से कर्ज अपेक्षाकृत महंगा हो गया है। निजी बैंकों की ही तर्ज पर सरकारी बैंक भी तरह-तरह की सर्विस चार्जेज वसूल कर मोटी कमाई कर रहे हैं। भारत में अभी भी कर्ज काफी महंगा है। सरकार का दावा है कि मुद्रा स्फीति पर काबू पा लिया गया है और मुद्रा-स्फीति उत्तरोतर कम हो रही है। फरवरी में थोक मूल्य सूचकांक (डब्लयूपीआई) सालाना 0.91 फीसदी के स्तर पर आ चुका था। पिछले सोलह महीनों में यह लगातार गिर रहा है। तथापि, आम आदमी के लिए इसका कोई लाभ नहीं मिल पाया है। महंगाई लगातार बढती जा रही है और खाद्य वस्तुओं की कीमतें आसमान को छू रही हैं। दालें इतनी महंगी हैं कि गरीब आदमी के पहुंच से बाहर हो गई हैं। मौसमी फल और सब्जियां भी आम आदमी की पहुंच से बाहर हो रही हैं। इसकी प्रमुख वजह है कि सस्ते पेट्रोल-डीजल का लाभ सरकार ने अपनी जेब में डाल लिया है और आम आदमी को इसका कोई लाभ नहीं मिला है। पिछले डेढ साल के दौरान अंतरराष्ट्रीय  बाजार में तेल की कीमतें लगातार गिर रहीं हैं मगर न तो सरकार ने और न ही ट्रांसर्पोटर्स  ने सस्ते तेल का लाभ लोगों तक पहुंचने दिया। न्याय का तकाजा है कि अगर कीमतें बढने पर उसी अनुपात में कर्ज  से लेकर खाने-पीने की हर वस्तु अथवा सर्विस के दाम बढाए जाते हैं, तो कम होने पर ऐसा ही होना चाहिए। मगर  ऐसा  होता नहीं है। ट्रांसर्पोटर्स तो छोडिए सरकार ने खुद सस्ते फ्यूल का पूरा फायदा लोगों तक नहीं पहुंचाया है। बैंकों ने भी यही किया है। कर्ज को सस्ता करने की बजाय बैंकों ने मुनाफा कमाने में अपनी भलाई समझी है। बहरहाल, रेपो रेट के ताजा कट से लोगों को कोई बहुत ज्यादा फायदा नहीं होने जा रहा है। बैकों पूरा का पूरा डेढ फीसदी कट का लाभ ग्राहकों को देने से रहे। अगर इस बार सस्ते ब्याज का पूरा फायदा भी दिया जाता है, तो भी ज्यादा से ज्यादा बीस लाख के होम लोन पर मात्र मात्र 325रु की राहत मिलेगी। महंगाई के इस जमाने में यह राहत “ ऊंट के मुंह में जीरा समान लगती है। इस स्थिति में मोदी सरकार और रिजर्व बैंक के गवर्नर से पूछा जा सकता है, “हे राजन यह कैसा न्याय“?