कश्मीर घाटी की ताजा घटनाएं बेहद निराशाजनक हैं। उत्तरी कश्मीर के हंदवारा में जो कुछ भी हुआ, उसने घाटी में शांति बहाली के प्रयासों पर पानी फेर दिया है। पिछले कई दिनों से उत्तरी कश्मीर में कर्फ्यू जैसे प्रतिबंध लगाए गए हैं। बाजार बंद पडे हैं और यात्री बसें एवं ऑटो-रिक्षा भी नहीं चल रहे हैं। यह कोई नई बात नही है। कश्मीर घाटी में आए रोज अलगाववादी उपद्रव मचाकर बाजार बंद कराते हैं और तनावपूर्ण माहौल बनाते हैं। यह सब पाकिस्तानी पिठ्ठुओं की साजिश होती है। कश्मीर में शांति और स्थिरता अलगाववादियों के नापाक मंसूबों पर पानी फेर देती हैं। इसलिए अलगाववादी घाटी में हर समय अस्थिरता पैदा करने की फिराक में रहते है। घाटी में सेना की मौजूदगी अलगाववादियों को फूटी आंख नहीं सुहाती। सेना की मौजूदगी में उनके नापाक इरादें कामयाब नहीं हो रहे हैं। इसलिए अलगाववाद सेना को बदनाम करने का कोई मौका नहीं चूकते। हंदवारा के ताजा घटनाक्रम यही दर्शाते हैं कि अलगाववादी किस तरह सेना को बदनाम कर उसे घाटी से बाहर रखना चाहते हैं। राज्य में सतारूढ पीडीपी और मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती भी कश्मीर से सेना हटाने और आर्म्ड फोर्सिस स्पेशल पावर्स एक्ट (एएफएसपीए) को निरस्त करने की पुरजोर मांग करती रही है। (एएफएसपीए) के तहत सुरक्षा बलों को बगैर किसी सर्च वारंट के किसी भी जगह पर छापा मारने, तलाशी लेने अथवा शक पर किसी को भी गिरफ्तार करने के अधिकार दिए गए हैं। बहरहाल, हंदवारा घटना यह भी दर्शाती हैं कि घाटी में अलगाववादी और पाकिस्तान समर्थक आतंकी किस तरह प्रशासन और सुरक्षा बलों पर भारी पड रहे है। हंदवारा घटना की शुरुआत एक अफवाह से हुई।पिछले मंगलवार को एक युवती ने आरोप लगाया था कि फौज के बंकर के निकट स्थित सार्वजनिक शौचालय में एक सैनिक ने उससे छेडछाड की। इस पर कुछ स्थानीय युवक भडक गए। हालांकि बाद में युवती ने शिकायत वापस लेते हुए आरोप लगाया कि उसने यह सब कुछ स्थानीय युवकों के कहने पर किया था। इससे पहले ही स्थिति काफी बिगड चुकी थी। युवकों द्वारा सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी किए जाने से सैनिकों को उपद्रवियों पर फायरिंग करनी पडी और इसमें तीन लोगों मारे गए। बस फिर क्या था। अलगाववादियों ने स्थिति को खूब भुनाया और पूरी घाटी में उपद्रव मचाना शुरू कर दिया । नतीजतन, प्रशासन को हिंसा और उपद्रव रोकने के लिए कर्फ्यू जैसे प्रतिबंध लगाने पडे । अलगाववादी यही चाहते थे। कश्मीर जितना अस्थिर रहेगा, अलगाववादी इससे फलते-फूलते रहेंगे। राज्य सरकार और सेना प्रशासन दोनों ही हंदवारा घटनाक्रम की जांच करवा रही हैं। इस तरह की जांच कितनी भी निष्पक्ष क्यों न हो, अलगववादी रिपोर्ट को मानने से रहे़। अब यह बात सरकार और सेना पर निर्भर है कि रिपोर्ट के निष्कर्षों कों लेकर वे जनमानस को कितना संतुष्ट कर पाते हैं। अब तक की जाच रिपोर्टस को जनमानस नकारती रही है। राज्य में हाल ही में महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व में पीडीपी-भाजपा की सरकार बनी है और राज्य की पहली मुख्यमंत्री को सत्ता संभालते ही पहले श्रीनगर एनआईटी (नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ टेकनोलॉजी) में देशद्रोही नारे लगने के मामले से और अब हंदवारा घटनाक्रम से जूझना पड रहा है। अलगाववादी महबूबा मुफ्ती पर दिल्ली का साथ छोडने के लिए दबाव बनाना चाहते हैं। महबूबा पर जब तक प्रधानमंत्री का वरदहस्त रहेगा, राज्य को उदार वितीय मदद मिलती रहेगी और कश्मीर में शांति बहाली के भरसक प्रयास होते रहेंगे। इस स्थिति में अलगाववाद और पाकिस्तान प्रायोजित आतंक कमजोर होता है। पाकिस्तानी आतंकी और अलगाववादी इस स्थिति को बिगाडने की हरसंभव कोशिश करेंगे और वे अब तक इसमें कामयाब रहे हैं। श्रीनगर एनआईटी में गत 30 मार्च को भारत-वेस्ट इंडीज मैच के दौरान भारत विरोधी नारे लगाने पर छात्रों को “स्थानीय और बाहरी“ में बांटकर टकराव पैदा कर और हंदवारा में सेना के खिलाफ माहौल बनाकर शांति भंग करके अलगाववादियों ने अपने नापाक इरादे साफ कर दिए हैं। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के समक्ष इससे निपटना सबसे बडी चुनौती है।
सोमवार, 18 अप्रैल 2016
उबलती कश्मीर घाटी
