शुक्र है अततः जम्मू-कश्मीर में लोकप्रिय सरकार बन ही गई। दिवंगत मुफ्ती मोहम्मद सईद की सुपुत्री महबूबा मुफ्ती ने तीन माह तक राज्य में राजनीतिक अस्थिरता बनाए रखने के बाद अततः सोमवार को मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण कर ही ली। महबूबा राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री होंगी। देश में मुख्यमंत्री का पदभार संभालने वाली वे दूसरी मुसलमान मुख्यमंत्री होंगी। इससे पहले 1980 में सईदा अनवर तैमूर असम में देश की पहली मुस्लिम मुख्यमंत्री बनी थीं। वे चार साल तक इस पद पर आसीन रहीं थी। महबूबा के साथ 23 सदस्यीय मंत्रिमंडल को भी शपथ दिलाई गई। मुफ्ती मोहम्मद सईद मंत्रिमंडल में शामिल चार “असतुंष्टों " को महबूबा मंत्रिमंडल से बाहर रखा गया है। इनमें मुफ्ती मंत्रिमंडल के ताकतवर नेता ओर बिजनेसमैन अलताफ बुखारी भी शामिल है। महबूबा मुफ्ती द्वारा भाजपा के साथ सरकार बनाने में विलंब किए जाने पर बुखारी ने तीन और विधायकों को साथ लेकर बगावत की थी और भाजपा के साथ सरकार बनाने के लिए जोड-तोड की थी। बुखारी की इस हिमाकत से महबूबा खासी नाराज हैं। इसी कारण बुखारी के साथ तीन अन्य “असतुंष्टों "- जावेद मुस्तफा मीर, मोहम्मद अशरफ मीर तथा माजिद पद्दर- को महबूबा ने अपने मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया है। मुख्यमंत्री को मिलाकर 24 सदस्यीय मंत्रिमंडल का आकार संतुलित लगता है। 87 सदस्यीय विधान सभा में महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी के 27 विधायक हैं और भाजपा के 25। सज्जाद गनी लोन की पीपुल्स कॉफ्रेस के दो विधायक और दो निर्दलीय भी पीडीपी-भाजपा गठबंधन के साथ हैं। इस तरह सतारूढ गठबंधन को 56 विधायकों का समर्थन है और यह गठबंधन सरकार आराम से चल सकता है। महबूबा को केन्द्र सरकार का भरपूर समर्थन भी है और इसका राज्य को काफी लाभ भी मिल सकता है। केन्द्र सरकार से राज्य को पहले से उदार वित्त्तीय मदद मिल रही है। जम्मू-कश्मीर देश का एकमात्र मुसलमान बहुल राज्य है। मुस्लिम महिला का मुख्यमंत्री बनना इस संवेदनशील राज्य के लिए सुखद बात है। जम्मू-कश्मीर लंबे समय से आतंक और हिंसा से पीडित है। इस स्थिति में राजनीतिक अस्थिरता से राज्य की अवाम का अहित हो रहा था। सात जनवरी को मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद राजनीतिक अस्थिरता के चलते जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन ( जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति की जगह राज्यपाल शासन लगाने की संवैधानिक व्यवस्था है) लगाना पडा था। राजनीतिक अस्थिरता से राज्य की अवाम का अहित हो रहा था। महबूबा मुफ्ती भाजपा के साथ सरकार बनाने के लिए तैयार नहीं थी। इसकी प्रमुख वजह है कश्मीर की स्वायत्तता को सुनिश्चित्त करनी वाली संवैधानिक व्यवस्था (अनुच्छेद 370) के खिलाफ भाजपाइयों का जब-तब आग उगलना। जम्मू के भाजपाई नेता अभी भी इस व्यवस्था को निरस्त करने की मांग कर रहे हैं। अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर में बाहर का कोई भी व्यक्ति जमीन-जायदाद नहीं खरीद सकता और न ही राज्य में स्थायी तौर पर सैटल हो सकता है। देश के आजाद होने पर तत्कालीन रियासतों के विलय पर कश्मीर की अवाम के साथ यह संवैधानिक समझौता हुआ था। देश के एकमात्र मुसलमान बहुल आबादी वाले राज्य में बहुसंख्यकों के हितों को सुरक्षित रखने के लिए यह व्यवस्था की गई थी और इसे किसी भी सूरत में निरस्त नहीं किया जा सकता। मगर भाजपा इसे निरस्त करने पर आमाद है। पार्टी के संस्थापक डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इसके लिए अपने जीवन का वलिदान तक दे दिया था। भाजपा को लगता है कि अगर पार्टी अपने इस स्टैंड से पीछे हटती है तो जम्मू में उसका जनाधार खिसक सकता है। महबूबा को सरकार बनाने बाद भी यही चिंता सताती रहेगी कि भाजपा कभी भी इस दबी मांग को उछाल सकती है। वैसे भी पीडीपी और भाजपा में खासे वैचारिक मतभेद हैं। सत्ता की खातिर वैचारिक मतभेदों को दबाने से दोनों दलों का जनाधार सिकुड सक्कता है। “ कहीं की ईंट कहीं का रोडा, भानुमति ने कुनबा जोडा“ जैसे गठबंधन से सरकार तो बनाई जा सकती है मगर चलाई नहीं जा सकती। यह गठबंधन कब तक बना रहता है और इस संवेदनशील राज्य में क्या गुल खिलाता है, इस पर सब की नजर रहेगी।
मंगलवार, 5 अप्रैल 2016
शुक्र है सरकार बन गई !
