लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के सहयोगी दलों ने भगवा पार्टी को आइना दिखाना शुरु कर दिया हैं। भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की मुलाकात से पहले ही सेना ने 2019 में लोकसभा चुनाव अकेले लडने का ऐलान कर डाला। बुधवार देर सायं अमित शाह की उद्धव ठाकरे से मुलाकात को लेकर शिवसेना के मुख पत्र में मोदी सरकार की कार्यशैली और भाजपा के सहयोगी दलों के राजनीतिक प्रबंध पर तल्ख टिप्प्पणी की गई है। मुखपत्र के संपादकीय में लिखा गया है,“ पेट्रोल-डीजल के दाम बढे हुए हैं और किसान सडक पर है। इसके बावजूद भाजपा चुनाव जीतना चाहती है। जिस तरह से भाजपा ने साम, दाम, दंड, भेद के जरिए पालघाट (महाराश्ट्र की लोकसभा सीट) का चुनाव जीता, उसी तरह भाजपा किसानों की हडताल को खत्म करना चाहती है। चुनाव जितने की शाह की जिद को हम सलाम करते हैं“। मई में हुए उपचुनाव में महाराष्ट्र की पालघाट लोकसभाई सीट और नगालैंड की सोल सीट भाजपा ने जीती है। शिवसेना का यह भी आरोप है कि हालिया उप-चुनावों में मिली करारी हार के बाद भाजपा को सहयोगी दलों की याद आई है मगर अब बहुत देर हो चुकी है। महाराष्ट्र से लोकसभा की 48 सीटें हैं और इस राज्य में शिवसेना के सहयोग के बगैर भाजपा के लिए 2014 लोकसभा चुनाव बराबर सीटें ला पाना खासा मुश्किल हो सकता है । 2014 में भाजपा ने महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ मिलकर चुनाव लडा था और 41 सीटें जीती थी। भाजपा ने 24 सीटों पर चुनाव लडा था और 23 सीटें उसके खाते में आईं थी। शिवसेना ने 20 सीटों पर अपने प्रत्याशी खडे किए थे और उसके खाते में 18 सीटें आईं थी। मगर विधानसभा चुनाव के समय 25 साल का भाजपा-शिवसेना गठबंधन टूट गया था और दोनों दलों ने अलग-अलग चुनाव लडा। इसका दोनों को खमियाजा भी भुगतना पडा। भाजपा ने 262 सीटों पर चुनाव लडा मगर 122 सीटें ही जीत पाई। शिवसेना ने 282 सीटों पर प्रत्याशी खडे किए मगर मात्र 62 ही जीत पाई। 288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा में स्पष्ट बहुमत के लिए 144 सीटों की जरुरत है। भाजपा को 31.15 फीसदी और शिवसेना को 19.90 फीसदी वोट मिले थे। दोनों दल अगर मिलकर चुनाव लडते, दो-तिहाई बहुमत आसानी से मिल सकता था। अलग-अलग लडे, इसलिए किसी को स्पष्ट बहुमत तक नहीं मिल पाया। 2014 में भाजपा-शिवसेना ने मिलकर लोकसभा चुनाव लडा था और 47.9 फीसदी वोट हासिल कर भी विधानसभा से कहीं ज्यादा सीटें जीती थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र (48), उत्तर प्रदेश (80) बिहार (40) और पश्चिम बंगाल की 42 सीटों की अहम भूमिका रहेगी । यानी 543 मेंसे 210 सांसद तो इन चार राज्यों से आएंगे। जिस किसी दल अथवा गठबंधन को इन चार राज्यों में ज्यादा से ज्यादा सीटें मिलेगी, वही दिल्ली की गद्दी पर काबिज होगा। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र ने 2014 में भाजपा नीत राजग को सत्ता में लाने में प्रमुख भूमिका अदा की थी। 2014 में भाजपा नीत राजग ने इन दोनों राज्यों से 122 सीटें जीती थी । केन्द्र में फिर से सत्ता में आने के लिए भाजपा को शिवसेना का सहयोग उतना ही जरुरी है जितना उत्तर प्रदेश को 2014 की तरह फतेह करना। मगर चुनावी बयार भाजपा के पक्ष में बहती नजर नहीं आ रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से अब तक हुए 27 लोकसभा उपचुनाव मेंसे सिर्फ 6 सीटें ही जीत पाई है। अमूमन, उपचुनाव में सत्तारूढ दल की जीत तय मानी जाती है मगर उत्तर प्रदेश में भाजपा एक के बाद दूसरा लोकसभा चुनाव हार रही है, उसका ख्याल करते हुए लगता नहीं है कि भाजपा का 2014 वाला “विजय अभियान“ जारी रह पाएगा। भाजपा को इस सच्चाई को गले लगाना ही पडेगा कि जमाना गठबंधन की राजनीति का है और अगर 2019 में फिर से सत्ता में आना है, तो छोटे-बडे हर सहयोगी दल को साथ लेकर चलना ही पडेगा।
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