भारतीय जनता पार्टी की “ जननी“ राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) के नागपुर स्थित मुख्यालय में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने वीरवार को स्वंयसेवकों को राष्ट्रीयता को जो पाठ पढाया, वह उस महान हस्ती के राजनीतिक दर्शन का निचोड था, जिससे भगवा संगठन अब तक नफरत करते रहे हैं। पूर्व राष्ट्रपति ने अपने भाषण में भले ही जवाहर लाल नेहरु का बार-बार उल्लेख नहीं किया पर उनके भाषण में नेहरु की पुस्तक ”दी डिसकवरी ऑफ इडिया“ वाले भारत की छवि और विरासत समाहित थी। पूर्व राष्ट्रपति के भाषण की शुरुआत ही राष्ट्र , राष्ट्रवाद और राष्ट्रप्रेम से हुई और उन्होने जोर देकर कहा कि तीनों एक दूसरे से अंतरंग रुप से जुडे हुए हैं और इन्हें अलग नहीं किया जा सकता। प्रणब “दा“ ने शब्दकोश से ”राष्ट्र -नेशन“ की परिभाषा भी पढकर सुनाई। ठोस तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित भारत के तार्किक इतिहास के पन्नों को भी उलटा-पलटा और स्वंयसेवकों को समझाया कि संघ का हिंदू मिथकों से भरा इतिहास काल्पनिक है। दुनिया का सारा वैभव, ज्ञान और प्रोन्नत विज्ञान भारत में ही था, प्राचीन भारत में विमान उडते थे, प्लास्टिक सर्जरी होती थी और महाभारत काल में इटरनेट था और मिसाइलें भी थी, यह सब काल्पनिक इतिहास का हिस्सा है। भारत प्राचीन काल से “वसुधैव कुटुबंभम“ वाला देश रहा है। इस देश में सात बडे धर्म हैं, 122 से ज्यादा भाषाएं हैं और 1600 से ज्यादा “बोलियां “ बोली जाती हैं। इसके बावजूद सब मिल-जुल कर एक व्यवस्था, एक पहचान और एक झंडे के तले रहते हें। ऐसे देश का एक धर्म और राष्ट्रीयता हो सकती। उन्होंने साफ-साफ शब्दों में कहा कि भारत में मिथकों, नफरत और अस के लिए कोई जगह नहीं है। जाहिर है पूर्व राष्ट्रपति की ये सब बातें आरएसएस के “एक धर्म और राष्ट्रीयता “ के एकदम विपरीत हैं। आरएसएस की सोच एकदम अलग है। संघ हिंदू संस्कृति (एक धर्म) को भारतीयता (राष्ट्रीयता ) की पहचान मानता है। हिंदू धर्म और संस्कृति की रक्षा करना हर भारतीय का परम कर्तव्य है। संघ इसी लक्ष्य को सामने रखकर काम कर रहा है। पूर्व राष्ट्रपति ने आरएसएस के सम्मेलन में जो कुछ भी कहा, वह संघ की सोच से एकदम भिन्न है। ऐसे में सवाल उठता है कि आरएसएस ने कांग्रेस से संबद्ध रहे प्रणब मुखर्जी को अपने सम्मेलन में क्यों बुलाया? संघ यह बात तो अच्छी तरह जानता था कि प्रणब मुखर्जी आरएसएस के सम्मेलन में खालिस हिंदुत्व वाली बातें तो कहेंगे नहीं और कहीं न कहीं गांधी, नेहरु का जिक्र करेंगे ही। प्रणब मुखर्जी जैसे मंझे हुए नेता से बेबाक भाषण की ही उम्मीद थी । वैसे प्रणब मुखर्जी की नागपुर यात्रा को लेकर कांग्रेस और अन्य गैर-भाजपाई दलों के साथ-साथ भाजपाइयों में भी खासी उत्सुकता थी। मीडिया ने भी इस यात्रा को खूब उछाला। कॉग्रेस को इस बात का डर था कि कहीं प्रणब मुखर्जी संघ के सम्मेलन में इस बात पर न फटकारें की पार्टी ने उन्हें दो बार प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया । मुखर्जी राहुल गांधी के भी आलोचक रहे हैं। भाजपाइयों को लंबे समय तक कांग्रेसी रहे प्रणब मुखर्जी के संघ मुख्यालय की यात्रा को लेकर उत्सुकता थी। और गैर-भाजपाई, गैर कांगेसी दलों को विपक्षी एकता के इस नाजुक समय में एक वयोवृद्ध उदारवादी हस्ती का संघ के कार्यक्रम में शामिल होने का डर सता रहा था। इस यात्रा के कई अर्थ निकाले जा सकते थे। आरएसएस ने प्रणब मुखर्जी को सम्मेलन में बुलाकर यह साबित करने की कोशिश की है कि कांग्रेस में एक परिवार को छोडकर पूरी पार्टी आरएसएस विरोधी नहीं है। आरएसएस ने गैर-संघी को अपने दीक्षांत समारोह में बुलाकर उदारता का परिचय दिया है। गांधी और नेहरु को खारिज करने वाला संघ अगर प्रणब मुखर्जी जैसे दिग्गज नेता को बुलाकर उनके विचारों को साझा करता है तो असहिष्णुता के दौर में यह बडी बात है।
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