गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

Why Not Pension To All After Sixty

प्रोविडेंट फंड से पैसा निकालने पर भी प्रतिबंध, भला यह भी कोई बात हुई। इस तरह के जनविरोधी फैसले के खिलाफ लोंगो का गुस्सा भडकना स्वभाविक है। बचत करना और जरुरत पडने पर उसे निकालना हर जमाकर्ता  का अधिकार होता है। फिर सरकार कौन होती है प्रॉवेडेंट फंड को निकालने पर रोक-टोक लगाने वाली? इस साल दस फरवरी को मोदी सरकार ने पीएफ से पैसा निकालने की नई व्यवस्था की अधिसूचना जारी की थी। इस व्यवस्था के तहत रिटायरमेंट से पहले पीएफ से नियोक्ता का अंशदान नहीं निकाला जा सकता था। भले ही आप नौकरी क्यों न छोड दें और आपको पैसे की सख्त जरुरत पड जाए।  आप बस अपना अंशदान निकाल सकते थे। वह भी तब अगर पीएफ जमाकर्ता  दो माह तक बेरोजगार रहता है, तो  वह अपना अंशदान और इस पर ब्याज को ही निकाल सकता है। नियोक्ता का अंशदान परिपक्वता पर ही निकाला जा सकता है। सरकार की नियोक्ताओं पर यह मेहरबानी  कामगारों को बुरी तरह  खल रही थी। अब इस बात का हिसाब कौन रखे कि जगह-जगह नौकरी के दौरान अमुक नियोक्ता ने  कितना अंशदान जमा कराया है और कितना नही़।  सरकारी  भ्रष्ट  तंत्र की मदद से नियोक्ताओं द्वारा कर्मचारियों का पैसा दबाने और समय पर समय जमा न कराने की  शिकायतें आम है। देश  में साठ फीसदी से ज्यादा नियोक्ता आज भी कर्मचारियों को  पीएफ की सुविधा देते हीं नही हैं और अगर देते भी हैं तो इसमे खासा गोलमाल किया जाता है।   सरकार ने दावों के निपटान की आयु सीमा भी 54 से बढाकर 58 कर दी थी। सरकार ने पीएफ की निरतंरता बरकरार रखने के लिए यह फैसला लिया था मगर जरुरत पडने पर पैसे की निकासी रोकना जनहित में नहीं माना जा सकता। प्राइवेट सेक्टर में एक नौकरी को छोडकर, दूसरी पकडना अथवा नौकरी छूट जाना  आम बात है। नौकरी छूट जाने पर पीडित को पैसे की सख्त जरुरत पडती है और इस स्थिति में अगर उसकी बचत काम न आए, तो यह किस काम की। देश  भर में इस फैसले के मुखर विरोध के मद्देनजर , सरकार ने इस अधिसूचना को 30 अप्रैल तक रोक दिया था। मंगलवार को बेंगलुरु में कपडा मिलों के कामगारों ने विरोहस्वरूप बसो तक को आग लगा दी और कर्नाटक की राजधानी में हिंसक घटनाओं से सरकार दबाव में आ गई। पहले पीएफ फैसले संबंधी अधिसूचना को जुलाई तक रोकने का ऐलान किया गया। इस पर भी जब कामगारों का विरोध  थमा नहीं , तीन घंटे के भीतर सरकार को झुकना पडा और अपना फैसला बदलना पडा। ताजा घोषणा के अनुसार  अब कर्मचारी जब चाहें अपना पैसा निकाल सकते हैं। एम्प्लाइज प्रोविडेंट फंड स्कीम ( ईएफपीओ)  देश  की विशालतम सामाजिक सुरक्षा योजना है और इस समय इसके पांच करोड सब्सक्राइाबर्स हैं।  18 मार्च, 2016 को ईएफपीओ के पास 8.5 लाख करोड की परिसंपत्तियां (असेट्स) थीं। नियमानुसार मूल वेतन (बेसिक वेज) का न्यूनतम 12 फीसदी कामगार को एम्प्लाइज प्रोविडेंट फंड स्कीम में जमा करना पडता है और इतना ही अंशदान नियोक्ता को कानूनन जमा कराना पडता है।  मगर बेसिक वेज की स्पष्ट  परिभाषा  नहीं होने के कारण नियोक्ता इसमें खेल करते हैं और कर्मचारियों को कम-से-कम अंशदान देने के लिए तिगडमें भिडाते हैं। इस मामले में न्यायपालिका ने भी अलग-अलग व्यवस्था दे रखी है। मद्रास और मध्य प्रदेश  हाई कोर्ट की व्यवस्था के अनुसार मूल वेतन में तमाम भत्तों को शामिल किया जाना चाहिए। मगर पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट इस व्यवस्था से सहमत नहीं है। सरकार ने भी बेसिक वेज की स्पष्ट परिभाषा  नहीं कर रखी है। इस बात में दो राय नहीं हो सकती की प्रोविडेंट फंड स्कीम कर्मचारियों के लिए सबसे बडी सामाजिक सुरक्षा है। इसकी निरतंरता कर्मचारियों के हित में है और पीएफ की निरतंरता बनाए रखना सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है। रिटायरमेंट के बाद पेंशन  सबसे बडी सामाजिक सुरक्षा है। हालांकि   एम्प्लाइज प्रोविडेंट फंड स्कीम के तहत पेंशन की व्यवस्था है मगर निरंतरता के अभाव में इसका कोई ज्यादा लाभ नहीं मिल रहा है। सामाजिक सुरक्षा की खातिर पीएफ के प्रत्येक सब्सक्राइाबर्स के लिए न्यूनतम पेंशन का प्रावधान होना चाहिए और इसके लिए बाकायदा एक अलग फंड कायम किया जाना चाहिए। ईपीएफओ के पास  27000 करोड रु अनक्लेमड पडा है। इस राशि  को पेंशन  फंड के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।