मंगलवार, 26 जून 2018

चीन के आर्थिक उप-निवेशवादी मंसूबे

इतिहास इस बात का गवाह है कि आर्थिक उपनिवेशवाद के जरिए दुनिया में समृद्ध मुल्कों ने गरीब देशों  को अपना गुलाम बनाकर उ\\न पर लंबे समय तक  शासन किया है। व्यापार की आड में गरीब को गुलाम बनाना दुनिया का दस्तूर रहा है। फिरंगियों ने ब्रिटिश  ईस्ट इंडिया कंपनी के जरिए बृहद भारत को गुलाम बना लिया था। अठारवीं शताब्दी के शुरु में मुगल  शासकों ने ईस्ट इंडिया कंपनी को सभी तरह के सीमा  शुल्कों से छूट देकर भारत की गुलामी की नींव रख दी थी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने सुरक्षा के नाम पर अपनी सेना खडी करके उपनिवेशवादी  मंसूबों को अंजाम दिया। अततः 1857 के विद्रोह के साथ ही भारत फिरंगियों का गुलाम बन गया। सोहलवीं और सतारवीं शताब्दी की विस्तारवादी भूख  इक्कसवीं  शताब्दी में भी बदस्तूर जारी है और चीन इसमें सबसे आगे है। चीन ने अफ्रीका में निवेशकों, साहूकारों, बिल्डरों, व्यापारियों, श्रमिकों और न जाने किन.किन उपनिवेशवादी तरीकों से भारी घुसपैठ कर ली है। 55 मुल्कों की अफ्रीकी यूनियन का मुख्यालय का निर्माण करना हो तो चीन की मदद। सूखा या भुखमरी हो तो भी चीनी मदद। अफ्रीकी मुल्कों की माली हालात इतनी पतली है कि यूनियन मुख्यालय को बनाने के लिए पचपन देश  दो सौ मिलियन डॉलर नहीं जुटा पाए और इसके लिए चीन के आगे  हाथ फैलाने पडे। अफ्रीकी मुल्क जिबुती ने पिछले दो साल में चीन के एक्जिम बैंक से भारी उधार लिया है जिससे उसका बाहरी कर्जा सकल घरेलू उत्पाद का 50 से बढकर 80 फीसदी पहुंच गया है और वह दिन दूर नहीं है जब यह मुल्क दिवाला होकर चीन की शरण  में जाने के लिए विवश  हो जाएगा। जिबुती जैसे और भी कई अफ्रीकी देश  हैं, जिन्हें उदार वित्तीय सहयता देकर चीन ने अपना मुरीद (गुलाम) बना लिया है। एशिया और अफ्रीका के मुल्कों को वन बेल्टए वन रोड परियोजना से जोडकर चीन अपने विस्तारवादी मंसूबों को बखूबी अंजाम दे रहा है। तीन खरब डॉलर  से भी ज्यादा निवेश   की इस परियोजना से चीन आधारभूत ढांचा खडा करके  सेंट्रल  एशिया, मध्य.पूर्व  एशिया  और ंमध्य.पूर्व में अपना दबदबा बढाना चाहता है। इस परियोजना के तहत चीन भागीदार मुल्कों को भारी कर्जा  मुहैया करा रहा है। सेंटर फॉर ग्लोबल डवलपमेंट की ताजा रिपोर्ट  के अनुसार वन बेल्टए वन रोड में  शामिल आठ देश  चीन के भारी कर्ज के बोझ तले (डैट ट्रेप)  दबे हुए  हैं और इससे बाहर निकलना इनके लिए आसान नहीं है। इन मुल्कों में पाकिस्तान, मालदीव के अलावा मंगोलिया, तजाकिस्तान, किर्गीस्तान, लाओस, मोन्टेनेग्रो और जिबूती  शामिल है। और जल्द ही अफगानिस्तान भी इनमें  शामिल हो सकता है। चीन सोची.समझी रणनीति के तहत ऐसे मुल्कों को इस परियोजना में  शामिल कर रहा है जो अपेक्षाकृत गरीब हैं और जिनसे ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है। वन बेल्ट, वन रोड में  शामिल होने वाले देशों  को इस बात का जरा भी गुमान नहीं है कि चीन के ट्रेप में फंसकर किस तरह उनकी प्रगति पर विपरीत असर पड सकता है।  कर्जा  नहीं लौटाने की स्थिति में संबंधित देश  को पूरा प्रोजेक्ट  चीन के सुपुर्द करना पड सकता है। वैसे भी वन बेल्टए वन रोड की  शर्तें पूरी तरह चीन के पक्ष में है। पिछले साल श्रीलंका को  एक अरब डॉलर से ज्यादा का कर्जा नहीं लौटाने पर अपना हम्बनटोटा पोर्ट  चीन को सौंपना पडा था। सबसे पतली हालत पाकिस्तान की है। पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट को लेकर इस्लामाबाद का चालीस साल का संमझौता है। इसके तहत 40 साल तक चीन को इस पोर्ट की कमाई का 91 फीसदी हिस्सा मिलता रहेगा। पाकिस्तान को मात्र 9 फीसदी हिस्सा ही मिलेगा। पाकिस्तान इस ' बनियागिरी' से भी खुश  है,  भले ही इससे इस्लामाबाद चीन का आर्थिक कॉलोनी बनने की ओर अग्रसर हो रहा है। इसी आशंका से नेपाल चीन के भारी दबाव के बावजूद वन बेल्ट, वन रोड में भागीदार बनने से बच रहा है। बहरहाल, चीन के इन मंसूबों से भारत को सचेत रहने की जरुरत है।ं