गरीब पर मार,अमीर की मौज?
किंगफिशर एयरलाइंस का दिवाला निकलने से भारी कर्ज में डूबे शराब कारोबारी विजय माल्या के मामले ने पूरे देश का ध्यान बेंकों का कर्ज नहीं चुकाने वाले रसूखदार डफाल्टर्स की ओर आकृष्ट किया है। विजय माल्या को चौदह बैंको का लगभग नौ हजार करोड रु देना है और इस समय वे विदेश में मौज-मस्ती कर रहे है। मंगलवार को सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में बैंकों के हैडमास्टर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, “यह कैसी व्यवस्था है कि कुछ हजार रुपए कर्ज लेने वाले किसानों से वसूली के लिए हर तरह के उपाय किए जाते हैं, किसानों की जमीन तक बेच दी जाती है, मगर हजारों करोड रु डकारने वाली कंपनी को बीमार बताकर मौज करने के लिए छोड दिया जाता है। आरबीआई की खिंचाई करते हुए न्यायालय ने कहा कि बैंकिंग रेगुलेटर होते हुए भी वह (आरबीआई) वाचडॉग की तरह काम नहीं कर रहा है। वस्तु स्थिति भी यही है। देश में अमीर आराम से करोडों का कर्ज लेकर कानून के शिकंजे से बच निकलते हैं मगर गरीब चंद रुपए नहीं लौटाने पर भी हर तरह से प्रताडित किया जाता है। हताश , बेबस कर्ज में डूबे किसान और गरीबों को खुदकुशी करने पर विवश होना पडता है। पिछले महीने तमिल नाडु के एक किसान द्वारा कर्ज नहीं लौटाने पर एजेटों ने पुलिस की मौजूदगी में उसका ट्रैक्टर जब्त कर लिया जबकि वह सात लाख के कर्ज का पांच लाख से ज्यादा लौटा चुका था। बाद में इस किसान ने खुदकुशी कर ली। पूरे देश में किसानों और कमजोर तबकों द्वारा कर्ज समय पर नहीं चुकाने की स्थिति में उनकी संपत्ति कुर्क कर ली जाती है मगर अमीरों के मामले में ऐसा नहीं किया जाता। अमीर लोग कितने रसूखदार होते हैं और कानून को किस तरह अपनी जेब में लेकर घूमते है, देश के अग्रणी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की चेयरमैन ने खुद इस बात का खुलासा किया है। बैंक को उसके पास गिरवी रखे गए माल्या के गोवा स्थित किंगफिशर हाउस का कब्जा लेने के लिए तरह-तरह के पापड बेलने पडे। उच्च न्यायालय ने उत्तरी गोवा के डीसी को तीन माह के भीतर इस विला का कब्जा एसबीआई के सुपुर्द करने के आदेश दिए थे। मगर डीसी बार-बार सुनवाई करके मामले को टालता रहा और फिर छुट्टी पर चल गया। माल्या की किंगफिशर कंपनी कबकी बंद हो चुकी है। उन्होंने अपनी शराब बनाने की कंपनी भी दी है और वे पैसा लेकर विदेश चले गए हैं। प्रवर्तन निदेशालय ने माल्या पर मनी लांड्रिग का मामला दर्ज कर रखा है मगर विभाग उन्हें रोक नहीं पाया। माल्या को पूछताछ के लिए तलब किया जा रहा है। माल्या तीन बार नहीं आए मगर प्रवर्तन निदेशालय इस पर भी कुछ नहीं कर सका। अब कहीं जाकर प्रवर्तन निदेशालय ने सरकार से माल्या के पासपोर्ट को जब्त करने की सिफारिश की है। माल्या ही क्यों ऐसी और भी कई मिसालें हैं। ताजा आंकडों के अनुसार सरकारी बैंकों की नॉन-परफॉर्मिंग