अमरीकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। वीरवार , 28 जून 2018, को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 69.10 तक चला गया था। आरबीआई के दखल से सत्र के बीच में इसमें थोडा सुधार आया और डॉलर के मुकाबले रुपया 68.95 के भाव पर टिका । इससे पहले 28 अगस्त 2013 को रुपया डॉलर के मुकाबले 68.80 का न्यूनतम स्तर छू चुका है। 24 नवंबर 2016 को एक डॉलर 68.86 रुपए के बराबर था। मई 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के समय रुपया डॉलर के मुकाबले 60 के आसपास था। फिलहाल, राहत की बात यह है कि सरकार के पास पर्याप्त मुद्रा है। 15 जून को सरकार का विदेशी मुद्रा भंडार 410.07 अरब डॉलर था। बैंक और आयातकों की बढती डॉलर मांग अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंग क्रूड और मौजूदा व्यापार युद्ध से भारतीयमहंगी रुपए पर ही नहीं, अधिकांश कर्रेंसीज़ पर दबाव पड रहा है। मंगलवार कौ आरबीआई द्वारा जारी फाइनेंसियल स्टैबिलिटी रिपोर्ट से भी बाजार फिसला है और इससे कमोडिटी मार्केट पर असर पडा है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारी बैंकों की हालत और खराब हो सकती है और उनका एनपीए 13 फीसदी को भी पार कर सकता है। डॉलर की तुलना में महंगे रुपए का सीधा असर विदेशों में अध्ययन करने वाले छात्रों पर पडता है। रुपया जितना महंगा होगा उनकी विदेशी पढाई का खर्चा भी उतना ही बढेगा । इससे सबसे ज्यादा वे छात्र प्रभावित होते हैं जो छात्रवृति अथवा लोन लेकर विदेश पढने जाते हैं। रुप्ए की कमजोरी से विदेशी यात्रा भी होती है। महंगे डॉलर से विदेशी यात्रा पर जाने वाले भारतीयों को खर्चा और ज्यादा बढ जाता है। इससे उन यात्रियों पर अतिरिक्त बौझ पडता है, जिनका बजट सीमित होता है। सबसे बडा असर क्रूड आयात पर पडता है। भारत तेल आयात करने वाला दुनिया का तीसरा बडा मुल्क है और इस मामले में वह चीन से भी आगे निकल चुका है। इस साल जनवरी में भारत हर रोज 4.93 मिलियन बैरल ;बीपीडीद्ध क्रूड का आयात कर रहा था और फरवरी में यह 5.27 मिलियन बीपीडी तक पहुंच चुका एक साल पहले भारत का क्रूड आयात 280,000 बीपीडी था। यानी एक साल में भारत का क्रूड आयात दोगुने से भी ज्यादा हो चुका है। इस साल ;2018 मैं देश की फ्यूल डिमांड 6.1 फीसदी बढने का अनुमान है। जाहिर है ज्यादा फ्यूल खरीदने के लिए और ज्यादा विदेशी मुद्रा की जरुरत पडेगी । और महंगे क्रूड से देश में महंगा फ्यूल बिकेगा और इससे महंगा ई बढेगी । ज्यादा से ज्यादा विदेशी मुद्रा कमाने के लिए भारत को अपना निर्यात बढाने की जरुरत है। आयात की तुलना में निर्यात अभी भी काफी कम है। 2017-18 के दीरान भारत का निर्यात 302.8 अरब डॉलर था और आयात 459.7 अरब डॉलर। नतीजतन 156.9 अरब डॉलर का विदेशी व्यापार का शुद्ध घाटा । 2016-17 में 275.8 अरब डॉलर के निर्यात की तुलना में 384.4 अरब का आयात था जिससे देश को 108.6 अरब डॉलर का घाटा उठाना पडा। रेमिटेंस काफी हद तक इस व्यापार घाटे को पूरा कर रहा है। भारत दुनिया में सबसे ज्यादा रेमिटनेस पाने वाला मुल्क है। ;2017 में देश में 65 अरब डॉलर रेमिंटेंस आया था। 2015 में भारत में 68.9 अरब डॉलर रेमिटेंस आया था। बहरहालए इस साल रुपए का लगातार कमजोर होना चिंता का विषय है। इस साल अब तक डॉलर के मुकाबले रुपया 7 फीसदी फिसल चुका है। पिछले साल डॉलर के मुकाबले रुपया 5.96 फीसदी मजबूत हुआ था.। क्रूड की सप्लाई बढने के बावजूद इसकी कीमतें बढ रही है। अगर यह सिलसिला जारी रहा तो रुपया और कमजोर हो सकता है। कूृड की खरीद डॉलर में की जाती है। कीमतें बढने से डॉलर की मांग बढती रहेगी और रुपया कमजोर होता रहेगा । भारत के लिए यह सुखद स्थिति नहीं है।
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