शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

मोदी सरकार को जोर का झटका

उत्तराखंड उच्च न्यायालय के फैसले से मोदी सरकार को जो जोरदार झटका लगा है, उससे कहीं ज्यादा इस ऐतिहासिक फैसले से लोकतंत्र की जबरदस्त जीत हुई है। केन्द्र सरकार भले ही सर्वोच्च न्यायालय जाए और खुदा-न-खास्ता अगर उच्च न्यायालय का फैसला पलट भी दिया जाता है, तब भी यह आने वाले समय में  केन्द्र को संविधान के अनुच्छेद 356 में प्रदत पॉवर का बेजा इस्तेमाल करने के लिए कचोटता रहेगा। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में साफ-साफ कहा है कि “जनता द्वारा चुनी गई सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाना लोगों से विश्वासघात  है“। वीरवार को उच्च न्यायालय ने उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन को निरस्त करते हुए हरीश  रावत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को पदस्थ करके लोकतंत्र  बहाल कर दिया। विधानसभा भी जीवंत हो गई है और उच्च न्यायालय ने हरीश  रावत को अगले  शुक्रवार ( 29 अप्रैल) को सदन में  विश्वास  मत हासिल करने को कहा है। लोकतंत्र में सताधारी दल के बहुमत साबित करने का यही एकमात्र संवैधानिक विकल्प है और राज्यपाल को इसे आजमाना चाहिए था। तथापि, समकालीन राज्यपाल अपने पद और गरिमा की मर्यादा भूल कर बतौर केन्द्र के एजेंट काम कर रहे हैं। उत्तराखंड से पहले पूर्वोतर राज्य अरुणाचल प्रदेश  में भी राज्यपाल ने वही किया था जो केन्द्र ने उनसे करने को कहा था। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की तरह गुवाहटी हाई कोर्ट  ने भी अरुणाचल प्रदेश  के  राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा की कार्यशैली पर तल्ख टिप्पणी की थी। राज्यपाल राजखोवा ने विधानसभा आहुत करने की अपनी ही अधिसूचना निरस्त कर दी थी और अपनी मर्जी से विधानसभा का सत्र पहले बुला लिया था। असम के मुख्य सचिव रह चुके राजखोवा को यह बात बखूबी मालूम थी कि मंत्रिमंडल की सिफारिश  के बगैर विधानसभा का सत्र बुलाया ही नहीं जा सकता। और केद्र चुपचाप यह तमाशा  देखता रहा। अरुणाचल प्रदेश  में भाजपा ने कांग्रेस से थोक में दल-बदल कराकर पहले सरकार गिरा दी, फिर राष्ट्रपति शासन लगा दिया और थोडे ही समय बाद दल-बदलुओं से मिलकर सरकार बना ली। भाजपा उत्तराखंड में भी अरुणाचल प्रदेश  कांड दोहराना चाहती थी। कांग्रेस के नौ विधायक पार्टी से बगावत करके भाजपा के साथ मिल गए और रावत सरकार को गिराने पर आमादा हो गए। नियमानुसार पार्टी के कम-से-कम एक तिहाई विधायक अगर बगावत करते हैं, तो वे दल-बदल कानून की जद में नहीं आते हैं। उत्तराखंड में ऐसा नहीं था। सियासी दलों ने मिलकर दल-बदल कानून में यह व्यवस्था की है और इससे दल-बदल कानून बनाने का मूल मकसद ही पराजित हो गया है। भाजपा को जब लगा कि वह दलबदलुओं के साथ सरकार नहीं बना सकती, उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। संवैधानिक व्यवस्था यह है कि इस तरह की स्थिति में सत्तारूढ दल को विधानसभा में बहुमत साबित करना का अवसर दिया जाना चाहिए था। उत्तराखंड में अगर हरीश  रावत को विधानसभा में विश्वास  मत लेने को कहा जाता, तो कोई पहाड नहीं टूट पडता। राज्यपाल को यही विकल्प चुनना चाहिए था मगर इस स्थिति में भाजपा के मंसूबे पूरे नहीं होते। बहरहाल, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश  में सरकार गिराने में संबंधित राज्यपालों की भूमिका ने इस संवैधानिक पद की प्रासंगिकता पर ही सवाल खडा हो गया है। उत्तराखंड और इससे पहले गुवाहटी उच्च न्यायालय की राज्यपालों की “पक्षपाती“ भूमिका पर तल्ख टिप्पणियों का एक ही निष्कर्ष   है कि संवैधानिक पद की मर्यादा बुरी तरह से भंग हुई है। कहावत है “बाढ ही खेत को खाने लग जाए तो फसल की रखवाली कौन करेगा“। संविधान के रक्षक  राज्यपाल  ही अगर संविधान का अपमान करने लग जाए तो संघीय ढांचे को कौन बचाएगा“।  अब मोदी सरकार क्या करेगी? शुक्र है देश  की न्यायपालिक अपना काम बखूबी कर रही हैं। उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश  के घटनाक्रमों से देश  का संघीय ढांचा कमजोर हुआ है पर  न्यायपालिका ने इसे संरक्षित रखने की हर संभव कोशिश   की है।