असेटस लगातार बढती जा रही है। हाल ही में जारी रिपोर्ट के अनुसार सरकारी बैंकों (पीएसयू) के बैड लोसं और एनपीए आठ लाख करोड को भी पार कर चुके हैं जो कि बैंकों की मार्केट वैल्युएशन से पांच गुना ज्यादा है। सरकारी बैंकों की हालत इस कद्र खराब है कि उनके हर 100 रुपए के शेयर पर निवेशकों को 150 रु के बैड लोन्स का बोझ उठाना पड रहा है। सरकारी बैंकों की तुलना में प्राइवेट बैंकों की एनपीए काफी कम है। स्पष्ट है कि भरष्टाचार और राजनीतिक दखलादांजी ने सरकारी बैंकों को दिवालियापन की कगार पर ला खडा कर दिया है। आरबीआई ने बैंकों को 2017 तक तमाम बैड लोंस एव एनपीए से मुक्त करने को कहा है। मगर बैंक ऐसा कर पाएंगें, इस पर संदेह है।लगभग चार लाख करोड रु के बैड लोंस इतने कम समय में रिकवर करना नामुमकिन है। बहरहाल, सरकारी बैंक भले ही आरबीआई को नजरअंदाज कर लें मगर देश की सर्वोच्च अदालत के आदेश की बेअदबी नहीं कर पाएंगे। सर्वोच्च न्यायालय ने बैंको को डिफाल्टर्स के नाम सावर्जनिक करने और उनकी कलई खोलकर उनका सच जनता के सामने लाने को कहा है। यही एक तरीका हे जिससे अमीरों पर दबाव पड सकता है। माल्या का मामला मीडिया में उछलने के बाद उन्होंने जैसे-ऐसे बैकों का चार हजार करोड रु लौटाने की पेशकश थी। सरकारी बैंकों में जनता का पैसा लगा है और इस गाढी कमाई को यूं जाया नहीं किया जा सकता। हर बार की तरह इस बार भी जनमानस को न्यायपालिका से न्याय की उम्मीद है।
किंगफिशर एयरलाइंस का दिवाला निकलने से भारी कर्ज में डूबे शराब कारोबारी विजय माल्या के मामले ने पूरे देश का ध्यान बेंकों का कर्ज नहीं चुकाने वाले रसूखदार डफाल्टर्स की ओर आकृष्ट किया है। विजय माल्या को चौदह बैंको का लगभग नौ हजार करोड रु देना है और इस समय वे विदेश में मौज-मस्ती कर रहे है। मंगलवार को सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में बैंकों के हैडमास्टर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, “यह कैसी व्यवस्था है कि कुछ हजार रुपए कर्ज लेने वाले किसानों से वसूली के लिए हर तरह के उपाय किए जाते हैं, किसानों की जमीन तक बेच दी जाती है, मगर हजारों करोड रु डकारने वाली कंपनी को बीमार बताकर मौज करने के लिए छोड दिया जाता है। आरबीआई की खिंचाई करते हुए न्यायालय ने कहा कि बैंकिंग रेगुलेटर होते हुए भी वह (आरबीआई) वाचडॉग की तरह काम नहीं कर रहा है। वस्तु स्थिति भी यही है। देश में अमीर आराम से करोडों का कर्ज लेकर कानून के शिकंजे से बच निकलते हैं मगर गरीब चंद रुपए नहीं लौटाने पर भी हर तरह से प्रताडित किया जाता है। हताश , बेबस कर्ज में डूबे किसान और गरीबों को खुदकुशी करने पर विवश होना पडता है। पिछले महीने तमिल नाडु के एक किसान द्वारा कर्ज नहीं लौटाने पर एजेटों ने पुलिस की मौजूदगी में उसका ट्रैक्टर जब्त कर लिया जबकि वह सात लाख के कर्ज का पांच लाख से ज्यादा लौटा चुका था। बाद