बुधवार, 27 जून 2018

महिलाओं के लिए असुरक्षित भारत

दुनिया की प्राचीनतम एवं समृद्धतम् सभ्यताओं में षुमार भारत में  महिलाओं को जितना आदर और सम्मान दिया जाना चाहिए, समकालीन इंडिया में उनका उससे कहीं ज्यादा सामाजिक और षारीरिक षोशण किया जा रहा है। जो समाज अपनी मां-बहन की कद्र नहीं करता है, वहां प्रगति और खुषाहली के कोई मायने नहीं रह जाते हैं। एक अंतरराश्ट्रीय समाचार एजेंसी द्वारा मंगलवार को जारी रिपोर्ट में भारत को महिलाओं के लिए दुनिया का सबसे असुरक्षित मुल्क बताया गया है। दुखद स्थिति यह है कि महिलाओं के लिए भारत गृह युद्ध में जल रहे अफगानिस्तान, सीरिया और सोमालिया  से भी ज्यादा असुरक्षित है। सात साल पहले 2011 में भारत इस मामले में चौथे पायदान पर था मगर राजधानी दिल्ली में “निर्भय“ जैसे सामूहिक बलात्कार और बच्चियों से जघन्य रेप के बढते मामलों के बावजूद  महिलाओं के लिए सुरक्षित भारत की दिषा में कोई कारगर कदम नहीं उठाए गए। इस वजह भारत पहले पायदान पर आ गया है। दुनिया में सबसे तेज गति से आगे बढती अर्थव्यवस्था, अंतरिक्ष टकनॉलॉजी के लीडर और अपनी समृद्ध सभ्यता पर इतराने वाले भारत के लिए यह स्थिति बेहद षर्मनाक है। जिस देष में मां को षक्ति और जगत जननी का दर्जा  दिया जाता हो, वहां महिलाओं का सामाजिक तिरस्कार हो, उन्हें भोग की वस्तु समझ कर उनका सामूहिक बलात्कार किया जाए और बेटी को बोझ समझकर गर्भ  में ही मार दिया जाए, वहां महिलाओं की सुरक्षा के लिए युद्ध स्तर से भी अधिक सषस्कत करने की जरुरत है। भारत में हर घंटे चार महिलाओं से बलात्कार किया जाता है। 2007 से 2016 के दौरान भारत में महिलाओं से बलात्कार के मामलों में 83 फीसदी  का इजाफा हुआ था। महिलाओं का षारीरिक षोशण करना तो जैसे पुरुश प्रधान भारत के रग-रग में समाया हुआ है। पिछली षताब्दी तक धर्म षास्त्रों में प्रचलित “ढोल, गंवार, क्षुद्र, पषु और नारी, सभी ताडन के अधिकारी“ को स्कूल-कॉलेजों  में पढाया जाता था। इंसान की पषु से तुलना करने वाली इस तरह के अपमानजनक जुमलों को   भले ही आधुनिक भारत अस्वीकार कर चुका है मगर पुरुशों में आज  भी यही मानसिकता व्याप्त है।  देष में षादी-ब्याह तो जैसे महिला से षारीरिक संबंध बनाने का लाइसेंस है। महिला की इच्छा या अनुमति की कोई जरुरत नहीं समझी जाती। बीमारी की अवस्था में भी विवाहिता को अपने पति की सेक्स भूख को तृप्त करना पडता है। बचपन से लडकियों को पाठ पढाया जाता है कि पति को संतुश्ट रखना उसका धर्म होता है। समाज के सारे कायदे-कानून महिलाओं के लिए हैं।  देष के लिए यह कडुवा सच और भी षर्मनाक है कि  भारत महिलाओं की तस्करी में भी पीछे नहीं है और इस मामले में लीबिया और म्यांमार की बराबरी कर रहा है। ऋग वैद को छोडकर भारत में वैदिक काल से ही महिलाओं का सामाजिक षोशण षुरु हो गया था। कालांतर में बाल विवाह, सती प्रथा और बहु-पत्नी (पोलीगेमी) ने महिलाओं की स्थिति बद से बदतर कर दी। कानूनन अपराध होने के बावजूद ग्रामीण भारत और कमजोर तबकों में बाल विवाह और बहुपत्नी जैसी कुप्रथा आज भी जारी है। आजादी के सात दषक और महिला सषक्तिकरण के बावजूद भारत में महिलाओं की भागीदारी संतोशजनक नहीं है। महिलाओं को रोजगार मुहेया कराने के मामले में भी भारत फिसड्डी रहा है। वर्ल्ड बैंक द्वारा 2017 में जारी रिपोर्टे के अनुसार महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराने के मामले में भारत  131 मुल्कों में 120वें पायदान पर है। भारत की सर्वसिस और इंडस्ट्रीज में महिलाओं की मात्रा बीस फीसदी भागीदारी है हालांकि चालीस फीसदी महिलाएं स्नातक पास हैं। चिंताजनक स्थिति यह है कि 2005 के बाद से महिलाओं की  सर्विस और इंडस्ट्रीज  में भागीदारी उतरोत्तर कम होती जा रहा है। महिलाओं की भागीदारी बढने से देष के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कम-से-कम एक फीसदी का इजाफा हो सकता है। महिलाएं देष की अस्मिता होती हैं और अपनी अस्मिता का अपमान करने  वाला कोई भी राश्ट्र सभ्य नहीं हो सकता।

   
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