मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

विस चुनावः बदलाव के संकेत

 चार राज्यों तथा एक केन्द्र शासित में विधानसभा चुनाव के लिए इन दिनों वोट डाले जा रहे हैं। अप्रैल माह की चार तारीख से  शुरु हुई मतदान प्रकिया 19 मई को वोटों की गिनती के साथ ही पूरी हो जाएगी। पूर्वोतर राज्य असम और पश्चिम  बंगाल के अलावा दक्षिण भारत में केरल, तमिल नाडु एवं केन्द्र शासित पुडुचेरी में भी विधानसभा चुनाव कराए जा रहे हैं। असम में दो चरणों का मतदान 11 अप्रैल को पूरा हो गया और अब उम्मीदवारों को  19 मई तक का लंबा इंतजार करना पडेगा। तमिल नाडु, केरल और पुडुचेरी में 16 मई को एक दिन का मतदान कराया जा रहा है। पश्चिम बंगाल को छह चरणों की सबसे लंबी मतदान प्रकिया से गुजरना पड रहा है। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी और उनकी पार्टी के लिए ये विधानसभा चुनाव  काफी अहम है। भाजपा के पास राज्यसभा में बहुमत नहीं है।  कुल मिलाकर इन राज्यों से राज्यसभा की 51 सीटें हैं और इस बात के मद्देनजर , इन राज्यों में भाजपा को जितनी ज्यादा से ज्यादा विधानसभा सीटें मिलेंगी, राज्यसभा में उसके लिए उतना ही बेहतर होगा। राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव विधानसभा सदस्यों द्वारा किया जाता है।  असम को छोडकर, पश्चिम बंगाल, तमिल नाडु-पुडुचेरी और केरल ऐसे राज्य हैं जहां भाजपा का ठोस जनाधार नहीं है। पूर्वोतर असम में भाजपा सता की प्रमुख दावेदार है। इस राज्य में तरुण गोगई के नेतृत्व में कांग्रेस लगातार दस साल से सत्ता में है। 2011 के  चुनाव में कुल 126  विधानसभा सीटों मेंसे कांग्रेस ने  39.39 फीसदी वोट लेकर 78 सीटें जीती थीं। भाजपा 11.47 फीसदी वोट लेकर मात्र  5 सीटें ही जीत पाई थी। मगर 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कुल 14 लोकसभाई सीटों मेंसे 36.9 फीसदी वोट लेकर 7 सीटें जीती थीं। कांग्रेस 29.9 फीसदी वोट लेकर केवल तीन सीटें ही जीत पाईं थी। लोकसभा चुनाव नतीजों से भाजपा काफी उत्साहित है और असम में  स्पस्ट बहुमत  पाने के प्रति काफी आशावान है। अगर कांग्रेस सरकार के खिलाफ एंटी-इंकूबेंसी फैक्टर सक्रिय हो गया तो भाजपा को सता में आने से कोई नहीं रोक पाएगा। पश्चिम बंगाल, तमिल नाडु और केरल में चुनावी गणित असम की तरह फिलहाल भाजपा के माफिक नहीं है। 2011 में कुल 294 सदस्यीय विधानसभा में ममता बनर्जी की तृण्मूल ने 39.8 फीसदी जनादेश  से 184 सीटें जीतकर लगभग दो-तिहाई बहुमत हासिल किया था। सता का  दूसरी प्रमुख दावेदारी माकपा नीत वाम फ्रंट  30.08 फीसदी वोट लेकर केवल 40 सीटें ही जीत पाया था जबकि कांग्रेस ने 8.91 फीसदी वोट लेकर 42 सीटें जीती थीं। लोकसभा चुनाव में न तो माकपा और न ही भाजपा ममता बनर्जी के वोट बैंक में सेंध लगा पाई। मोदी लहर के बावजूद तृणमूल कांग्रेस 39.2 फीसदी वोट से 34 सीटों पर विजयी रही थी। कांग्रेस को 9.4 फीसदी वोटों से 4 और माकपा (वामपंथी फ्रंट) 22.7 फीसदी वोट लेकर मात्र 2 सीटे जीत पाई थी। भाजपा 16.6 फीसदी वोट लेकर 2 सीटें निकाल पाईं थी। राज्य में पहली बार भाजपा का प्रदर्शन   शानदार रहा था। इसी के बलबूते भाजपा पश्चिम बंगाल में बेहतर  नत्तीजों की उम्मीद कर रही है। केरल में भाजपा का कोई जनाधार नहीं है। केरल में इस बार भी मुख्य मुकाबला कांग्रेस नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक (यूडीएफ)  और माकपा नीत लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ)  के बीच है।  2011 के विधानसभा चुनाव में  140 विधानसभा सीटों मेंसे यूडीएफ को 46.3 फीसदी वोटों से 74 और एलडीएफ को 45.4 फीसदी जनादेश  से 66 सीटें मिली थी। लोकसभा चुनाव में भी लगभग यही स्थिति रही थी। 20 लोकसभाई सीटों मेंसे यूडीएफ 42.6 मत लेकर 12 और एलडीएफ 40.17 फीसदी जनादेश  लेकर 8 सीटें जीत पाया था। इस विधानसभा चुनाव में भी मुख्य मुकाबला यूडीएफ और एलडीएफ के बीच ही है। तमिल नाडु में मुख्य मुकाबला जयाललिता की अनाद्रमुक और करुणानिधि की द्रमुक के बीच है मगर लोकसभा चुनाव में राजग ने 18.5 फीसदी वोट से 2 सीट जीतकर सभी को चौंका दिया था। लोकसभा चुनाव में द्रमुक और कांग्रेस का राज्य में सफाया हो गया था। भाजपा को विधानसभा में भी इसी तरह के चमत्कार की उम्मीद है। बहरहाल अभी तक हुए भारी मतदान बदलाव के संकेत दे रहा है। जब  कभी  भी भारी मतदान होता है, कुछ न कुछ बदलाव जरुर होता है।