पंजाब में शिरोमणि अकाली दल एव़ भारतीय जनता पार्टी गठबंधन सरकार में सात नए मुख्य संसदीय सचिव की नियुक्तियों से कानून का जबरदस्त मखौल उडा है। दुखद स्थिति यह है कि खुद कानून बनाने वाले ही संवैधानिक व्यवस्था अनुच्छेद 164(1) की मूल भावना का खून कर रहे है़। इस कानून के तहत मंत्रिमंडल का आकार कुल विधानसभा सदस्यों की संख्या का 15 से अधिक नहीं खींचा जा सकता है। तथापि देश के सियासी नेताओं ने संवैधानिक व्यवस्था को तोडने का नायाब तरीका इजाद कर रखा है। मुख्य संसदीय सचिव अथवा संसदीय सचिव की नियुक्ति करके मंत्रिमंडल का बेतहाशा आकार बढाया जा रहा है। वीरवार को पंजाब के मुख्यमंत्री ने छह नए मुख्य संसदीय सचिवों को पद और गोपनीयता की शपथ ढिलाई । विधायक परगट सिंह ने शपथ लेने से मन करा दिया । नए मुख्य ससदीय सचिवों के पदभार संभालने के बाद राज्य में मुख्य संसदीय सचिवों की तादाद संख्या रिकॉर्ड 24 हो जाएगी। पंजाब में 17 मंत्री हैं और 18 मुख्य संसदीय सचिव। छह नए मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्ति से मंत्रिमंडल का आकार 41 पहुंच जाएगा। विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को मिलाकर यह संख्या 43 हो जाती है। 117 सदस्यीय विधानसभा में शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के 72 विधायक हैं। इस तरह साठ फीसदी से भी ज्यादा विधायकों को मंत्रियों के पदों से नवाजा गया है। भारत में संसदीय सचिव अथवा मुख्य संसदीय सचिव पद की स्पष्ट संवैधानिक व्याख्या नहीं होने की वजह से सियासी दलों को कानून का शॉर्टकट मिला हुआ है। आश्चर्य इस बात पर है कि नैतिकता की दुहाई देने वाली भाजपा भी संवैधानिक व्यवस्था का मखौल उडाने में अकालियों का भरपूर साथ दे रही है। छह नए मुख्य संसदीय सचिवों मेंसे दो पद भाजपा के हिस्से आए हैं। और-तो-और साफ-सुथरी और पारदर्शी राजनीति का दम भरने वाले अरविंद केजरीवाल ने भी दिल्ली में 21 संसदीय सचिव नियुक्त कर मंत्रिमंडल आकार को सीमित करने संबंधी कानून का मजाक उडाया है। हालांकि आम आदमी पार्टी का दावा है कि दिल्ली में संसदीय सचिवों को न तो मंत्री का वेतन दिया जा रहा है और न ही भत्ते। पंजाब में मुख्य संसदीय सचिब को राज्य मंत्री के बराबर का दर्जा दिया गया है। माहवार 1.21 लाख तनख्वाह के अलावा मंत्री समान भत्ते और सुविधाएं दी जाती हैं। नए मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्ति से भयंकर आर्थिक तंगी से जूझ रही सरकार पर लगभग 2.10 करोड रु का अतिरिक्त बोझ पडेगा। अकाली-भाजपा सरकार से पूछा जा सकता है कि अब जबकि विधानसभा चुनाव को मात्र कुछ माह रह गए हैं, छह और मुख्य संसदीय सचिव को नियुक्त करने की क्या जरुरत आन पडी? जाहिर है यह सब राजनीतिक लाभ के लिए किया गया है। मुख्य संसदीय सचिव अथवा संसदीय सचिव को मुख्यमंत्री पद और गोपनीयता की शपथ दिलाते हैं, राज्यपाल नहीं। उन्हें मंत्रिमंडल की बैठक में भी नहीं बुलाया जाता । यही वजह है कि मुख्य संसदीय सचिव अथवा संसदीय सचिव को मंत्रिमंडल का हिस्सा नहीं माना जाता। देश के कई उच्च न्यायालय मुख्य संसदीय सचिव अथवा संसदीय सचिव की नियुक्ति को लेकर स्पष्ट व्यवस्था दे चुके है कि उनकी नियुक्ति असंवैधानिक है और यह संविधान के अनुच्छेद 164(1) की मूल भावना के खिलाफ है। हाल ही में दलबदल से सता में आए अरुणाचल प्रदेश में मुख्यमंत्री ने 15 विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त किया है। इसके साथ ही करीब-करीब हर विधायक को लाभकारी पद दिया गया है। यह सब देश के संविधान का घोर अपमान है। 2009 में बंबई उच्च न्यायालय ने गोवा में संसदीय सचिव की नियुक्ति पर साफ कहा था कि राज्य मंत्री के बराबर दर्जा देकर संसदीय सचिव की नियुक्ति संविधान व्यवस्था का खुला उल्लंघन है। इससे पहले 2005 में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय भी मुख्य संसदीय सचिव और संसदीय सचिव की नियुक्ति को अवैध करार दे चुका है क्योकि संविधान में ऐसे किसी पद का उल्लेख नही है। राजस्थान उच्च न्यायालय ने हाल ही में राज्य सरकार से संसदीय सचिवों की नियुक्ति पर जबाव मांगा है। पंजाब हरयाणा हाई कोर्ट में भी मामला विचाराधीन है। अरुणाचल प्रदेश और पंजाब में मुख्य संसदीय सचिवों की ताजा नियुक्तियों से देश के समक्ष यक्ष प्रश्न खडा कर दिया है कि आखिर कब तक सियासी नेता संवैधानिक व्यवस्था का मजाक उडाते रहेंगे। मंत्रिमंडल का आकार सीमित रखने के लिए और सख्त संवैधानिक व्यवस्था की जरुरत है और इसका अपमान करने वालों को दंड का प्रावधान होना चाहिए।
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