शुक्रवार, 8 जून 2018

महंगा कर्ज और कुप्रबंध

साढे चार साल में पहली रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने नीतिगत ब्याज दरें (रेपो रेट) बढाई हैं। बुधवार को आरबीआई ने रेपो और रिवर्स रेपो रेट में 0.25 फीसदी करके बैकों को ब्याज दरें बढाने का रास्ता साफ कर दिया। पिछली बार जनवरी 2014 में आरबीआई ने नीतिगत ब्याज दरें बढाई थी। जनवरी 2016 में रेपो रेट 8 फीसदी था और 2018 में ताजा वृद्धि से पहले यह 6 फीसदी तक कम किया जा चुका था। यानी साढे सार साल में 2 फीसदी की कमी। मोदी सरकार के राज में पहली बार ब्याज दरें बढी हैं।  रेपो रेट बढने से क्योंकि अब बैंकों को आरबीआई से कर्जा  लेने पर ज्यादा ब्याज चुकाना पडेगा, जाहिर है बैंक इसका बोझ ग्राहकों को पास ऑन कर देंगे। भारत में बैंक इतने स्मार्ट है कि रेपो रेट बढते ही वे कर्जदारों पर ब्याज वृद्धि का बोझ डालने में जरा भी विलंब नहीं करते  हैं । मगर जब ब्याज दरें गिरती हैं, बैंक ब्याज घटाने में अरुचि दिखाते हैं। साढे चार साल में आरबीआई रेपो रेट में दो फीसदी की कमी कर चुका है मगर इसकी तुलना में बेंकों ने ग्राहकों को अधिकतम 1.5 फीसदी का लाभ दिया है। दुनिया के कई देशों  की तुलना में भारत में कर्ज  अपेक्षाकृत महंगा है।  2008 की  वैश्विक  मंदी तक भारत में कर्ज  अपेक्षाकृत सस्ता था और देश  में आवास निर्माण बुलदियों पर था। भारत के लिए सुखद स्थिति यह रही कि अर्थव्यवस्था इसकी चपेट में नहीं आई मगर रियल्टी सेक्टर तब से आज तक मंदी से उभर नहीं पाया है। चार साल में कर्ज अपेक्षाकृत सस्ता रहने के बावजूद रियल्टी सेक्टर मंदी से नहीं उभर पाया है। अंतरराष्ट्रीय   बाजार में लगातार बढती तेल की कीमतों से चिंतित आरबीआई को मुद्रा-स्फीति को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरें बढाने  पडी हैं। बेलगाम महंगाई को नियंत्रित रखना आज भी देश  के मौद्रिक नीति निर्धारकों की प्रमुख प्राथमिकता है। मोदी सरकार के चार साल में संप्रग सरकार  की तुलना में महंगाई अपेक्षाकृत नियंत्रण में रही है। इसके लिए मोदी सरकार की नीतियों अथवा आरबीआई की मौद्रिक नीति के साथ-साथ 2014 के बाद से सस्ता तेल की भी अहम भूमिका रही है। सस्ते तेल का फायदा लोगों को तो नहीं मिला मगर सरकार ने जब-तब उत्पाद  शुल्क बढाकर जमकर राजस्व कमाया है। चिंता की बात यह है कि देषश  में विदेशी  निवेश  का इनफ्लो लगातार गिर रहा है। ताजा रिपोर्ट  के अनुसार, 2017 में भारत में विदेशी  निवेश  गिरगर 40 अरब डॉलर ही रह गया था। 2016 में भारत में 44 अरब डॉलर विदेशी  निवेश  आया था। इस दौरान एफडीआई आउटफ्लो दोगुना से ज्यादा बढकर 11 आरब डॉलर तक पहुंच गया था। 2017 मे ग्लोबल एफडीआई में भी 23 फीसदी की गिरावट आई है। 2017 में यह 1.43 लाख करोड रु ही रह गया था ।2016 में ग्लोबल एफडीआई 1.83 लाख करोड रु था। भारत समेत विकासशील देशों  के लिए यह चिंता का विषय है। लोगों के लिए राहत की बात यह है कि आरबीआई ने महानगरों में सस्ते कर्ज (प्रायोरिटी सेक्टर लैंडिग)  की सीमा 28 लाख  से बढाकर 35 लाख कर दी है और गैर-महानगरीय शहरों में  20 से 25 लाख कर दी है। आरबीआई के इस फैसले से “अपने घर“ का सपना देखने वालों को राहत मिलेगी। सरकारी बैकों का वित्तीय कुप्रबंध और  भ्रष्ट  कार्यशैली तीव्र ग्रोथ को ग्रहण लगा रहा है। सरकार ने 20  राष्ट्रीयकृत  बैकों के लिए हाल ही में 88,000 करोड रु दिए हैं। बेंकों की पुनर्पं्ूजीकरण योजना के तहत अगले दो साल में  2.1 लाख करोड रु का निवेश  करने का प्रस्ताव है। इस बात की पूरी संभावना है कि बेंकों की बढते एनपीए के दृष्टिगत यह विशाल राशि  भी डूब जाएगी। इससे कहीं ज्यादा बेहतर है कि सरकार इस राशि  को सस्ता कर्ज देने के लिए मुहैया कराए। इससे ग्रोथ को गति मिल सकती है।