बुधवार, 13 अप्रैल 2016

अच्छी बरसात की उम्मीद

                              अच्छी बरसात की उम्मीद


लगातार दो सूखे के बाद अबकी बार बरसात के दौरान पर्याप्त पानी बरसने की भविष्यवाणी  से किसानों के चेहरे खिल उठना स्वभाविक है। खुदा करे मौसम विज्ञानियों की यह भविष्यवाणी  सौ फीसदी सही साबित हो। लगातार सूखे ने  किसानों की कमर तोड दी है और अब वह और ज्यादा नुकसान सहने की स्थिति में नहीं है। उसे इस बार हर हाल में अच्छी फसल की दरकार है। उम्मीद के मुताबिक फसल तभी हो सकती है जब झमाझम पानी बरसे। मौसम का आकलन करने वाली एजेंसी स्काईनेट ने सोमवार को अच्छी बरसात की भविष्यवाणी की । स्काईनेट के अनुसार इस बार सामान्य से 35 फीसदी ज्यादा बारिश  हो सकती है। मॉनसूनी औसत बारिश  भी  105 से 110 फीसदी रहने का अनुमान है।  इसकी वजह अल नीनो का खत्म होना बताया गया है। अल नीनो के सक्रिय रहने के कारण पिछले दो बरसातों के दौरान प्रर्याप्त पानी नहीं बरसा था। अल नीनो सूखे का प्रमुख कारण है। नासा और आस्ट्रेलियाई एजेंसियों ने भी अल नीनो के निष्क्रिय  होने की पुष्टि  की है।  मंगलवार को देश  के मौसम विभाग ने भी स्काईनेट के आकलन की ताकीद कर दी। मौसम विभाग ने मानसून पर अपना आकलन जारी करते हुए कहा है कि इस बार मानसूनी बारिश सामान्य से अधिक रहेगी और काफी पानी बरसेगा। मानसून में  बारिश  का औसत (लाँग टर्म  एवरेज)  106 फीसदी रह सकता है और कहीं-कहीं इससे ज्यादा पानी बरस सकता है। भारत में कुल सालाना बारिश  का 70 से भी अधिक पानी जून से सितंबर के दौरान मानसून में  ही बरसता है। इसी बारिश  से धान, दालें, कपास, गन्ना और सोयाबीन जैसी प्रमुख खरीफ फसलें उगाई जाती हैं। प्रर्याप्त पानी नहीं बरसने से इन फसलों की उपज गिरती है और इससे देश  में खाद्यान्न का संकट पैदा हो जाता है। भारत में अभी भी 54 फीसदी फसली क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा नहीं है। इस जमीन पर उगाई जानी वाली फसलें बरसाती पानी पर आश्रित है।  सिंचाई के परंपरागत स्त्रोतों के उतरोत्तर सूख जाने से भारत में ही नहीं, पूरे दक्षिण एशिया में खाद्यान्न का संकट साल-दर-साल बढ्ता जा रहा है। भारत और दक्षिण एशिया के अधिकांश देशों  में धान की फसल बरसाती पानी पर आश्रित है। दक्षिण एशिया में चावल लोगों का प्रमुख आहार है। भारत में भी दक्षिण भारत और पूर्वोतर राज्यों में चावल प्रमुख आहार है। लगातार सूखे की स्थिति और कम बरसाती पानी बरसने से दक्षिण एशिया के कई देषों में खाद्यान्न, खासकर, चावल की भीषण किल्लत बनी हुई है। हालात इस कद्र खराब हैं कि मार्च माह में थाईलैंड का  पांच-फीसदी  (ब्रोकन) टोटा चावल 378.50 डालर ( लगभग 25000 हजार रु) टन बिक रहा था। वियतनाम में यही चावल 385 डॉलर प्रति टन बिक रहा था। भारत दुनिया में चावल निर्यात करने वाला अग्रणी देश  है मगर इस साल चावल के भंडारण में खासी गिरावट आई है। ताजा आंकडे बताते हैं कि भारत और दुनिया के दूसरे अग्रणी चावल निर्यातक देश  थाईलैंड के पास इस समय करीब 160 लाख टन चावल का स्टॉक है जो कि 2013 के स्टॉक से 70 फीसदी कम है। इससे साफ  होता है कि इस समय चावल का संकट है।  2013 के बाद से यह संकट लगातार बढता जा रहा है। इस बार भी अगर पर्याप्त पानी नहीं बरसता है तो 2008 का “चावल संकट“ लौट सकता है। तब भारत ने चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था और इससे दक्षिण एशिया के कई देशों  में चावल के दाम आसमान को छू रहे  थे। तब फिलिपिंस में चावल 1000 डॉलर प्रति टन (लगभग 66000 रु टन) से भी अधिक रेट पर बिक रहा था। निष्कर्ष , यह है कि अच्छी बरसात से न केवल भारत के किसानों को ही उम्मीद बंधी है, अलबत्ता भारत से चावल खरीदने (आयात) करने वालों देशों  ने भी राहत की सांस ली है। तथापि मौसम विभाग का आकलन अक्सर गलत साबित होता है। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के जमाने में मौसम की तुनकमिजाजी कोई नई बात नहीं है।  इस बार  दुआ कीजिए मौसम विभाग की भविष्यवाणी सही साबित हो।