काले धन का “पंचनामा“
धन्नासेठों , सेलेब्रिटीज एवं सियासी नेताओं के गोरखधंधे क्या-क्या गुल खिलाते हैं, पनामा के अखबारों में प्रकाशित दस्तावेजों ने पूरी दुनिया को इस कडवी सच्चाई से फिर अवगत कराया है। पनामा की लॉ फर्म फोनसेका मोसैक ने काले धन पर विकीलीक्स से भी कहीं बडा सनसनीखेज खुलासा किया है और इसमें खोजी पत्रकारों के अंतरराष्ट्रीय संगठन आईसीआईजे की दस्तावेज जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आईसीआईजे वाकई ही बधाई की पात्र है कि उसकी खोजी पत्रकारिता से 600 डीवीडी (2.6 टेराबाइट डेटा) वाले “पनामा पेपर्स“ नाम के खुलासे से दुनिया के सामने पूंजीवादी व्यवस्था का काला चेहरा बेनकाब हुआ है। भारत के इनवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म के प्राय इंडियन एक्सप्रेस समेत 109 मीडिया संस्थानों के सैंकडों पत्रकारों ने इस काम को अंजाम दिया। 1977 से 2015 के दौरान चालीस साल का डेटा खोज निकालना आसान काम नहीं था। फिर भी खोजी पत्रकारों ने जान-जोखिम में डालकर 1.15 करोड दस्तावेज जुटाए और पनामा की लॉ फर्म की मदद से इन्हें सार्वजनिक किया। पत्रकारों ने पूरी दुनिया को यह संदेश भी दिया है कि कॉपोरेट पूंजी से सीचिंत होने के बावजूद मीडिया में अभी भी खोजी पत्रकारिता का दमखम है और धन-बल उनके पराकर्म को परास्त नहीं कर सकता। पत्रकारिता जगत के अब तक के सबसे बडे खुलासे ने दो सौ से ज्यादा राष्ट्राध्यक्षों , सियासी नेताओं, फिल्म हस्तियों, बिजनेसमैन, खिलाडियों और अधिकारियों की काली कमाई का कच्चा चिठ्ठा खोला है। इनमें चीन और रुस के राष्ट्रपतियों के करीबी रिश्तेदारों समेत पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ परिवार, भारत की नामचीन फिल्म हस्तियां अमिताभ बच्चन और उनकी पुत्रवधु ऐश्वर्या राय बच्चन भी शामिल है। “पनामा पेपर्स“ में बताया गया है कि दुनिया भर के बडे लोग कर चोरी करके अपनी काली कमाई छिपाने के लिए कैसी-कैसी तिगडमें भिडाते हैं। जाहिर है काली कमाई को छिपाने के लिए टैक्स मुक्त देशों की तलाश रहती है। एक जमाने में स्विटरजलैंड को काले धन छिपाने के लिए सबसे सुरक्षित माना जाता था। मगर जैसे-जैसे इस देश की करमुक्त व्यवस्था दुनिया की नजर में चढ़ती गईं , काली कमाई करने वालों ने स्विटरजलैंड से भी अधिक सुरक्षित जगह तलाश ली। और पनामा, सिसली, बह्यमाज और ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड जैसे देश काले धन को छिपाने के लिए अधिक सुरक्षित पाए गए। पनामा पेपर्स खुलासे ने इस सच्चाई को फिर उजागर किया है कि पूंजीवादी व्यवस्था में कर चोरी, कायदे-कानून का उल्लघंन, अपराध और आतंक का ही डंका बजता है। इस खुलासे से यह भी पता चलता है कि विकासशील देशों का काफी सारा धन काले धन के रुप में विकसित देशों में पूंजी निर्माण भी कर रहा है। यही वजह है कि सत्ता से पदच्युत किए जाने के बाद विकासशील देशों के अधिकतर सियासी नेता विकसित देशों में शरण लेते हैं ? आतंक और हिंसा के मौजूदा माहौल में यह स्थिति खतरनाक है। इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि काले धन के बलबूते ही दुनिया में आतंक फल-फूल रगा है। पनाम खुलासे के बाद संबंधित देशों की सरकारों को हरकत में आना पडा। आस्ट्रेलिया, न्यूजीलेंड और भारत समेत कई देशों को कर चोरी करने वालों के खिलाफ जांच कराने के लिए बाध्य होना पडा। भारत की पांच सौ बडी हस्तियों का नाम आने पर वितमंत्री अरुण जेटली ने भी नियमानुसार सख्त कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है। तथापि, वस्तुस्थिति यह है कि सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद काली कमाई कर विदेशों में धन छिपाने वालों के खिलाफ आज तक कोई सख्त कार्रवाई नहीं हो पाई है। मोदी सरकार ने लोकसभा चुनाव के दौरान अपने इलेक्षन मेनिफेस्टो में सत्ता में आने के सौ दिन के भीतर विदेषों में छिपाए गए काले धन को स्वदेश लाने का वायदा किया था। मोदी सरकार को अगले माह सत्ता में आए दो साल हो जाएंगें मगर विदेशों में छिपाए गए काले धन का एक धेला भी अभी तक स्वदेश नहीं लाया जा सका है। ताजा खुलासे से सरकार के काला धन को स्वदेश लाने के प्रयासों पर सवालिया निशान लगा दिया है। अगर पत्रकार विदेशों में छिपाए गए काले धन का कच्चा चिठ्ठा खोल सकते है, तो सरकार क्यों नहीं? सरकार के पास अपार साधन और शक्तिशाली तंत्र है और अगर दृढ इच्छा शक्ति हो तो कर चुराने वालों को पकडा जा सकता है।
