देश में पेयजल के भीषण संकट के मद्देनजर यह प्रश्न प्रासंगिक है कि अगर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी आज हमारे बीच होते, तो इस संकट से कैसे निपटते़? इस संबंध में गुजरात में आज भी बापू को लेकर यह प्रसंग बताया जाता है। एक बार महात्मा गांधी नहाने के लिए साबरमती नदी से बाल्टी में पानी भर रहे थे। उन्होंने आधी बाल्टी ही भरी और आश्रम को चल दिए। पास से गुजर रहे व्यक्ति ने कौतूहलवश बापू से पूछ ही लिया कि उन्होंने आधी बाल्टी क्यों भरी जबकि नदी में प्रर्याप्त पानी है। महात्मा गांधी का जवाब था, “ मुझे नहाने के लिए आधी बाल्टी की ही जरुरत है। फिर मैं ज्यादा पानी क्यों इस्तेमाल करूं। नदी के पानी पर सबका बराबर का हक है। बेशक साबरमती में प्रर्याप्त पानी है मगर इसे व्यर्थ में बहाना गलत है“। राष्ट्रपिता दूरदर्शी थे और उन्हें इस बात का अहसास था, देर-सबेर भारत में पेयजल का संकट होगा। इसलिए वे हमेशा पानी बचाने पर जोर देते। मेरे पिताश्री ने भी मुझे महात्मा गांधी को लेकर एक रोचक प्रसंग सुनाया था। महात्मा गांधी के शिमला प्रवास के दौरान पिताश्री उनके साथ थे। एक बार पिताश्री से नल थोडा से खुला रह गया। इस पर उन्हें बापू से डांट खानी पडी। गांधी ने उन्हें समझया था की बूंद -बूंद पानी बचाकर ही भविष्य के संकट से निपटा जा सकता है । पिताजी ने यह बात गांठ में बांध ली और ताउम्र आधी बाल्टी से ही नहाते रहे । दुनिया में 3 फीसदी ही ताजा पानी है और इसमें कोई इजाफा नहीं हो रहा है। मगर आबादी के बेताहाशा बढने से पानी की खपत दिन-ब-दिन, साल-दर-साल बढ रही है। इसका एकमात्र उपाय यही है कि हम बूंद-बूंद पानी बचाएं। महात्मा गांधी के आदर्शों पर चलने की कसमेँ खानेवाले नेताओं की इससे सीख लेनी चाहिए।
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