शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

...और अब नुक्लेअर आतंक का खतरा

बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में यूरोपियन यूनियन के नेताओं से बातचीत के बाद  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नुक्लेअर आतंक के शिखर सम्मलेन (  नुक्लेअर सिक्योरिटी समिट) में शरीक होने  वाशिंगटन  पहुंच गए हैं।।  ब्रसेल्स में  यूरोपियन यूनियन के नेताओं से  शिखर वार्ता सार्थक रही है। भारत-यूरोपियन की 13वीं  शिखर वार्ता  लगभग चार साल बाद सपन्न हुई है। पिछली बार  वार्ता 2012 में नई दिल्ली में आयोजित की गई थी। भारतीय मछुआरों की हत्या को लेकर इटली से जारी विवाद के कारण पिछले चार साल से  भारत-यूरोपियन यूनियन  शिखर वार्ता टलती रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने हत्या के एक आरोपी इटली नाविक को अप्रैल तक भारत लौटने का समय दे रखा  है। इटली की सरकार आरोपी को भारत को सौपने को तैयार नहीं है। इस्लामिक स्टेट के आंतकी हमलों से पीडित बेल्जियम एव़ यूरोपियन यूनियन की राजधानी ब्रसेल्स के ताजा घावों पर मोदी ने महलम-पट्टी करने की भरपूर कोशिश  की। मगर  ब्रसेल्स में सपन्न  शिखर वार्ता में  यूरोपियन यूनियन के नेता इटली  मामले में कन्नी काटते रहे। भारत के लिए मछुआरों के हत्यारे इटली नाविकों को कानून के अनुसार दंड दिलाना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।  27 देशों  की यूरोपियन यूनियन भारत की सबसे बडी ट्रेडिंग पार्टनर है। भारत में सबसे ज्यादा विदेशी निवेश , लगभग 26 फीसदी, भी   ईयू  से ही आता है। ब्रसेल्स पर आतंकी हमले करके इस्लामिक स्टेट ने समूचे यूरोप को हिला दिया है। ब्रसेल्स सम्मेलन में इटली मैरीन मुद्दे के नहीं सुलझने पाने से भारत को थोडी निराशा  हुई है।  ब्रसेल्स के बाद प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका की राजधानी में  सिक्योरिटी पर वैश्विक  नेताओं से वार्ता करेंगे। इस सम्मेलन में भारत के अलावा चीन, जापान, दक्षिण कोरिया भी भाग ले रहे हैं। इस्लामिक स्टेट प्रायोजित आतंक के साथ-साथ उतरी कोरिया की अमेरिका पर नुक्लेअर  हमले की आए रोज की धमकी और चीन एवं जापान के बीच साउथ चाइना समुद्र को लेकर जारी खींचतान ऐसे ज्वलंत मुद्दे हैं, जो विश्व  शांति प्रयासों पर पानी फेर रहे हैं। उतर कोरिया पर चीन का हाथ है तो दक्षिण कोरिया अमरिका का अंतरंग सहयोगी है। इसी वजह उतरी कोरिया के तानाशाह  शासक किम जॉन्ग उन अमेरिका को तबाह करने की धमकी देते रहते हैं। 2014 में हेग में सपन्न न्यूक्लियर सिक्योरिटी समिट  के दौरान  अमेरिकी राष्ट्रपति  बराक ओबामा, जापान के प्रधानमंत्री शिन्जों अबे और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति   पार्क ग्यून-हाय के बीच कोरियाई प्रायद्धीप पर जापान के औपनिवेशिक कब्जे को लेकर  हुई बातचीत के फलस्वरुप इस दिशा  में कुछ प्रगति हुई है। जापान और दक्षिण  कोरिया  दोनों ही अमेरिका के सहयोगी हैं। पिछले साल दिसंबर में जापान और दक्षिण कोरिया के बीच इस संबंध में करार भी हुआ। जापान के प्रधानमंत्री ने कब्जे के लिए माफी भी मांगी और कोरियाई पीडितों के पुनर्वास को एक अरब येन की मदद देने का वायदा भी किया। इस करार के बाद  जापान और दक्षिण कोरिया के बीच तनाव कम हुआ है। मगर चीन समर्थक उतर कोरिया अभी भी कोरियाई प्रायद्धीप में तनाव बनाए हुए है। वाशिंगटन  में न्यूक्लियर सम्मेलन में ओबामा इस तनाव को कम करने के लिए चीन को मनाने की कोशिश करेंगे। पाकिस्तान की  नुक्लेअर हथियारों की भूख भारतीय उपमहाद्धीप में तनाव का कारण बनी हुई है। पाकिस्तान को रोकना आसान नहीं है पर चीन उसे रोक सकता है। शिखर सम्मेलन में इस विषय पर भी बातचीत हो सकती है। नुक्लेअर हथियारों को ग्रहण करने की होड दुनिया में अमन-चैन के लिए सबसे बडा खतरा है। ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि इस्लामिक स्टेट नुक्लेअर हथियार बना रहा है और जैसे ही आईएस घातक परमाणु  हथियार हासिल कर लेगा, यह दुर्दांत आतंकी संगठन दुनिया में तबाही मचाने में देर नहीं लगाएगा। बहरहाल, वाशिंगटन जैसे न्यूक्लियर सिक्योरिटी  शिखर सम्मलेन की तब तक कोई उपयोगिता नहीं है जब तक अमेरिका यह साबित नहीं कर देता कि ताकतवर कौन हैः अमेरिका और उसके सहयोगी देश  या इस्लामिक स्टेट?