टी20 वर्ल्ड कप के सेमी-फाइनल में टीम ईंडिया की हार ने फटाफट क्रिकेट के इतिहास में एक नया अध्याय लिखा है। खेल में हार-जीत तो चलती रहती है मगर जीता हुआ मैच हार जाना बेहद शर्मनाक होता है और ऐसी हार की टीस सालों तक नहीं जाती। पहली बार टी20 के इतिहास में “दो नो बाल“ ने गेम का पासा ही पलट दिया। और अब "कैचिच विंस मैचिच“ के साथ-साथ यह भी कहा जाएगा “ नो बाल कैन आल्सो विन ए मैच"। वीरवार को मुंबई के वानखेडे स्टेडियम में भारत और वेस्ट इंडीज के बीच खेले गए टी20 वर्ल्ड कप के दूसरे सेमी-फाइनल में कैरेबियाई क्रिकेटरों ने वह करिश्मा कर दिखाया, जिसकी काफी कम उम्मीद थी। टॉस हार जाने के बाद पहले बल्लेबाजी करते हुए भारत ने कोहली की “विराट“ पारी की बदौलत बीस ओवर्स में 192 का विशाल स्कोर खडा कर दिया। इस वर्ल्ड कप में पहली बार भारत की शुरुआत (ओपनिंग) भी अच्छी रही। शिखर धवन की जगह ओपनिंग करने आए अजिंके रहाणे ने रोहित शर्मा के साथ 50 रन जोडे। रोहित के आउट होने पर विराट कोहली आए और तीन बार रन आउट और दो बार कैच आउट होने से बचते-बचाते 47 गेंदों में 89 रनों की नाबाद पारी खेली। पहली ही बार इस वर्ल्ड कप में पहली, दूसरी और तीसरी विकेट की साझेदारी पचास रनों को पार कर गई। विशाल स्कोर खडा करने के बाद भारत को क्रिस गेल से सबसे बडा खतरा था मगर बुमराह ने उन्हें पांच रनों के स्कोर पर क्लीन बोल्ड करके इस खतरे को भी टाल दिया। सेमुअल्स भी जल्द आउट हो गए। सब कुछ भारत के पक्ष में चल रहा था। लेकिन इसके बाद ऐसा कुछ हुआ कि जीतते-जीतते भारत मैच हार गया। भारतीय गेंदबाजों के कदम बहक गए। तेज गेंदबाज अगर नो बाल फेंके बात समझ में आती है मगर फिरकी गेंदबाज ऐसा करे, तो टीम को झटका लगना तय है। वीरवार को वानखेडे स्टेडियम में भी यही हुआ। भारत के प्रमुख फिरकी गेंदबाज रविचन्द्रन अश्विन ने सातवें ओवर में लैंडल सिमंस को बुमराह के हाथों आउट तो कराया मगर “नो बाल“ के कारण सेंमस को जीवनदान मिल गया। 15वें ओवर में हार्दिक पंड्या की गेंद में सिंमस को नो बाल के कारण फिर जीवनदान मिला। 17वें ओवर में जडेजा ने सेंमस का बाउंड्री पर जबरदस्त कैच लपका मगर बचते-बचाते भी पैर रस्सी को टच कर गया। पूरे मैच में ऐसा ही रोमांच बना रहा। दर्शकों में अंत तक भारत की जीत की उम्मीद बंधी रही मगर अंततः भारत हार गया। दो नो बाल्स ने भारत से वर्ल्ड कप छीन लिया? वैसे वीरवार को अगर भारत जीतता तो वानखेडे में एक नया अध्याय लिखा जाता। वानखेडे का इतिहास रहा है कि टॉस जीतने वाली टीम ही यहां जीतती है। वानखेडे में ओस के बीच गेंदबाजी करना आसान नहीं होता है। वीरवार को भी ओस ने भारतीय गेंदबाजों को लय और लेंथ बिगाड कर रख दी। इसी वजह वेस्ट इंडीज ने टॉस जीतकर भारत से पहले बल्लेबाजी कराई। और जैसा कि हार के बाद अक्सर होता है, टीम इंडिया की रणनीति में भी कई कमियां गिनाईं जा रही हैं। धोनी और टीम इंडिया के रणनीति बनाने वालों का पूरा फोक्स क्रिस गेल पर ही रहा। लैंडल सिंमस, चार्ल्स और रसल को लेकर कोई रणनीति नहीं थी। टीम इंडिया और इसके निदेशक रवि शास्त्री को मुंबई पिच का बखूबी अंदाजा था मगर फिर भी आखिरी ओवर्स में गेंदबाजों का रोटेशन पूरी तरह से गडबडा गया। डैथ ओवर्स में सधी हुई गेंदबाजी कर रन रोकने वाले गेंदबाज थे ही नहीं। नतीजतन, आखिरी ओवर विराट कोहली से कराना पडा। 19वां ओवर रवीद्र जडेजा से कराया गया जबकि धोनी जानते थे कि इस मैच में न जडेजा चले और न ही अश्विन । सेमी-फाइनल में अगर टीम के पास आखिरी ओवरों मे गेंदबाजों का टोटा हो तो अनुमान लगाया जा सकता है कि टीम इंडिया की रणनीति कैसी रही होगी। वैसे टीम इंडिया सेमी-फाइनल तक पहुंची यह भी अपने आप में कम करिश्माई नहीं है। पहला मैच न्यूजीलैंड से हार गए। फिर बांग्लादेश से हारते-हारते बच गए। यह स्थिति यही साबित करती है कि मजबूत और फेवरट टीम इंडिया सिर्फ हौव्वा ही था। आखिर, हार तो हार ही होती है और इस कडवी सव्चाई को सहज में गले नहीं उतारा जा सकता।
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