मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

आंसू मेरी दिल की जुबां है

रविवार को राजधानी दिल्ली में न्यायपालिका की दुर्दशा  पर देश  के मुख्य न्यायाधीश  न्यायमूर्ति तीर्थ सिंह ठाकुर के साथ जनमानस के भी आंसू छलक आए। जजों पर अत्याधिक काम के बोझ से त्रस्त  देश  के मुख्य न्यायाधीश  प्रधानमंत्री के समक्ष आसूं नहीं रोक पाए। देश  के मुख्य न्यायाधीश  को भी अगर न्यायपालिका के सुधार के लिए प्रधानमंत्री के समक्ष भावुक होना पडे तो लानत है ऐसी व्यवस्था पर। आम आदमी अपनी दुर्दशा  पर रोए तो बात समझ में आती पर देश  का मुख्य न्यायाधीष आंसू छलकाए तो जाहिर है उनके अंदर लंबे समय से भावनाएं खौल रहीं थीं। भावुक हो जाना हर रहमदिल इंसान की कमजोरी होती है और बाद में न्यायमूर्ति ठाकुर ने स्वंय ही कहा कि “ भावुक हो जाना उनकी कमजोरी है। इससे पहले जम्मू यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह (कन्वोकेशन) में भी अपने पुराने दिन याद करते हुए जस्टिस ठाकुर रो पडे थे।  जस्टिस ठाकुर इस यूनिवर्सिटी के छात्र रह चुके हैं। मनोविज्ञानी कहते हैं कि हर इंसान के अंदर भावनाएं दबी रहती हैं और अवसर मिलते ही जाने-अनजाने बाहर आ जाती हैं। रविवार को नई दिल्ली में मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों  को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति तीर्थ  सिंह ठाकुर के साथ संभवतय यही हुआ। सम्मेलन में जस्टिस ठाकुर देश  की विभिन्न अदालतों में जजों की भारी कमी का जिक्र कर रहे थे। जस्टिस ठकुर ने भरे गले से साफ-साफ शब्दों में कहा कि पूरी जिम्मेदारी न्यायपालिका पर नहीं डाली जा सकती।  मुख्य न्यायाधीश  ने विधि आयोग की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा कि 1987 में पेश  इस रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत में दस लाख लोगों  के लिए एक जज है जबकि होने पचास चाहिए। विधि आयोग के बाद सर्वोच्च न्यायालय की समिति ने भी 2002 में  जजों की संख्या बढाने की सिफारिश  की थी। इसके बाद प्रणब मुखर्जी (मौजूदा राष्ट्रपति ) की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने भी जजों की संख्या बढाने की सिफारिश  की थी । इसके बावजूद भी कुछ नहीं हुआ। नतीजतन, गरीब अपीलकर्ता सालों तक जेल मे सडते रहते हैं। जस्टिस ठाकुर ने स्कूल में अक्सर पूछे जाने वाले सवाल का हवाला देते हुए कहा कि किसी सडक को तय समय में बनाने के लिए कितने श्रमिक चाहिए, इसका गणित तो लगाया जाता है मगर देश  में अर्से से लंबित पडे 3.8 करोड  मुकदमों को निपटाने के लिए कितने जज चाहिए इसका हिसाब नहीं लगाया जाता। भारत में एक जज साल में कम-से-कम 2600 मुकदमे निपटाता है। इस बावजूद भी उससे अच्छे काम की उम्मीद की जाती है। क्या यह मुमकिन है? अमेरिका में एक जज ज्यादा से ज्यादा 81 मुकदमों की सुनवाई करता है। इन सब बातों के अलावा सरकार की  उदासीनता ने भी जस्टिस ठाकुर को खासा उद्धवेलित किया है। सरकार जजों की भर्ती के लिए तरह-तरह के बहाने बनाती है। उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ अदालतों में जजों की भर्ती का जिम्मा राज्यों की सरकारों पर है मगर धन की कमी अथवा लांजिस्टिक समस्या का बहाना बनाकर  राज्य जजों  के पद सृजित करने में कोई दिलचस्पी नहीं लेते हैं। केन्द्र सरकार को भी सर्वोच्च न्यायालय में जजों की भर्ती पद्धति को बदलने की ज्यादा पडी है। मौजूदा कॉलेजियम चयन व्यवस्था में सरकार की नहीं चलती है। मोदी सरकार इसे अपने तरीके से चलाना चाहती है।  लॉमेकर्स अपने फायदे के लिए मामले में तमाम राजनीतिक मतभेद भुलाकर एक हो जाते हैं। सोमवार को दिल्ली में अरविंद केजरीवाल सरकार द्वारा लागू की जा रही सम-विषम (ऑड-ईवन) योजना पर संसद में सभी सदस्यों ने एक सुर में उन्हें इस योजना से बाहर रखने की मांग की। केजरीवाल सरकार ने सांसदों को संसद तक ले जाने के लिए विशेष  लक्जरी बसों का प्रबंध कर रखा था मगर अधिकतर सांसद बस में जाने की बजाए नियम तोडते हुए अपने निजी वाहनों से संसद पहुंचे। बहरहाल, जनमानस की राय ली जाए तो वे यही कहेंगे कि देश  की न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका से कहीं अच्छा  काम कर रही है। जो काम सरकार को करना चहिए, अब वह काम भी न्यायपालिका कर रही है। लोगों को न्यायपालिका पर कहीं ज्यादा भरोसा है। न्यायपालिका को भी संसद की ही तरह मजबूत और स्वायत होना चाहिए। ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चहिए कि भर्ती के लिए उसे सरकार पर आश्रित न रहना पडे।