इसे देश का दुर्भाग्य ही माना जाएगा कि आजादी के लगभग सात दशक बीत जाने के बाद भी सरकार के पास कोई कारगर जल नीति नहीं है। गर्मियों में पीने के पानी की भारी किल्लत के बावजूद जल संसाधनों का कैसे सदुपयोग किया जाए, इस पर सरकार ने कभी सोचा ही नहीं। अभी तक जल संसाधनों के सदुपयोग पर कोई कारगर नीति नहीं है। और जल से जुडे मामलों का प्रदूषण कानून के तहत निपटारा किया जाता है। जल प्रदूषण को लेकर कानून है मगर जल के उपयोग को लेकर कोई कानून नहीं है। जल का कैसे उपयोग किया जाए, किसी भी राज्य ने इस पर आज तक विचार ही नहीं किया जबकि जल संविधान की स्टेट लिस्ट में है। जल का कैसे उपयोग किया जाए, मौजूदा भीषण जल संकट की स्थिति में यह पहलू सबसे अहम है। पेयजल लोगों की बुनियादी जरुरत है और इसे मुहैया कराना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है। इसलिए, सबसे पहले पीने के पानी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कृषि और कमर्शियल उपयोग इसके बाद आते हैं। देश की न्यायपालिका ने भी जल के सदुपयोग को लेकर स्पष्ट नीति बनाने पर जोर दिया है। देश के कई भागों में एक ओर जहां पीने के पानी की भीषण किल्लत है, वही राज्यों की सरकारें इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के मैचों के लिए माकूल पानी मुहैया करा रही है। बंबई हाई कोर्ट ने इस पर सख्त नाराजगी जताते हुए जल संकट से जूझ रहे महाराष्ट्र मे मई माह के दौरान आईपीएल मैचों के आयोजन पर प्रतिबंध लगा दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी बंबई हघ कोर्ट के फैसले से सहमति जताई है। राजस्थान हाई कोर्ट बुधवार (27 अप्रैल) को व्यवस्था देगा कि भीषण जल संकट से जूझ रहे राज्य में आईपीएल मैच खेलने के लिए पानी उपलब्ध है या नहीं। आयोजकों ने बंबई हाई कोर्ट में खुलासा किया था कि एक आईपीएल मैच के लिए कम-से-कम तीन लाख लीटर पानी की जरुरत पडती है। अब न्यायपालिका तय करेगी कि तीन लाख लीटर पानी चार घंटे के लिए मनोरंजन करने वाले आईपीएल मैच को दिया जाए या बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे प्यासे लोगों को। लोकतंत्र में “जनता द्वारा, जनता के लिए और जनता की“ सरकार भीषण सूखे की स्थिति में आईपीएल के लिए कैसे तैयार हो गई, यब बात भी चींकाने वाली है। न्यायपालिका अगर इस मामले में दखल नहीं देती, तो लोगो को इस बात की भनक तक नहीं लगती कि आईपीएल मैच में कितना अमूल्य पानी जाया किया जा रहा है। मनोरंजन लोगों के जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हो सकता। बहरहाल, उपलब्ध जल संसाधनों का कैसे वैज्ञानिक तरीके से सदुपयोग किया जए, इसके लिए राष्ट्रीय नीति बननी ही चाहिए। मोदी सरकार ने इस मामले में भी पहल की है और प्रस्तावित मॉडल नीति का प्रारुप तैयार किया जा रहा है। राज्यों की सहमति के बाद राज्यों को इसे कानून बनाने को कहा जाएगा। इस समय जल से संबंधित मामले 1974 के (प्रिवेशन एंड कंट्रोल अॅाफ पॉल्यूशन) एक्ट और इन्वायरमेट प्रोटेक्शन एक्ट 1986 के तहत निपटाए जाते हैं मगर दोनों ही कानून प्रदूषण से संबधित हैं। केन्द्र सरकार ने 1987 में राष्ट्रीय जल नीति बनाई थी और इसे 2002 और 2012 में अपडेट भी किया गया मगर यह नीति कारगर साबित नहीं हुई। अधिकतर राज्यों ने इसे नहीं माना। जल राज्य का मामला है। केद्र राज्यों को सिर्फ राय दे सकता है। तथापि, जल संसाधनों का बंटवारा राज्यों के बीच टकराव का सबसे बडा कारण है। भारत में दुनिया की 15 फीसदी आबादी बसती है मगर उसके पास मात्र 4 फीसदी जल संसाधन है। पानी के तर्कसंगत इस्तेमाल के लिए नदियों को जोडना एकमात्र पुख्ता विकल्प है मगर संबंधित राज्य इसमें अडंगा अडाते हैं। पंजाब और हरियाणा में सतलुज-यमुना लिंक का मामला इसकी ज्वलंत मिसाल है। भारत के पास इस समय लगभग 690 अरब क्यूुबिक मीटर (बीसीएम) जल भंडारण की क्षमता है मगर अमल में 253 बीसीएम क्षमता ही रह जाती है। लीकेज और अकुशलता से आधे से ज्यादा पानी बर्बाद हो जाता है। इस पर तपती गर्मी में अधिकांश जल भंडार सूख जाते है और इससे पानी की भीषण किल्लत हो जाती है। भूमिगत जल स्तर (वाटर टेबल) निरंतर गिरता जा रहा है और 70 फीसदी पानी प्रदूषित है। इस स्थिति में भीषण गर्मी में लोगों को पीने का पानी मुहैया कराना, सरकार के समक्ष सबसे बडी चुनौती है। वैसे भी विज्ञानी चेता चुके हैं कि अगला युद्ध पानी के लिए लडा जाएगा। ताजा हालात यही संकेत दे रहे हैं।
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