जर, जोरु और जमीन इंसान के लिए पूरी कायनात में सबसे ज्यादा प्रिय होती है और अगर इन पर संकट के बादल मंडराने लगे, तो वह मरने-मारने पर आमादा हो जाता है। इतिहास इस तरह की घटनाओं से भरा पडा है। इसे इंसान की बदकिस्मती ही कहा जाएगा कि अक्सर उसे अपनी अलग पहचान के लिए ताउम्र संघर्ष करना पडता है। पूर्वोतर राज्य मेघालय की राजधानी शिलांग में पिछले डेढ सौ साल से भी ज्यादा समय से बसे दलित (महजबी) सिखों को आज भी अपनी पहचान के लिए लडना पड रहा है। पिछले सप्ताह शिलांग में राज्य के सबसे बडे समुदाय “खासी“ और दलित सिखों के बीच जो कुछ भी हुआ उसकी पृष्ठभूमि में जर और जमीन की अहम भूमिका है । इस साम्प्रदायिक हिंसा की पटकथा बहुत पहले लिखी जा चुकी थी। स्थानीय खासी समुदाय के लिए यह सच कोई मायने नहीं रखता है कि शिलांग में दलित सिख डेढ सौ साल से भी ज्यादा समय से रह रहे हैं और उनका भी इस राज्य में रमने-बसने का उतना ही अधिकार है, जितना कबायलियों का। इसके बावजूद भी अगर शिलांग में बसे दलित सिखों को “बाहरी“ माना जाए, तो भारत की “विविधता में एकता“ और संववैधानिक अधिकारों पर सवाल उठना स्वभाविक है। हर राज्य जम्मू-कश्मीर जैसा बन जाए, तो भारत का संघीय ढांचा ही तहस-नहस हो जाएगा। वोट की राजनीति भारत पर बहुत भारी पड रही है। 1979 में मेघालय में बंगाली मूल के लोगों को पलायन के लिए विवश किया गया। 1987 में नेपाली मूल के लोगों को निशाना बनाया गया और फिर 1991-92 में “बिहारियों“ को पलायन के लिए डराया-धमकाया गया। और अब दलित सिखों को टारगेट बनाया गया है। केन्द्र और राज्य सरकार समस्या का स्थाई हल निकालने की बजाए अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रही है। मेघालय की कुल 3,211,474 आबादी मेंसे 1,411,775 (लगभग आधी) खासी सनुदाय से है और कोई भी राजनीतिक दल इस समुदाय को नाराज करने की हिमाकत नहीं कर सकता । शिलांग के समाचार पत्रों ने इस बात को सुर्खियों में प्रकाशित किया है कि स्थानीय लोगों की पिटाई कर कोई भी “बाहरी“ बच नहीं सकता। शिलांग में पनपी साम्प्रदायिक हिंसा के लिए इस अफवाह को जिम्मेदार माना जा रहा है कि सिखों ने खासी समुदाय के युवकों को पिटा और इस हिंसा में एक की मौत हो गई जबकि यह मामूली सा क्षणिक झगडा था। एक सिख चालक ने अपना वाहन उस जगह खडा कर दिया, जहां स्थानीय खासी समुदाय की युवतियां पानी भर रही थी। इस पर दोनों पक्षों में तू-तू, मैं-मैं हो गई। बढते-बढते झगडे ने साम्प्रदायिक रंग ले लिया और प्रशसन को क्षेत्र में कफर्यू लगाना पडा। एक सप्ताह से ज्यादा समय गुजर गया है, तनाव आज भी कायम है। शिलांग के मौलांग घाट में करीब दो एकड के दायरे में पंजाबी कॉलोनी बसी है। डेढ सौ साल से भी पहले फिरंगियों ने पंजाब के मह्जबी सिखों को यहां लाया और बसाया था। इस बस्ती को आज भी “दलित“ बस्ती और पंजाबी लेन के नाम से जाना जाता है। फिरंगियों ने इस जमीन का पट्टा यहां बसे सिखों के नाम पर दिया था। तब से यह व्यवस्था जारी है। पिछले सप्ताह की हिंसक घटनाओं के बाद खासी समुदाय से संबंधित लोग दलित सिखों को यहां से शिफ्ट करने की फिर से मांग उठा रहे हैं। सिख किसी भी स्थिति में अपनी जर और जमीन छोडने को तैयार नहीं है। मौलांग घाट शिलांग में सबसे पॉश इलाके पुलिस बाजार के बाद दूसरा बडा कमर्शियल एरिया माना जाता है। इस कारण इस पर सबकी नजर है। इसी बात को सामने रखकर पंजाबी बस्ती को यहां से बदलने की साजिश की जा रही है। सिख सर उठाकर जीने वाली कौम है। शिलांग के दलित सिखों को इस बात का दुख है कि फिरंगियों ने उन्हें बसाया मगर आजाद भारत उन्हें उजाडने की फिराक में है।
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