Posted on 4:17 pm by mnfaindia.blogspot.com/
शुक्र है अततः जम्मू-कश्मीर में लोकप्रिय सरकार बन ही गई। दिवंगत मुफ्ती मोहम्मद सईद की सुपुत्री महबूबा मुफ्ती ने तीन माह तक राज्य में राजनीतिक अस्थिरता बनाए रखने के बाद अततः सोमवार को मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण कर ही ली। महबूबा राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री होंगी। देश में मुख्यमंत्री का पदभार संभालने वाली वे दूसरी मुसलमान मुख्यमंत्री होंगी। इससे पहले 1980 में सईदा अनवर तैमूर असम में देश की पहली मुस्लिम मुख्यमंत्री बनी थीं। वे चार साल तक इस पद पर आसीन रहीं थी। महबूबा के साथ 23 सदस्यीय मंत्रिमंडल को भी शपथ दिलाई गई। मुफ्ती मोहम्मद सईद मंत्रिमंडल में शामिल चार “असतुंष्टों " को महबूबा मंत्रिमंडल से बाहर रखा गया है। इनमें मुफ्ती मंत्रिमंडल के ताकतवर नेता ओर बिजनेसमैन अलताफ बुखारी भी शामिल है। महबूबा मुफ्ती द्वारा भाजपा के साथ सरकार बनाने में विलंब किए जाने पर बुखारी ने तीन और विधायकों को साथ लेकर बगावत की थी और भाजपा के साथ सरकार बनाने के लिए जोड-तोड की थी। बुखारी की इस हिमाकत से महबूबा खासी नाराज हैं। इसी कारण बुखारी के साथ तीन अन्य “असतुंष्टों "- जावेद मुस्तफा मीर, मोहम्मद अशरफ मीर तथा माजिद पद्दर- को महबूबा ने अपने मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया है। मुख्यमंत्री को मिलाकर 24 सदस्यीय मंत्रिमंडल का आकार संतुलित लगता है। 87 सदस्यीय विधान सभा में महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी के 27 विधायक हैं और भाजपा के 25। सज्जाद गनी लोन की पीपुल्स कॉफ्रेस के दो विधायक और दो निर्दलीय भी पीडीपी-भाजपा गठबंधन के साथ हैं। इस तरह सतारूढ गठबंधन को 56 विधायकों का समर्थन है और यह गठबंधन सरकार आराम से चल सकता है। महबूबा को केन्द्र सरकार का भरपूर समर्थन भी है और इसका राज्य को काफी लाभ भी मिल सकता है। केन्द्र सरकार से राज्य को पहले से उदार वित्त्तीय मदद मिल रही है। जम्मू-कश्मीर देश का एकमात्र मुसलमान बहुल राज्य है। मुस्लिम महिला का मुख्यमंत्री बनना इस संवेदनशील राज्य के लिए सुखद बात है। जम्मू-कश्मीर लंबे समय से आतंक और हिंसा से पीडित है। इस स्थिति में राजनीतिक अस्थिरता से राज्य की अवाम का अहित हो रहा था। सात जनवरी को मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद राजनीतिक अस्थिरता के चलते जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन ( जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति की जगह राज्यपाल शासन लगाने की संवैधानिक व्यवस्था है) लगाना पडा था। राजनीतिक अस्थिरता से राज्य की अवाम का अहित हो रहा था। महबूबा मुफ्ती भाजपा के साथ सरकार बनाने के लिए तैयार नहीं थी। इसकी प्रमुख वजह है कश्मीर की स्वायत्तता को सुनिश्चित्त करनी वाली संवैधानिक व्यवस्था (अनुच्छेद 370) के खिलाफ भाजपाइयों का जब-तब आग उगलना। जम्मू के भाजपाई नेता अभी भी इस व्यवस्था को निरस्त करने की मांग कर रहे हैं। अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर में बाहर का कोई भी व्यक्ति जमीन-जायदाद नहीं खरीद सकता और न ही राज्य में स्थायी तौर पर सैटल हो सकता है। देश के आजाद होने पर तत्कालीन रियासतों के विलय पर कश्मीर की अवाम के साथ यह संवैधानिक समझौता हुआ था। देश के एकमात्र मुसलमान बहुल आबादी वाले राज्य में बहुसंख्यकों के हितों को सुरक्षित रखने के लिए यह व्यवस्था की गई थी और इसे किसी भी सूरत में निरस्त नहीं किया जा सकता। मगर भाजपा इसे निरस्त करने पर आमाद है। पार्टी के संस्थापक डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इसके लिए अपने जीवन का वलिदान तक दे दिया था। भाजपा को लगता है कि अगर पार्टी अपने इस स्टैंड से पीछे हटती है तो जम्मू में उसका जनाधार खिसक सकता है। महबूबा को सरकार बनाने बाद भी यही चिंता सताती रहेगी कि भाजपा कभी भी इस दबी मांग को उछाल सकती है। वैसे भी पीडीपी और भाजपा में खासे वैचारिक मतभेद हैं। सत्ता की खातिर वैचारिक मतभेदों को दबाने से दोनों दलों का जनाधार सिकुड सक्कता है। “ कहीं की ईंट कहीं का रोडा, भानुमति ने कुनबा जोडा“ जैसे गठबंधन से सरकार तो बनाई जा सकती है मगर चलाई नहीं जा सकती। यह गठबंधन कब तक बना रहता है और इस संवेदनशील राज्य में क्या गुल खिलाता है, इस पर सब की नजर रहेगी।






