शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

देशप्रेम बनाम देशद्रोह?

जम्मू-कश्मीर  की ग्रीष्मकालीन  राजधानी श्रीनगर का नेशनल इंस्टीट्युट ऑफ टेकनोलोजी (एनआईटी) इन दिनों भीषण  राजनीति का  अखाडा बना हआ है। एनआईटी कैंपस में भारी उपद्रव के बाद पिछले  शुक्रवार  से संस्थान बद है, छात्रों से होस्टल्स खाली करवाकर  उन्हें घर भेज दिया गया है। जबकि इन दिनों परीक्षाएं चल रहीं थी। श्रीनगर एनआईटी में 2500 के करीब छात्र और चार सौ प्राध्यापक हैं। हैदराबाद की सेंट्रल यूनिवर्सिटी एवं जवाहर लाल यूनिवर्सिटी के बाद श्रीनगर की एनआईटी  केन्द्र सरकार द्वारा संचालित तीसरी ऐसी शैक्षणिक संस्था है जहां कौन देशभक्त है और कौन देशद्रोही, इस बात को लेकर छात्रों में गुटीय संघर्ष जारी  है। संघर्ष  की जड तीस मार्च  को वर्ल्ड कप ट्वेंटी20 के सेमीफाइनल में भारत और वेस्ट इंडीज मैच में भारत की हार पर जश्न  मनाने की घटना है। बताया जाता है कि भारत के खिलाफ आग उगलने वाले अलगाववादी संगठनों के हिमायतियों ने  मैच हारने पर   भारत के खिलाफ नारे लगाए। इस स्थिति में देशभक्त छात्रों का  खून खौलना स्वभाविक था। इस पर देशभक्त और देश द्रोही छात्रों के बीच उपद्रव  होना ही था। श्रीनगर एनआईटी में चूंकि बाहरी छात्रों की संख्या काफी ज्यादा है, इसलिए उपद्रव भडकने पर पुलिस ने उनकी ज्यादा पिटाई की। गैर-कश्मीरी  छात्रो को इस बात का गिला है कि देशभक्त होने पर भी पुलिस ने देशद्रोही नारे लगाने वालों की बजाय उनकी पिटाई की जबकि उनका कोई  कसूर नहीं था। पुलिस की इस कार्रवाई से केन्द्र में सत्तारूढ मोदी सरकार की काफी थू-थू हुई है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और कांग्रेस ने यहां तक कह दिया है कि भाजपा का राष्ट्रप्रेम  सिर्फ  दिखावा है। जम्मू-कश्मीर  में भाजपा समर्थक भी इस बात पर मोदी सरकार से खफा हे।  हमेशा  की तरह इस बार भी राजनीतिक दल छात्र-छात्राओं का राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। श्रीनगर एनआईटी की ताजा घटना ने फिर दर्शा   दिया है कि कश्मीर  घाटी में देसी राजनीतिक दलों की जगह पाकिस्तान के पिठ्ठू अलगाववादियों की तूती बोलती है। प्रतिभाशाली  छात्र राजनीति लफडों से हमेशा  कन्नी काटते रहे हैं मगर राजनीतिक दल अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए उनका इस्तेमाल करने से बाज नहीं आते। एनआईटी जैसी प्रतिश्ठित शैक्षणिक संस्था मे राजनीति के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। एनआईटी में गलाकाट प्रतियोगी परीक्षा के बाद ही दाखिला मिलता है और पढाकू छात्र-छात्राएं देशद्रोही नारे नहीं लगाते। दुखद स्थिति यह है कि ताजा विवाद ने एनआईटी के छात्रों को ही स्थानीय और बाहरी श्रेणी में बांट दिया है। कहा जा रहा है को भारत की हार का जश्न  मनाने वाले स्थानीय छात्र थे। इसलिए उन्हें देशद्रोही करार दिया जा रहा है। गैर-कश्मीरी  छात्रों को बाहरी बताया जा रहा है। इनमें राज्य के जम्मू प्रभाग के छात्र भी  शामिल है। कश्मीर  घाटी में अलगाववादी आवाज उठना कोई नई बात नहीं है। आए दिन घाटी में पाकिस्तान के पिठ्ठू एवं अलगाववादी भारत के खिलाफ आग उगलते रहते हैं। अलगाववादियों की रैलियों में पाकिस्तान और अब इस्लामिक स्टेट के झंडे फहराए जाते है। और अगर श्रीनगर में भारत और पाकिस्तान के बीच मैच खेला जाए, तो ज्यादातर  दर्शक  भारत की बनिस्बत पाकिस्तान का समर्थन करेंगे। इस बात के ही  मद्देनजर  श्रीनगर में कोई मैच नहीं कराया जाता है। श्रीनगर एनआईटी प्रकरण का दुखद पहलू यह है कि एक छोटे से मुद्दे को इतना बडा बना दिया गया कि इसकी चिंगारी पूरे देश  में फैल गई। ठीक उसी तर्ज  पर जिस तरह जवाहर लाल यूनिवर्सिटी के छात्र नेता कन्हैया कुमार और हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमूला की आत्महत्या के मामले को भाजपा समेत सभी राजनीतिक दलों ने खूब भुनाया। श्रीनगर एनआईटी प्रकरण से यह सवाल भी उठता है कि स्मृति ईरानी के केन्द्र मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा संचालित यूनिवर्सिटीज  अथवा भाजपा  शासित राज्यों में ही  ”देशभक्त बनाम देशद्रोह“ का मुद्दा बार-बार क्यों उछाला जा रहा है? क्या यह भाजपा के “हिंदुवादी“ एजेंडे का हिस्सा तो नहीं है?  असहिष्णुता और बैमन्सय का माहौल   एनआईटी जैसी प्रतिश्ठित  शैक्षणिक संस्था के लिए कतई शुभ नहीं है।