धन्नासेठों , सेलेब्रिटीज एवं सियासी नेताओं के गोरखधंधे क्या-क्या गुल खिलाते हैं, पनामा के अखबारों में प्रकाशित दस्तावेजों ने पूरी दुनिया को इस कडवी सच्चाई से फिर अवगत कराया है। पनामा की लॉ फर्म फोनसेका मोसैक ने काले धन पर विकीलीक्स से भी कहीं बडा सनसनीखेज खुलासा किया है और इसमें खोजी पत्रकारों के अंतरराष्ट्रीय संगठन आईसीआईजे की दस्तावेज जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आईसीआईजे वाकई ही बधाई की पात्र है कि उसकी खोजी पत्रकारिता से 600 डीवीडी (2.6 टेराबाइट डेटा) वाले “पनामा पेपर्स“ नाम के खुलासे से दुनिया के सामने पूंजीवादी व्यवस्था का काला चेहरा बेनकाब हुआ है। भारत के इनवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म के प्राय इंडियन एक्सप्रेस समेत 109 मीडिया संस्थानों के सैंकडों पत्रकारों ने इस काम को अंजाम दिया। 1977 से 2015 के दौरान चालीस साल का डेटा खोज निकालना आसान काम नहीं था। फिर भी खोजी पत्रकारों ने जान-जोखिम में डालकर 1.15 करोड दस्तावेज जुटाए और पनामा की लॉ फर्म की मदद से इन्हें सार्वजनिक किया। पत्रकारों ने पूरी दुनिया को यह संदेश भी दिया है कि कॉपोरेट पूंजी से सीचिंत होने के बावजूद मीडिया में अभी भी खोजी पत्रकारिता का दमखम है और धन-बल उनके पराकर्म को परास्त नहीं कर सकता। पत्रकारिता जगत के अब तक के सबसे बडे खुलासे ने दो सौ से ज्यादा राष्ट्राध्यक्षों , सियासी नेताओं, फिल्म हस्तियों, बिजनेसमैन, खिलाडियों और अधिकारियों की काली कमाई का कच्चा चिठ्ठा खोला है। इनमें चीन और रुस के राष्ट्रपतियों के करीबी रिश्तेदारों समेत पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ परिवार, भारत की नामचीन फिल्म हस्तियां अमिताभ बच्चन और उनकी पुत्रवधु ऐश्वर्या राय बच्चन भी शामिल है। “पनामा पेपर्स“ में बताया गया है कि दुनिया भर के बडे लोग कर चोरी करके अपनी काली कमाई छिपाने के लिए कैसी-कैसी तिगडमें भिडाते हैं। जाहिर है काली कमाई को छिपाने के लिए टैक्स मुक्त देशों की तलाश रहती है। एक जमाने में स्विटरजलैंड को काले धन छिपाने के लिए सबसे सुरक्षित माना जाता था। मगर जैसे-जैसे इस देश की करमुक्त व्यवस्था दुनिया की नजर में चढ़ती गईं , काली कमाई करने वालों ने स्विटरजलैंड से भी अधिक सुरक्षित जगह तलाश ली। और पनामा, सिसली, बह्यमाज और ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड जैसे देश काले धन को छिपाने के लिए अधिक सुरक्षित पाए गए। पनामा पेपर्स खुलासे ने इस सच्चाई को फिर उजागर किया है कि पूंजीवादी व्यवस्था में कर चोरी, कायदे-कानून का उल्लघंन, अपराध और आतंक का ही डंका बजता है। इस खुलासे से यह भी पता चलता है कि विकासशील देशों का काफी सारा धन काले धन के रुप में विकसित देशों में पूंजी निर्माण भी कर रहा है। यही वजह है कि सत्ता से पदच्युत किए जाने के बाद विकासशील देशों के अधिकतर सियासी नेता विकसित देशों में शरण लेते हैं ? आतंक और हिंसा के मौजूदा माहौल में यह स्थिति खतरनाक है। इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि काले धन के बलबूते ही दुनिया में आतंक फल-फूल रगा है। पनाम खुलासे के बाद संबंधित देशों की सरकारों को हरकत में आना पडा। आस्ट्रेलिया, न्यूजीलेंड और भारत समेत कई देशों को कर चोरी करने वालों के खिलाफ जांच कराने के लिए बाध्य होना पडा। भारत की पांच सौ बडी हस्तियों का नाम आने पर वितमंत्री अरुण जेटली ने भी नियमानुसार सख्त कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है। तथापि, वस्तुस्थिति यह है कि सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद काली कमाई कर विदेशों में धन छिपाने वालों के खिलाफ आज तक कोई सख्त कार्रवाई नहीं हो पाई है। मोदी सरकार ने लोकसभा चुनाव के दौरान अपने इलेक्षन मेनिफेस्टो में सत्ता में आने के सौ दिन के भीतर विदेषों में छिपाए गए काले धन को स्वदेश लाने का वायदा किया था। मोदी सरकार को अगले माह सत्ता में आए दो साल हो जाएंगें मगर विदेशों में छिपाए गए काले धन का एक धेला भी अभी तक स्वदेश नहीं लाया जा सका है। ताजा खुलासे से सरकार के काला धन को स्वदेश लाने के प्रयासों पर सवालिया निशान लगा दिया है। अगर पत्रकार विदेशों में छिपाए गए काले धन का कच्चा चिठ्ठा खोल सकते है, तो सरकार क्यों नहीं? सरकार के पास अपार साधन और शक्तिशाली तंत्र है और अगर दृढ इच्छा शक्ति हो तो कर चुराने वालों को पकडा जा सकता है।






