मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

Its Sheer Administrative Negligence

                                         सरासर लापरवाही

केरल में कोल्लम जिले के सौ साल पुराने पुतिंगल मंदिर के भीषण अग्निकांड में 108 लोगों की मौत के लिए सरासर प्रशासनिक लापरवाही जिम्मेदार है। मंदिर परिसर में आयोजित आतिशबाजी प्रतियोगिता के दौरान पटाखों के गोदाम में आग लग गई। देखते-देखते  108 लोग बेमौत मारे गए और चार सौ से ज्यादा घायल हो गए। मंदिर में आतिशबाजी प्रतियोगिता कराने की कोई अधिकृत अनुमति नहीं दी गई थी। इतना ही नही मंदिर के निकट रहने वाले परिवार ने स्थानीय प्रशासन को लिखित शिकायत भी दी थी। इस  शिकायत पर कलेक्टर कार्यालय ने लिखित में मंदिर परिसर में आतिशबाजी प्रतिबंधित कराने की बात भी कही थी पर ऐसा हुआ नहीं। भारत में धार्मिक आयोजन और आस्था से जुडे मसले लोगों की जिंदगी से कहीं ज्यादा अहम माने जाते हैं। सच यह है कि लोगों की सुरक्षा के प्रति सरकार कभी संजीदा नहीं रही है और न ही प्रशासन के लिए जनसुरक्षा कोई ज्यादा मायने रखती है। प्रशासन को अति विशिष्ठ  लोगों की सुरक्षा से ही फुर्सत नहीं मिलती है। आए रोज देश  में जहां-तहां इस तरह के हादसे होते रहते हैं और लोग-बाग कीडे-मकोडों की तरह  बेमौत मारे जाते हैं। कहीं आग में जिंदा जल जाने से, कहीं भगदड मचने से और यदा-कदा आतंकी हमलों में। बेमौत मरना तो जैसे आम आदमी की नियति बन गई है। हर हादसे के बाद जनसुरक्षा को लेकर फौरी तौर पर गहरी चिंता व्यक्त की जाती है। हादसे की जांच  कराकर मामले पर लीपा-पोती की जाती है और थोडे ही समय में सब कुछ भूल-भुलाकर वही “ढाक के तीन पात“ वाली स्थिति बन जाती है। देश  में “सांप  निकल जाने के बाद, लाठी पीटने“ की रिवायत है। हादसा हो जाएगा, उसके बाद बडी-बडी बातें की जाएंगी  मगर हादसे से पहले गंभीर से गंभीर चेतावनी को भी हल्के में लिया जाएगा। आतंकी हमले से लेकर मंदिर-मस्जिद के धार्मिक आयोजन तक , सबकी एक ही व्यथा है। घोर लापरवही। पुतिंगल मंदिर के ताजा मामले को ही ले लीजिए। यह बात बच्चा भी जानता है कि जिस जगह पटाखों को स्टोर किया जाता है, उसके आसपास आतिशबाजी नहीं की जानी चाहिए। इसके बावजूद भी गोदाम के निकट पटाखे फोडे गए। मंदिर के गोदाम में पटाखे अनाधिकृत तौर पर रखे गए थे। सोमवार को एक और सनसनीखेज सूचना आई कि मंदिर के निकट पटाखों से लदी तीन लावारिस कारें बरामद की गईं। जाहिर है पटाखों का यह जखीरा मंदिर की आतिशबाजी प्रतियोगिता के लिए लाया गया था मगर हादसा होने के बाद कार में पटाखे लाने वाले भाग गए। नियमानुसार पटाखे बनाने और उन्हें बेचने के लिए प्रशासन से अनुमति ली जानी चाहिए। मगर अधिकतर मामलों में एसा होता नहीं है। देश  में आतिशबाजी तो छोडिए, अक्सर शादी-विवाह, जीत का जश्न और विभिन्न आयोजनों पर बंदूक से गोलियां तक चलाने का प्रचलन है जबकि कानूनन ऐसा करना संगीन अपराध है। नियमों को तोडना तो  कोई हमसे सीखे। कानून तोड कर इसका “पालन” करना हमारी शान है। पिछले एक दशक में अब तक धार्मिक स्थलों में पांच बडे हादसे हो चुके हैं। अक्टूबर  2013 में मध्य प्रदेश  में दतिया जिले के रतनगढ मंदिर में पुल के टूटने की अफवाह फैलने से मची भगदड में 91 लोग मारे गए थे। जनवरी,  2005 में महाराष्ट्र  में सतारा जिले के मंढेर देवी मंदिर में श्रद्धालुओं में भगदड मचने से  350 लोग मारे गए थे और  200 से ज्यादा घायल हो गए थे। यह इस सदी का सबसे बडा हादसा था। अगस्त 2008 में हिमाचल प्रदेश  के प्रसिद्ध नयनादेवी मंदिर में भगदड मचने से 150 लोग मारे गए थे। मृतकों में अधिकतर बच्चे और महिलाएं थीं।  2008 में ही राजस्थान के जोधपुर में बम की अफवाह से मची भगदड में 200 लोग मारे गए थे। जनवरी, 2011 में दक्षिण भारत के महशूर  साबरमाला मंदिर में भगदड से 104 लोग मारे गए थे। जुलाई, 2015 में आंध्र प्रदेश  के राजासमुद्री में गोदावरी नदी में पवित्र स्नान के समय भगदड मचने से 27 वृद्ध महिलाएं मारीं गईं थी। भगदड मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडु के कारण मची थी।  और भी कई हादसे हुए हैं और अधिकांश  हादसों में भगदड प्रमुख वजह रही है। इन घटनाओं से संबंधित सरकार और प्रशासन ने कोई सबक नहीं सीखा। लगभग सभी में प्रशासन की लापरवाही सामने आई है। अब तो सरकार को चेत जाना चाहिए।