खेती योग्य जमीन को लीज पर देने के लिए मोदी सरकार द्वारा कानून बनाने की पहल से उन भू-स्वामियों को राहत मिलेगी जो खुद खेती नहीं कर पा रहे हैं। इससे कृषि क्षेत्र में निवेश भी बढेगा। मौजूदा कानून के मुताबिक जमीन उसकी जो उस पर खेती करे। इस व्यवस्था से मालिक अपनी जमीन को लीज पर नहीं दे पा रहे थे। और इस वजह काफी जमीन बगैर खेती के ही रह जाती है। पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र , गुजरात और असम में हालांकि अभी भी खेती को लीज पर देने की अनुमति है, मगर कुछ समय बाद मुजारे अथवा टेनेंट को इस जमीन को खरीदने का हक मिलने से भू-स्वामी लीज पर देने से कतराते हैं। उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश , तेलंगाना, बिहार और कर्नाटक में खेती की लीज पर पूरी तरह से प्रतिबंध है। अभी आंध्र प्रदेश , पश्चिम बंगाल , तमिल नाडु और राजस्थान ही ऐसे राज्य हैं जहां जमीन को लीज पर दिया जा सकता है। इस तरह इस समय राज्यों में अलग-अलग कानून है। कानून बनाने की तमाम प्रकिया पूरी करने के बाद मोदी सरकार ने नया कानून तैयार किया है। सभी राज्यों ने इस कानून पर अपनी सहमति व्यक्त की है। मॅाडल एग्रीकल्चर लैंड लीजिंग एक्ट, 2016 के प्रभावी होने के बाद लैंड लीज पर पूरे देश में एक जैसा कानून लागू होगा और तमाम पुराने कानून स्वतः खत्म हो जाएंगे। इस कानून के बनने से अब भू-मालिक खेती योग्य जमीन को कानूनी तौर पर लीज पर दे सकेंगे। नीति आयोग द्वारा पिछले साल गठित टी हक समिति ने इस कानून को तैयार किया है। नए कानून में कृषि संबंधी कामों का भी स्पष्ट उल्लेख है। इसके तहत जमीन मालिक अपनी खेती योग्य जमीन को कृषि , बागवानी, वानिकी, मत्स्य पालन ,एग्रो-प्रोसेसिंग अथवा खेती से जुडे अन्य कामों के लिए कानूनन कॉन्ट्रैक्ट पर दे सकते हैं। कानून में भू-स्वामी और टेनेंट दोनों के हितों का ध्यान रखा गया है। मौजूदा कानून में प्रतिकूल परिस्थितियां बनने पर भू-स्वामी के हितों के लिए कोई प्रावधान नहीं था। जमीन के मालिक और टेनेंट के बीच लीज को लेकर कॉन्ट्रैक्ट होने के बाद टेनेंट को क्रॉप इन्शुरन्स और अन्य बैंक क्रेडिट लेने का पूरा हक होगा। बहरहाल, माना जा रहा है कि संशोधित भू-अधिग्रहण बिल (लैंड एक्वीजीशन एक्ट-2013) पर कांग्रेस से मुंह की खाने के बाद मोदी सरकार ने मॅाडल एग्रीकल्चर लैंड लीजिंग एक्ट, 2016 को वैकल्पिक तौर पर तैयार किया है। इस एक्ट से हालांकि बडे उधोगपतियों को उधोग लगाने के लिए कोई छूट नहीं मिलेगी मगर बागवानी, कृषि , एग्रो-फॉरेस्ट्री, एग्रो-प्रोसिंग, फिशरी, डेयरी-पॉल्ट्री फार्मिंग और स्टॉक ब्रीडिंग से जुडे कामों को नए कानून से जरुर खासी राहत मिलेगी। नए कानून से कृषि निर्यात को भी खासा प्रोत्साहन मिल सकता है। अभी तक कृषि उत्पादों का कुल निर्यात में 18 फीसदी योगदान है। भारत दुनिया में सर्वाधिक कृषि उत्पादन करने वाला दूसरा बडा देश है। देश के कुल सकल उत्पाद में कृषि का करीब चौदह फीसदी योगदान रहता है जबकि 2007 में यह 16 फीसदी था। देश का आर्थिक दायरा बढने के कारण कृषि क्षेत्र का दायरा सिकुड रहा है। इसकी प्रमुख वजह इस क्षेत्र में भू-स्वामित्व को लेकर पुराने कानून है। कृषि सेक्टर में निवेश बढाने के लिए भू-अधिग्रहण कानून को उधोग-फ्रेंडली बनाने की जरुरत है। 2013 में संप्रग सरकार ने बाबा आदम के जमाने के भू-अधिग्रहण कानून में काफी बदलाव किए थे। मोदी सरकार ने इस कानून को उधोग फ्रेंडली बनाने की कोशिश की थी मगर कांग्रेस समेत विपक्ष ने ऐसा नहीं होने दिया। इससे आर्थिक सुधारों की गति अभी भी सुस्त पडी है और अपेक्षित निवेश नहीं आ रहा है। उधोग-धंधे स्थापित करने के लिए जमीन चाहिए मगर मौजूदा कानून इसकी अनुमति नहीं देता है। इससे निवेश रुक गया है। निवेश के नहीं आने से अपेक्षित रोजगार सृजन भी नहीं हो पाया है। कृषि क्षेत्र से जुडे कामों में निवेश बढने से निर्यात बढ सकता है यद्यपि भारत अभी भी दुनिया में कृषि उत्पादों का सातवां बडा निर्यातक देश है। भारत में पचास फीसदी वर्कफोर्स आज भी खेती के कामों से जुडी है। इस सेक्टर में निवेश बढने से रोजगार के और अधिक अवसर सृजित हो सकते हैं। मोदी सरकार की ताजा पहल से कृषि सेक्टर में निवेश बढ सकता है। और ऐसा हुआ तो यह देश की आर्थिक सेहत के लिए अच्छी बात होगी ।
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