में इस किसान ने खुदकुशी कर ली। पूरे देश में किसानों और कमजोर तबकों द्वारा कर्ज समय पर नहीं चुकाने की स्थिति में उनकी संपत्ति कुर्क कर ली जाती है मगर अमीरों के मामले में ऐसा नहीं किया जाता। अमीर लोग कितने रसूखदार होते हैं और कानून को किस तरह अपनी जेब में लेकर घूमते है, देश के अग्रणी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की चेयरमैन ने खुद इस बात का खुलासा किया है। बैंक को उसके पास गिरवी रखे गए माल्या के गोवा स्थित किंगफिशर हाउस का कब्जा लेने के लिए तरह-तरह के पापड बेलने पडे। उच्च न्यायालय ने उत्तरी गोवा के डीसी को तीन माह के भीतर इस विला का कब्जा एसबीआई के सुपुर्द करने के आदेश दिए थे। मगर डीसी बार-बार सुनवाई करके मामले को टालता रहा और फिर छुट्टी पर चल गया। माल्या की किंगफिशर कंपनी कबकी बंद हो चुकी है। उन्होंने अपनी शराब बनाने की कंपनी भी दी है और वे पैसा लेकर विदेश चले गए हैं। प्रवर्तन निदेशालय ने माल्या पर मनी लांड्रिग का मामला दर्ज कर रखा है मगर विभाग उन्हें रोक नहीं पाया। माल्या को पूछताछ के लिए तलब किया जा रहा है। माल्या तीन बार नहीं आए मगर प्रवर्तन निदेशालय इस पर भी कुछ नहीं कर सका। अब कहीं जाकर प्रवर्तन निदेशालय ने सरकार से माल्या के पासपोर्ट को जब्त करने की सिफारिश की है। माल्या ही क्यों ऐसी और भी कई मिसालें हैं। ताजा आंकडों के अनुसार सरकारी बैंकों की नॉन-परफॉर्मिंग असेटस लगातार बढती जा रही है। हाल ही में जारी रिपोर्ट के अनुसार सरकारी बैंकों (पीएसयू) के बैड लोसं और एनपीए आठ लाख करोड को भी पार कर चुके हैं जो कि बैंकों की मार्केट वैल्युएशन से पांच गुना ज्यादा है। सरकारी बैंकों की हालत इस कद्र खराब है कि उनके हर 100 रुपए के शेयर पर निवेशकों को 150 रु के बैड लोन्स का बोझ उठाना पड रहा है। सरकारी बैंकों की तुलना में प्राइवेट बैंकों की एनपीए काफी कम है। स्पष्ट है कि भरष्टाचार और राजनीतिक दखलादांजी ने सरकारी बैंकों को दिवालियापन की कगार पर ला खडा कर दिया है। आरबीआई ने बैंकों को 2017 तक तमाम बैड लोंस एव एनपीए से मुक्त करने को कहा है। मगर बैंक ऐसा कर पाएंगें, इस पर संदेह है।लगभग चार लाख करोड रु के बैड लोंस इतने कम समय में रिकवर करना नामुमकिन है। बहरहाल, सरकारी बैंक भले ही आरबीआई को नजरअंदाज कर लें मगर देश की सर्वोच्च अदालत के आदेश की बेअदबी नहीं कर पाएंगे। सर्वोच्च न्यायालय ने बैंको को डिफाल्टर्स के नाम सावर्जनिक करने और उनकी कलई खोलकर उनका सच जनता के सामने लाने को कहा है। यही एक तरीका हे जिससे अमीरों पर दबाव पड सकता है। माल्या का मामला मीडिया में उछलने के बाद उन्होंने जैसे-ऐसे बैकों का चार हजार करोड रु लौटाने की पेशकश थी। सरकारी बैंकों में जनता का पैसा लगा है और इस गाढी कमाई को यूं जाया नहीं किया जा सकता। हर बार की तरह इस बार भी जनमानस को न्यायपालिका से न्याय की उम्मीद है।