Posted on 8:13 pm by mnfaindia.blogspot.com/
कश्मीर घाटी की ताजा घटनाएं बेहद निराशाजनक हैं। उत्तरी कश्मीर के हंदवारा में जो कुछ भी हुआ, उसने घाटी में शांति बहाली के प्रयासों पर पानी फेर दिया है। पिछले कई दिनों से उत्तरी कश्मीर में कर्फ्यू जैसे प्रतिबंध लगाए गए हैं। बाजार बंद पडे हैं और यात्री बसें एवं ऑटो-रिक्षा भी नहीं चल रहे हैं। यह कोई नई बात नही है। कश्मीर घाटी में आए रोज अलगाववादी उपद्रव मचाकर बाजार बंद कराते हैं और तनावपूर्ण माहौल बनाते हैं। यह सब पाकिस्तानी पिठ्ठुओं की साजिश होती है। कश्मीर में शांति और स्थिरता अलगाववादियों के नापाक मंसूबों पर पानी फेर देती हैं। इसलिए अलगाववादी घाटी में हर समय अस्थिरता पैदा करने की फिराक में रहते है। घाटी में सेना की मौजूदगी अलगाववादियों को फूटी आंख नहीं सुहाती। सेना की मौजूदगी में उनके नापाक इरादें कामयाब नहीं हो रहे हैं। इसलिए अलगाववाद सेना को बदनाम करने का कोई मौका नहीं चूकते। हंदवारा के ताजा घटनाक्रम यही दर्शाते हैं कि अलगाववादी किस तरह सेना को बदनाम कर उसे घाटी से बाहर रखना चाहते हैं। राज्य में सतारूढ पीडीपी और मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती भी कश्मीर से सेना हटाने और आर्म्ड फोर्सिस स्पेशल पावर्स एक्ट (एएफएसपीए) को निरस्त करने की पुरजोर मांग करती रही है। (एएफएसपीए) के तहत सुरक्षा बलों को बगैर किसी सर्च वारंट के किसी भी जगह पर छापा मारने, तलाशी लेने अथवा शक पर किसी को भी गिरफ्तार करने के अधिकार दिए गए हैं। बहरहाल, हंदवारा घटना यह भी दर्शाती हैं कि घाटी में अलगाववादी और पाकिस्तान समर्थक आतंकी किस तरह प्रशासन और सुरक्षा बलों पर भारी पड रहे है। हंदवारा घटना की शुरुआत एक अफवाह से हुई।पिछले मंगलवार को एक युवती ने आरोप लगाया था कि फौज के बंकर के निकट स्थित सार्वजनिक शौचालय में एक सैनिक ने उससे छेडछाड की। इस पर कुछ स्थानीय युवक भडक गए। हालांकि बाद में युवती ने शिकायत वापस लेते हुए आरोप लगाया कि उसने यह सब कुछ स्थानीय युवकों के कहने पर किया था। इससे पहले ही स्थिति काफी बिगड चुकी थी। युवकों द्वारा सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी किए जाने से सैनिकों को उपद्रवियों पर फायरिंग करनी पडी और इसमें तीन लोगों मारे गए। बस फिर क्या था। अलगाववादियों ने स्थिति को खूब भुनाया और पूरी घाटी में उपद्रव मचाना शुरू कर दिया । नतीजतन, प्रशासन को हिंसा और उपद्रव रोकने के लिए कर्फ्यू जैसे प्रतिबंध लगाने पडे । अलगाववादी यही चाहते थे। कश्मीर जितना अस्थिर रहेगा, अलगाववादी इससे फलते-फूलते रहेंगे। राज्य सरकार और सेना प्रशासन दोनों ही हंदवारा घटनाक्रम की जांच करवा रही हैं। इस तरह की जांच कितनी भी निष्पक्ष क्यों न हो, अलगववादी रिपोर्ट को मानने से रहे़। अब यह बात सरकार और सेना पर निर्भर है कि रिपोर्ट के निष्कर्षों कों लेकर वे जनमानस को कितना संतुष्ट कर पाते हैं। अब तक की जाच रिपोर्टस को जनमानस नकारती रही है। राज्य में हाल ही में महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व में पीडीपी-भाजपा की सरकार बनी है और राज्य की पहली मुख्यमंत्री को सत्ता संभालते ही पहले श्रीनगर एनआईटी (नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ टेकनोलॉजी) में देशद्रोही नारे लगने के मामले से और अब हंदवारा घटनाक्रम से जूझना पड रहा है। अलगाववादी महबूबा मुफ्ती पर दिल्ली का साथ छोडने के लिए दबाव बनाना चाहते हैं। महबूबा पर जब तक प्रधानमंत्री का वरदहस्त रहेगा, राज्य को उदार वितीय मदद मिलती रहेगी और कश्मीर में शांति बहाली के भरसक प्रयास होते रहेंगे। इस स्थिति में अलगाववाद और पाकिस्तान प्रायोजित आतंक कमजोर होता है। पाकिस्तानी आतंकी और अलगाववादी इस स्थिति को बिगाडने की हरसंभव कोशिश करेंगे और वे अब तक इसमें कामयाब रहे हैं। श्रीनगर एनआईटी में गत 30 मार्च को भारत-वेस्ट इंडीज मैच के दौरान भारत विरोधी नारे लगाने पर छात्रों को “स्थानीय और बाहरी“ में बांटकर टकराव पैदा कर और हंदवारा में सेना के खिलाफ माहौल बनाकर शांति भंग करके अलगाववादियों ने अपने नापाक इरादे साफ कर दिए हैं। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के समक्ष इससे निपटना सबसे बडी चुनौती है।






