जम्मू-कश्मीर संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की रिपोर्ट से भारत का क्षुव्ध होना और पाकिस्तान और घाटी के अलगाववादी नेताओं का बल्लियां उछलना स्वभाविक है। यही तो वे चाहते थे। भारत को बिखंडित करना अलगाववादियों का एकमात्र मकसद है। पूरी दुनिया इस सच्चाई को जानती है कि आतंक को कौन पाल-पोस रहा है और मानवाधिकारों का उल्लघंन कहां हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार आयोग ने जिस दिन (वीरवार) अपनी रिपोर्ट जारी की, उसी रोज जम्मू-कश्मीर में वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुखारी की दिन-दहाडे निर्मम हत्या कर दी गई और एक जवान को अगवा कर लिया गया। और यह वाक्या पवित्र रमजान माह के समाप्त होने के एक दिन पहले हुआ। सरकार ने रमजान माह के दौरान एक माह के लिए आतंकियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई पर रोक लगा रखी है। इसके बावजूद राज्य में आतंकी हिंसा नहीं रुकी है। यून की रिपोर्ट में आतंकी हिंसा का कोई उल्लेख नहीं है। इसके विपरीत संयुक्त राष्ट्र द्वारा चिंहित और प्रतिबंधित संगठनों को “हथियारबंद“ समूह और आतंकियों के सरगनाओं को “ चरमपंथी लीडर्स“ कहा गया है। प्रतिबंधित आतंकी संगठनों के लीडर्स को “चरमपंथी“ कहना संयुक्त राष्ट्र की अपनी नीति के खिलाफ है और यूएन खुद आतंक के खिलाफ लडाई का ऐलान कर चुका है। इस हिसाब से तो खूंखार आतंकी संगठन आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया) भी “हथियारबंद समूह“ होना चाहिए और इसके सरगना “चरमपंथी लीडर्स“। निर्दोष लोगों की हत्या करने और खुन-खराबा करने वाले सभी समूह अथवा संगठन मानव के सबसे बडे दुश्मन हैं और उन्हें एक ही चश्मे से आंका जाना चाहिए। यून की रिपोर्ट की इन आंकडों पर कैसे विश्वास किया जा सकता है कि जम्मू-कश्मीर में जुलाई 2016 से 2018 के बीच सुरक्षा बलों के हाथों 130 से 145 लोग लोग मारे गए जबकि आतंकियों (रिपोर्ट में चरमपंथी) ने 20 लोगों को मार गिराया। जाहिर है इस रिपोर्ट में सुरक्षा बलों के हाथों मारे गए आतंकियों को भी शामिल किया गया है। इस रिपोर्ट में हालांकि यह भी कहा गया है कि दोनों तरफ (भारत प्रशासित और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर ) मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है मगर इसमें भारत पर कहीं ज्यादा फोक्स किया गया है। रिपोर्टे में जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंक का कोई उल्लेख नहीं है। 2017 में संयुक्त राष्ट्र की इकॉनोमिक, सोश \ल एंड कल्चर राइटस समिति ने पाकिस्तान में शिक्षा अधिकारों के घोर उल्लघंन पर कडी फटकार लगाई थी। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में मानवाधिकारों का उल्लंघन यूएन के मानवाधिकार समिति को नजर नहीं आया। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीरी नेता लगातार वहां सेना के अत्याचारों और मानवाधिकारों के घोर उल्लघंन की शिकायतें करते रहते हैं। यूएन की रिपोर्ट में भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर में सेना की भारी तैनाती पर सवाल उठाए गए हैं मगर पाकिस्तान अधिकृत-कश्मीर में सेना की तैनाती की कोई चर्चा नहीं की गई है। इन सब बातों के दृष्टिगत पाकिस्तान अगर इस “एक तरफा“ रिपोर्ट का स्वागत करता है तो इसमें कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए। आतंक को पालने-पोसने के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव झेल रहे पाकिस्तान के लिए यह रिपोर्ट “राम बाण“ साबित हो सकता है। पाकिस्तान अब पूरी दुनिया में ढिंढोरा पीटेगा कि उसके यहां से कहीं ज्यादा मानवाधिकारों का उल्लघंन भारत में हो रहा है। पाकिस्तान में जुलाई में नेशनल असेंबली (संसद) के चुनाव हो रहे हैं और सत्ताधरी दल यूएन की रिपोर्ट को राजनीतिक तौर पर भुना सकता है। मानवाधिकारों के उल्लघंन की आड में नेतागिरी चमकाने का काम अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां और उनके कर्ताधर्ता बखूबी जानते है। संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्था को हर हाल में निष्पक्ष होना चाहिए और इसे किसी का पक्ष नहीं लेना चाहिए। जम्मू-कश्मीर में रमजान के पवित्र माह में आतंकियों द्वारा किया जा रहा खून-खराबा अगर यूएन की समिति को नजर नहीं आता है, तो इसकी विश्वसनीयता पर ही सवाल उठता है़ ?
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