रविवार, 24 अप्रैल 2016

आईपीएल और जलसंकट


देश  के कई भागों में भयंकर सूखा व्याप्त है। लोग-बाग बूंद-बूंद पानी को तरस रहे है मगर भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को धन बटोरने वाले आयोजन इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की पडी है। क्या आईपीएल लोगों की प्यास बुझाने  से ज्यादा जरुरी है?  देश  की न्यायपालिका कई बार यह सवाल कर चुकी है। पिछले दिनों बंबई हाईकोर्ट ने  महाराष्ट्र में भीषण   सूखे की स्थिति के चलते राज्य में  मई माह में आईपीएल मैच खेले जाने पर रोक लगा दी थी। बुधवार को बीसीसीआई के विशेष  अनुरोध पर लॉजिस्टिग समस्याओं के मद्देनजर  हाई कोर्ट ने पहली मई को पुणे राइजिंग और मुंबई इंडियन के बीच मैच की अनुमति प्रदान कर दी। पिछले दिनों बंबई हाई कोर्ट को ही बताया गया था कि आईपीएल जैसे मैच के लिए पिच तैयार करने और उसे मेंटेन करने में एक बारगी तीन लाख लीटर पानी की जरुरत पडती है। महाराष्ट्र  में आईपीएल के बीस मैच कराए जाने थे। इस हिसाब से इन मैचों के लिए 60 लाख लीटर पानी की जरुरत थी। मुंबई के नामचीन वानखेडे स्टेडियम में ही  मात्र 8 मैचों के लिए 40 लाख लीटर पानी की दरकार थी। राज्य में व्याप्त भीषण  सूखे के कारण न्यायपालिका ने महाराष्ट्र में आईपीएल कराने की अनुमति नहीं दी और बीसीसीआई को 13 मैच महाराष्ट्र से बाहर शिफ्ट करने पडे । पूरे महाराष्ट्र में पीने के पानी की जबरदस्त किल्लत है। मराठवाडा में लोग पानी की एक-एक बूंद को सहेज कर रख रहे हैं और लातूर जैसे सूखाग्रस्त इलाकों में बीस दिन बाद पानी की सप्लाई की जा रही है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि राज्य में पानी कितना अनमोल है।  मराठवाडा  ही नहीं नवी मुंबई और थाणे जिले में भी सप्ताह में तीन दिन ही पीने का पानी मिल रहा है। जाहिर इस तरह की स्थिति में आईपीएल के आयोजनों के लिए 60 लाख लीटर पानी मुहैया कराने का मतलब था प्यासे लोगों से घोर अन्याय करना।   राज्य सरकार को जनता की भले ही चिंता न हो मगर देश  की न्यायपलिका को है। महाराष्ट्र के बाद अब राजस्थान हाई कोर्ट ने भी सूखा पीडित राज्य में आईपीएल मैच आयोजित करने पर तल्खी दिखाई है। राजस्थान में महाराश्ट्र से भी अधिक भीषण  सूखा है। सूखे की स्थिति से चिंतित हाई कोर्ट  ने राज्य सरकार से 27 अप्रैल तक जबाव मांगा है। 9 अप्रैल से  शुरु  हुआ इंडियन प्रीमियर लीग  का 29 मई को समापन है और इस दौरान कुल मिलाकर 60 मैच (56 आईपीएल और 4 प्ले ऑफ) खेले जाने हैं और कुछ खेले जा चुके  हैं । इन सब मैचों के आयोजन में दो करोड लीटर के करीब पानी बहा जाएगा। देश  के कई भागों में हर साल गर्मियों में भयंकर  सूखा पडता है और लोग-बाग बूंद-बूंद के लिए तरसते हैं। यह कहां का इंसाफ है कि आम आदमी पानी की एक-एक बूंद को तरसे और दूसरी ओर आईपीएल जैसे मनोरंजन में पानी को बर्बाद किया जाए । माना कि भारत में क्रिकेट के प्रति जुनून है और लोग-बाग भूखे-प्यासे रहकर भी क्रिकेट मैच देखते हैं मगर जिस गरीब के घर में पीने के लिए पानी की एक बूंद भी न हो, उसे क्रिकेट से कोई सरोकार नहीं है। पीने के पानी के लिए तरस रहे लोगों को पानी मुहैया कराना सरकार की नैतिक जिम्मेदारी हे, भले ही इसके लिए आईपीएल को कुर्बान करना पडे। बीसीसीआई को भी यह बात समझनी होगी कि भीषण  गर्मी के मौसम में आईपीएल का आयोजन कोई हंसी-मजाक नहीं है। आजादी के लगभग सात दश क बाद भी सरकार अधिकतर लोगों को पर्याप्त स्वच्छ पेयजल की सुविधा मुहैया नहीं कर पाई है। हर साल गर्मियों में लोगों को पीने के पानी के लिए तरसना पडता है। पीने का पानी मूलभूत सुविधा है और सरकार यही सुविधा उपलब्ध नहीं करा पाई है। जनता से जुडे अहम मसलों पर बार-बार न्यायापालिका को हीं पहल करनी पडती है? जो काम सरकार का है, उसे न्यायपालिका को ही क्यों करना पड रहा है? इससे जनमानस में यह संदेश  जा रहा हे कि समकालीन सरकारें अपनी जिमेदारियां निभाने में पूरी तरह से विफल हो रही हैं। आखिर यह सिलसिला कब तक चलेगा? बहरहाल, बीसीसीआई अगले साल आईपीएल  देश  के बाहर आयोजित करने पर विचार कर रही है। पीने के पानी के भीषण  संकट से जूझ रहे देश  के लिए यही बेहतर होगा। पानी और सुरक्षा प्रबंधों के अलावा आईपीएल आयोजन से जुडे और भी सौ तरह के झंझट हैं और सरकार को इन सब में पडने की जरुरत नहीं है। भारत में कुश्ती  और कब्बडी जैसी स्थानीय खेल प्रतियिगिताएं ज्यादा प्रासंगिक हो सकती हैं।