मंगलवार, 26 जून 2018

बेमेल गठबंधन तो टूटना ही था!

देष के मुस्लिम बहुल आबादी वाले जम्मू-कष्मीर में देर-सबेर राज्यपाल षासन लगना तय था। तीन साल तीन माह से सत्तारूढ पीडीपी-भाजपा गठबंधन टूटने के बाद राज्य में राज्यपाल षासन लगा दिया गया है। राज्य संविधान के अनुच्छेद 92 के तहत जम्मू-कष्मीर में राज्यप्ाल षासन लगाया जाता है। देष के अन्य राज्यों में राश्ट्रीय संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत राश्ट्रपति षासन लगाया जाता हे़। पिछले चालीस साल में जम्मू-कष्मीर में आठवीं बार और राज्यपाल एनएन वोहरा के रहते चौथी बार राज्यपाल षासन लगाया गया है। वोहरा 2008 से लगातार जम्मू-कष्मीर के राज्यपाल हैं। इस दौरान चार मुख्यमंत्री- गुलाम नबी आजाद, उमर अब्दुल्ला, मुफ्ती मोहम्मद सईद और महबूबा मुफती- आ-जा चुके हैं। लगभग साढे तीन साल पहले दिसंबर 2014 को संपन्न हुए विधान सभा चुनाव में त्रिषंकू विधानसभा के  बाद दो सबसे बडी राजनीतिक पार्टियों को सरकार बनाने के लिए एक “वर्किंग“ गठबंधन बनाने में ही तीन माह लग गए थे। और जब मार्च, 2015 को जैसे-तैसे बेमेल पीडीपी-भाजपा सरकार बनी, उसी दिन से इस पर अनिष्चितता के बादल मंडराने लग पडे थे। पीडीपी को जम्मू-कष्मीर में अलगाववादियों और चरमपंथियों का करीबी माना जाता है और उसका राजनीतिक एजेंडा भाजपा से एकदम अलग और विपरीत है। दोनों पार्टियों ने विधानसभा चुनाव अलग-अलग लडे थे और एक-दूसरे पर जमकर प्रहार किए थे। पीडीपी जम्मू-कष्मीर को संविधान की धारा (आर्टिक्ल) 370 के तहत मिले विषेश दर्जे को और मजबूत करने के पक्षधर है और भाजपा इसकी घुर विरोधी है। जम्मू-कष्मीर को मिले विषेश संवैधानिक दर्जे को निरस्त करने के लिए भाजपा की पूर्व जनसंघ के संस्थापक डाक्टर ष्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1953 में अपने प्राण तक न्यौछावर कर दिए थे। भाजपा आज भी धारा 370 को निरस्त करने की जबरदस्त पक्षधर है। पीडीपी से गठबंधन तोडने की असली वजह भी यही है कि चरमपंथियों की करीबी पार्टी से सत्ता का सुख भोगने के कारण जम्मू रीजन में भाजपा का जनाधार खिसक रहा था। चुनाव के समय भाजपा को हिदुंत्व का एजेंडा याद आता है। मतदाताओं का धुव्रीकरण कराने के लिए इस एजेंडा को पूरी तरह अपनाना भाजपा की सामरिक विवषता है। जम्मू-कष्मीर  में चरमपंथी “पीडीपी“ के साथ सत्ता में रहकर भाजपा किस मुंह से मतदाताओं के समक्ष जाती?  राश्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का भी द्बाव पड रहा था।  पीडीपी-भाजपा गठबंधन तो टूटना ही था। बहरहाल,जम्ंमू-कष्मीर में राज्यपाल षासन से सुरक्षा बलों को आतंकियों से निपटने में आडे आ रही राजनीतिक अडचनें कम हो सकती है। पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती के दबाव पर मोदी सरकार को राज्य में आतंकियों के खिलाफ चलाए जा रहे “ऑपरेषन ऑल आउट“ को रमजान माह के लिए रोकना पडा था। इससे राज्य में पवित्र रमजान माह में आतंक का नंगा नाच तो थमा नहीं, अलबत्ता सुरक्षा बलों पर हमले जरुर बढे। अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए पीडीपी के नेता अक्सर अलगाववादियों और चरमपंथियों की जुबानी बोलते रहे हैं और सुरक्षा बलों का मनोबल तोड्ने में कोई कसर नहीं छोडते हैं। जम्मू-कष्मीर में उतरोत्तर लोकतांत्रिक  और प्रषासनिक  व्यवस्था निश्क्रिय होती जा रही है। संविधान की  धारा् 370 के तहत विषेश दर्जा मिलने, केन्द्र से उदार पैकेज-दर-पैकेज, खुद का संविधान, अधिनियम और झंडा होने के बावजूद राज्य में न तो वंाछित तरक्की हो पाई है और न ही अमन-चैन कायम हो पाया है। अषांत कष्मीर घाटी ने राज्य के दो अन्य क्षेत्रों जम्मू और लद्दाख के तीव्रगामी विकास में भी रोडे अटकाए हैं। भाजपा ने जम्मू-कष्मीर में चरमपंथियों और अलगवादियों की प्रबल समर्थक पीडीपी के साथ सरकार साझा करके अपनी सत्ता लोलुपता को दर्षाया है। त्रिषंकू विधानसभा के गठन पर राज्य में राज्यपाल षासन लोकप्रिय सरकार की जगह ज्यादा प्रासंगिक साबित होता। राज्यपाल षासन में सुरक्षा बलों पर किसी तरह का कोई द्बाव नहीं होता है। यही तो भाजपा चाहती है। फिर तीन साल क्यों गंवाए?